विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
Blank Page
॥ श्रीहरिः ॥ विवेक - चूडामणि
॥ श्रीहरिः ॥
विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या | विषय पृष्ठ-संख्या १-मंगलाचरण ................................ ७ | २०-पंचप्राण ............................ २८ २-ब्रह्मनिष्ठाका महत्त्व ........... ७ | २१-सूक्ष्म शरीर ........................ २९ ३-ज्ञानोपलब्धिका उपाय ......... ९ | २२-प्राणके धर्म ........................ ३० ४-अधिकारिनिरूपण ................. १० | २३-अहंकार ............................. ३१ ५-साधन-चतुष्टय ..................... १० | २४-प्रेमकी आत्मार्थता ............ ३१ ६-गुरूपसत्ति और प्रश्नविधि .....१३ | २५-माया-निरूपण ................... ३२ ७-उपदेश-विधि ....................... १५ | २६-रजोगुण ............................ ३३ ८-प्रश्न-निरूपण ..................... १७ | २७-तमोगुण ............................ ३३ ९-शिष्य-प्रशंसा ..................... १८ | २८-सत्त्वगुण ........................... ३५ १०-स्व-प्रयत्नकी प्रधानता ........ १८ | २९-कारण-शरीर ...................... ३५ ११-आत्मज्ञानका महत्त्व ........... १९ | ३०-अनात्म-निरूपण .............. ३६ १२-अपरोक्षानुभवकी | ३१-आत्म-निरूपण .................. ३६ आवश्यकता .................... २० | ३२-अध्यास ............................ ३९ १३-प्रश्न-विचार ...................... २१ | ३३-आवरणशक्ति और १४-स्थूल शरीरका वर्णन ......... २३ | विक्षेपशक्ति ....................... ४१ १५-विषय-निन्दा ..................... २४ | ३४-बन्ध-निरूपण ................... ४२ १६-देहासक्तिकी निन्दा ........... २५ | ३५-आत्मानात्म-विवेक ............ ४२ १७-स्थूल शरीर ..................... २६ | ३६-अन्नमय कोश .................... ४४ १८-दस इन्द्रियाँ ..................... २७ | ३७-प्राणमय कोश ................... ४८ १९-अन्तःकरणचतुष्टय ............ २८ | ३८-मनोमय कोश .................... ४८
(६) विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या ३९-विज्ञानमय कोश .................. ५३ ५७-आत्मनिष्ठाका विधान ...... ९२ ४०-आत्माकी उपाधिसे ५८-अधिष्ठान-निरूपण ............ ९६ असंगता ..................... ५४ ५९-समाधि-निरूपण ............ ९७ ४१-मुक्ति कैसे होगी ? .......... ५५ ६०-वैराग्य-निरूपण ............ १०२ ४२-आत्मज्ञान ही मुक्तिका ६१-ध्यान-विधि ................. १०४ उपाय है ..................... ५५ ६२-आत्म-दृष्टि ................. १०५ ४३-आनन्दमय कोश ............ ५८ ६३-प्रपंचका बाध ............. १०९ ४४-आत्मस्वरूपविषयक प्रश्न .... ६० ६४-आत्म-चिन्तनका विधान .... १११ ४५-आत्मस्वरूप-निरूपण ........ ६० ६५-दृश्यकी उपेक्षा ............ ११२ ४६-ब्रह्म और जगत्की एकता ....६३ ६६-आत्मज्ञानका फल ........... ११३ ४७-ब्रह्म-निरूपण ................ ६६ ६७-जीवन्मुक्तके लक्षण ........ ११५ ४८-महावाक्य-विचार ........... ६७ ६८-प्रारब्ध-विचार ............ ११९ ४९-ब्रह्म-भावना ................ ७० ६९-नानात्व-निषेध ............ १२३ ५०-वासना-त्याग ................ ७५ ७०-आत्मानुभवका उपदेश ..... १२४ ५१-अध्यास-निरास ............. ७७ ७१-बोधोपलब्धि ............. १२७ ५२-अहंपदार्थ-निरूपण ......... ८० ७२-उपदेशका उपसंहार ......... १३६ ५३-अहंकार-निन्दा .............. ८१ ७३-शिष्यकी विदाई............ १४९ ५४-क्रिया, चिन्ता और ७४-अनुबन्ध-चतुष्टय .......... १४९ वासनाका त्याग ............ ८५ ७५-ग्रन्थ-प्रशंसा ............... १५० ५५-प्रमाद-निन्दा ................ ८७ ७६-भगवान् शंकराचार्य और ५६-असत्-परिहार ............. ९० विवेक-चूडामणि ......... १५१
॥ श्रीहरिः ॥ विवेक-चूडामणि नन्दितानि दिगन्तानि यस्यानन्दाम्बुविन्दुना। पूर्णानन्दं प्रभुं वन्दे स्वानन्दैकस्वरूपिणम् ॥ मंगलाचरण सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं तमगोचरम्। गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥ १ ॥ जो अज्ञेय होकर भी सम्पूर्ण वेदान्तके सिद्धान्त-वाक्योंसे जाने जाते हैं, उन परमानन्दस्वरूप सद्गुरुदेव श्रीगोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ। ब्रह्मनिष्ठाका महत्त्व जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता तस्माद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम्। आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थिति- र्मुक्तिर्नो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते ॥ २ ॥ जीवोंको प्रथम तो नरजन्म ही दुर्लभ है, उससे भी पुरुषत्व और उससे भी ब्राह्मणत्वका मिलना कठिन है; ब्राह्मण होनेसे भी वैदिक धर्मका अनुगामी होना और उससे भी विद्वत्ताका होना कठिन है। [यह सब कुछ होनेपर भी] आत्मा और अनात्माका विवेक, सम्यक् अनुभव, ब्रह्मात्मभावसे स्थिति और मुक्ति-ये तो करोड़ों जन्मोंमें किये हुए शुभ कर्मोंके परिपाकके बिना प्राप्त हो ही नहीं सकते। दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्। मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ ३ ॥
८ विवेक-चूडामणि भगवत्कृपा ही जिनकी प्राप्तिका कारण है वे मनुष्यत्व, मुमुक्षुत्व (मुक्त होनेकी इच्छा) और महान् पुरुषोंका संग—ये तीनों ही दुर्लभ हैं। लब्ध्वा कथञ्चिन्नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम्। यः स्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधीः स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात् ॥ ४॥ किसी प्रकार इस दुर्लभ मनुष्यजन्मको पाकर और उसमें भी, जिसमें श्रुतिके सिद्धान्तका ज्ञान होता है ऐसा पुरुषत्व पाकर जो मूढबुद्धि अपने आत्माकी मुक्तिके लिये प्रयत्न नहीं करता, वह निश्चय ही आत्मघाती है; वह असत्में आस्था रखनेके कारण अपनेको नष्ट करता है। इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति। दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम् ॥ ५॥ दुर्लभ मनुष्य-देह और उसमें भी पुरुषत्वको पाकर जो स्वार्थ- साधनमें प्रमाद करता है, उससे अधिक मूढ और कौन होगा? वदन्तु शास्त्राणि यजन्तु देवान् कुर्वन्तु कर्माणि भजन्तु देवताः। आत्मैक्यबोधेन विना विमुक्ति- र्न सिध्यति ब्रह्मशतान्तरेऽपि ॥ ६ ॥ भले ही कोई शास्त्रोंकी व्याख्या करें, देवताओंका यजन करें, नाना शुभ कर्म करें अथवा देवताओंको भजें, तथापि जबतक ब्रह्म और आत्माकी एकताका बोध नहीं होता तबतक सौ ब्रह्माओंके बीत जानेपर भी [ अर्थात् सौ कल्पमें भी ] मुक्ति नहीं हो सकती। अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेनेत्येव हि श्रुतिः। ब्रवीति कर्मणो मुक्तेरहेतुत्वं स्फुटं यतः ॥ ७ ॥ क्योंकि 'धनसे अमृतत्वकी आशा नहीं है' यह श्रुति 'मुक्तिका हेतु कर्म नहीं है,' यह बात स्पष्ट बतलाती है।
ज्ञानोपलब्धिका उपाय ९
ज्ञानोपलब्धिका उपाय
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत विद्वान् संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृहः सन्। सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा ॥ ८ ॥ इसलिये विद्वान् सम्पूर्ण बाह्य भोगोंकी इच्छा त्यागकर सन्तशिरोमणि गुरुदेवकी शरण जाकर उनके उपदेश किये हुए विषयमें समाहित होकर मुक्तिके लिये प्रयत्न करे। उद्धरेदात्मनात्मानं मग्नं संसारवारिधौ। योगारूढत्वमासाद्य सम्यग्दर्शननिष्ठया ॥ ९ ॥ और निरन्तर सत्य वस्तु आत्माके दर्शनमें स्थित रहता हुआ योगारूढ होकर संसार-समुद्रमें डूबे हुए अपने आत्माका आप ही उद्धार करे। संन्यस्य सर्वकर्माणि भवबन्धविमुक्तये। यत्यतां पण्डितैर्धीरैरात्माभ्यास उपस्थितैः ॥ १० ॥ आत्माभ्यासमें तत्पर हुए धीर विद्वानोंको सम्पूर्ण कर्मोंको त्यागकर भव-बन्धनकी निवृत्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये। वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किञ्चित् कर्मकोटिभिः ॥ ११ ॥ कर्म चित्तकी शुद्धिके लिये ही है, वस्तूपलब्धि (तत्त्वदृष्टि)-के लिये नहीं। वस्तु-सिद्धि तो विचारसे ही होती है, करोड़ों कर्मोंसे कुछ भी नहीं हो सकता। सम्यग्विचारतः सिद्धा रज्जुतत्त्वावधारणा। भ्रान्तोदितमहासर्पभयदुःखविनाशिनी ॥ १२ ॥ भलीभाँति विचारसे सिद्ध हुआ रज्जुतत्त्वका निश्चय भ्रमसे उत्पन्न हुए महान् सर्पभयरूपी दुःखको नष्ट करनेवाला होता है।
१० विवेक-चूडामणि अर्थस्य निश्चयो दृष्टो विचारेण हितोक्तितः । न स्नानेन न दानेन प्राणायामशतेन वा ॥ १३ ॥ कल्याणप्रद उक्तियोंद्वारा विचार करनेसे ही वस्तुका निश्चय होता देखा जाता है; स्नान, दान अथवा सैकड़ों प्राणायामोंसे नहीं। अधिकारिनिरूपण अधिकारिणमाशास्ते फलसिद्धिविशेषतः । उपाया देशकालाद्याः सन्त्यस्मिन्सहकारिणः ॥ १४ ॥ विशेषतः अधिकारीको ही फल-सिद्धि होती है; देश, काल आदि उपाय भी उसमें सहायक अवश्य होते हैं। अतो विचारः कर्तव्यो जिज्ञासोरात्मवस्तुनः । समासाद्य दयासिन्धुं गुरुं ब्रह्मविदुत्तमम् ॥ १५ ॥ अतः ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ दयासागर गुरुदेवकी शरणमें जाकर जिज्ञासुको आत्मतत्त्वका विचार करना चाहिये। मेधावी पुरुषो विद्वानूहापोहविचक्षणः । अधिकार्यात्मविद्यायामुक्तलक्षणलक्षितः ॥ १६ ॥ जो बुद्धिमान् हो, विद्वान् हो और तर्क-वितर्कमें कुशल हो, ऐसे लक्षणोंवाला पुरुष ही आत्मविद्याका अधिकारी होता है। विवेकिनो विरक्तस्य शमादिगुणशालिनः । मुमुक्षोरेव हि ब्रह्मजिज्ञासायोग्यता मता ॥ १७ ॥ जो सदसद्विवेकी, वैराग्यवान्, शम-दमादि षट्सम्पत्तियुक्त और मुमुक्षु हो उसीमें ब्रह्मजिज्ञासाकी योग्यता मानी गयी है। साधन-चतुष्टय साधनान्यत्र चत्वारि कथितानि मनीषिभिः । येषु सत्स्वेव सन्निष्ठा यदभावे न सिद्ध्यति ॥ १८ ॥
साधन-चतुष्टय ११ यहाँ मनस्वियोंने जिज्ञासाके चार साधन बताये हैं, उनके होनेसे ही सत्यस्वरूप आत्मामें स्थिति हो सकती है, उनके बिना नहीं। आदौ नित्यानित्यवस्तुविवेकः परिगण्यते। इहामुत्रफलभोगविरागस्तदनन्तरम् ॥१९॥ शमादिषट्कसम्पत्तिर्मुमुक्षुत्वमिति स्फुटम्। पहला साधन नित्यानित्य-वस्तु-विवेक गिना जाता है, दूसरा लौकिक एवं पारलौकिक सुख-भोगमें वैराग्य होना है, तीसरा शम, दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा, समाधान—ये छः सम्पत्तियाँ हैं और चौथा मुमुक्षुता है। ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्येत्येवंरूपो विनिश्चयः ॥२०॥ सोऽयं नित्यानित्यवस्तुविवेकः समुदाहृतः। 'ब्रह्म सत्य है और जगत् मिथ्या है' ऐसा जो निश्चय है यही 'नित्यानित्यवस्तु-विवेक' कहलाता है। तद्वैराग्यं जुगुप्सा या दर्शनश्रवणादिभिः ॥२१॥ देहादिब्रह्मपर्यन्ते ह्यनित्ये भोगवस्तुनि। दर्शन और श्रवणादिके द्वारा देहसे लेकर ब्रह्मलोकपर्यन्त सम्पूर्ण अनित्य भोग्य पदार्थोंमें जो घृणाबुद्धि है वही 'वैराग्य' है। विरज्य विषयव्राताद्दोषदृष्ट्या मुहुर्मुहुः ॥२२॥ स्वलक्ष्ये नियतावस्था मनसः शम उच्यते। बारम्बार दोष-दृष्टि करनेसे विषय-समूहसे विरक्त होकर चित्तका अपने लक्ष्यमें स्थिर हो जाना ही 'शम' है। विषयेभ्यः परावर्त्य स्थापनं स्वस्वगोलके ॥२३॥ उभयेषामिन्द्रियाणां स दमः परिकीर्तितः। बाह्यानालम्बनं वृत्तेरेषोपरतिरुत्तमा ॥२४॥ कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दोनोंको उनके विषयोंसे खींचकर अपने- अपने गोलकोंमें स्थित करना 'दम' कहलाता है। वृत्तिका बाह्य विषयोंका आश्रय न लेना यही उत्तम 'उपरति' है।
१२ विवेक-चूडामणि सहनं सर्वदुःखानामप्रतीकारपूर्वकम्। चिन्ताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते॥ २५॥ चिन्ता और शोकसे रहित होकर बिना कोई प्रतिकार किये सब प्रकारके कष्टोंका सहन करना 'तितिक्षा' कहलाती है। शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य सत्यबुद्ध्यवधारणम्। सा श्रद्धा कथिता सद्भिर्यया वस्तूपलभ्यते॥ २६॥ शास्त्र और गुरुवाक्योंमें सत्यत्व बुद्धि करना—इसीको सज्जनोंने 'श्रद्धा' कहा है, जिससे कि वस्तुकी प्राप्ति होती है। सर्वदा स्थापनं बुद्धेः शुद्धे ब्रह्मणि सर्वथा। तत्समाधानमित्युक्तं न तु चित्तस्य लालनम्॥ २७॥ अपनी बुद्धिको सब प्रकार शुद्ध ब्रह्ममें ही सदा स्थिर रखना इसीको 'समाधान' कहा है। चित्तकी इच्छापूर्तिका नाम समाधान नहीं है। अहंकारादिदेहान्तान्बन्धानज्ञानकल्पितान् । स्वस्वरूपावबोधेन मोक्तुमिच्छा मुमुक्षुता ॥ २८ ॥ अहंकारसे लेकर देहपर्यन्त जितने अज्ञान-कल्पित बन्धन हैं, उनको अपने स्वरूपके ज्ञानद्वारा त्यागनेकी इच्छा 'मुमुक्षुता' है। मन्दमध्यमरूपापि वैराग्येण शमादिना। प्रसादेन गुरोः सेयं प्रवृद्धा सूयते फलम् ॥ २९॥ वह मुमुक्षुता मन्द और मध्यम भी हो तो भी वैराग्य तथा शमादि षट्सम्पत्ति और गुरुकृपासे बढ़कर फल उत्पन्न करती है। वैराग्यं च मुमुक्षुत्वं तीव्रं यस्य तु विद्यते। तस्मिन्नेवार्थवन्तः स्युः फलवन्तः शमादयः ॥ ३० ॥ जिस पुरुषमें वैराग्य और मुमुक्षुत्व तीव्र होते हैं, उसीमें शमादि चरितार्थ और सफल होते हैं। एतयोर्मन्दता यत्र विरक्तत्वमुमुक्षयोः । मरौ सलिलवत्तत्र शमादेर्भासमात्रता ॥ ३१ ॥ जहाँ इन वैराग्य और मुमुक्षुत्वकी मन्दता है, वहाँ शमादिका भी मरुस्थलमें जल-प्रतीतिके समान आभासमात्र ही समझना चाहिये।
गुरूपसत्ति और प्रश्नविधि १३ मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी। स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते ॥ ३२ ॥ स्वात्मतत्त्वानुसन्धानं भक्तिरित्यपरे जगुः। मुक्तिकी कारणरूप सामग्रीमें भक्ति ही सबसे बढ़कर है और अपने वास्तविक स्वरूपका अनुसन्धान करना ही 'भक्ति' कहलाता है। कोई- कोई 'स्वात्म-तत्त्वका अनुसन्धान ही भक्ति है'—ऐसा कहते हैं। गुरूपसत्ति और प्रश्नविधि उक्तसाधनसम्पन्नस्तत्त्वजिज्ञासुरात्मनः ॥ ३३ ॥ उपसीदेद्गुरुं प्राज्ञं यस्माद्बन्धविमोक्षणम्। उक्त साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न आत्मतत्त्वका जिज्ञासु प्राज्ञ (स्थितप्रज्ञ) गुरुके निकट जाय, जिससे उसके भव-बन्धकी निवृत्ति हो। श्रोत्रियोऽवृजिनोऽकामहतो यो ब्रह्मवित्तमः ॥ ३४ ॥ ब्रह्मण्युपरतः शान्तो निरिन्धन इवानलः। अहैतुकदयासिन्धुर्बन्धुरानमतां सताम् ॥ ३५ ॥ तमाराध्य गुरुं भक्त्या प्रह्वप्रश्रयसेवनैः। प्रसन्नं तमनुप्राप्य पृच्छेज्ज्ञातव्यमात्मनः ॥ ३६ ॥ जो श्रोत्रिय हों, निष्पाप हों, कामनाओंसे शून्य हों, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हों, ब्रह्मनिष्ठ हों, ईंधनरहित अग्निके समान शान्त हों, अकारण दयासिन्धु हों और प्रणत (शरणापन्न) सज्जनोंके बन्धु (हितैषी) हों उन गुरुदेवकी विनीत और विनम्र सेवासे भक्तिपूर्वक आराधना करके, उनके प्रसन्न होनेपर निकट जाकर अपना ज्ञातव्य इस प्रकार पूछे— स्वामिन्नमस्ते नतलोकबन्धो कारुण्यसिन्धो पतितं भवाब्धौ। मामुद्धरात्मीयकटाक्षदृष्ट्या ऋज्व्यातिकारुण्यसुधाभिवृष्ट्या ॥ ३७ ॥
१४ विवेक-चूडामणि हे शरणागतवत्सल, करुणासागर, प्रभो ! आपको नमस्कार है। संसार- सागरमें पड़े हुए मेरा आप अपनी सरल तथा अतिशय कारुण्यामृतवर्षिणी कृपाकटाक्षसे उद्धार कीजिये। दुर्वारसंसारदवाग्नितप्तं दोधूयमानं दुरदृष्टवातैः। भीतं प्रपन्नं परिपाहि मृत्योः शरण्यमन्यं यदहं न जाने ॥ ३८ ॥ जिससे छुटकारा पाना अति कठिन है उस संसार-दावानलसे दग्ध तथा दुर्भाग्यरूपी प्रबल प्रभंजन (आँधी)-से अत्यन्त कम्पित और भयभीत हुए मुझ शरणागतकी आप मृत्युसे रक्षा कीजिये; क्योंकि इस समय मैं और किसी शरण देनेवालेको नहीं जानता। शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः। तीर्णाः स्वयं भीमभवार्णवं जना- नहेतुनान्यानपि तारयन्तः ॥ ३९ ॥ भयंकर संसार-सागरसे स्वयं उत्तीर्ण हुए और अन्य जनोंको भी बिना कारण ही तारते तथा लोकहितका आचरण करते अति शान्त महापुरुष ऋतुराज वसन्तके समान निवास करते हैं। अयं स्वभावः स्वत एव यत्पर- श्रमापनोदप्रवणं महात्मनाम्। सुधांशुरेष स्वयमर्ककर्कश- प्रभाभितप्तामवति क्षितिं किल ॥ ४० ॥ महात्माओंका यह स्वभाव ही है कि वे स्वतः ही दूसरोंका श्रम दूर
उपदेश-विधि १५ करनेमें प्रवृत्त होते हैं। सूर्यके प्रचण्ड तेजसे सन्तप्त पृथ्वीतलको चन्द्रदेव स्वयं ही शान्त कर देते हैं। ब्रह्मानन्दरसानुभूतिकलितैः पूतैः सुशीतैः सितै- र्युष्मद्वाक्कलशोज्झितैः श्रुतिसुखैर्वाक्यामृतैः सेचय। संतप्तं भवतापदावदहनज्वालाभिरेनं प्रभो धन्यास्ते भवदीक्षणक्षणगतेः पात्रीकृताः स्वीकृताः ॥ ४१ ॥ हे प्रभो! प्रचण्ड संसार-दावानलकी ज्वालासे तपे हुए इस दीन- शरणापन्नको आप अपने ब्रह्मानन्दरसानुभवसे युक्त परम पुनीत, सुशीतल, निर्मल और वाक्-रूपी स्वर्णकलशसे निकले हुए श्रवणसुखद वचनामृतोंसे सींचिये [ अर्थात् इसके तापको शान्त कीजिये ]। वे धन्य हैं, जो आपके एक क्षणके करुणामय दृष्टिपथके पात्र होकर अपना लिये गये हैं। कथं तरेयं भवसिन्धुमेतं का वा गतिर्मे कतमोऽस्त्युपायः। जाने न किञ्चित्कृपयाव मां भो संसारदुःखक्षतिमातनुष्व ॥ ४२ ॥ 'मैं इस संसार-समुद्रको कैसे तरूँगा ? मेरी क्या गति होगी ? उसका क्या उपाय है ?'—यह मैं कुछ नहीं जानता। प्रभो! कृपया मेरी रक्षा कीजिये और मेरे संसार-दुःखके क्षयका आयोजन कीजिये। उपदेश-विधि तथा वदन्तं शरणागतं स्वं संसारदावानलतापतप्तम् । निरीक्ष्य कारुण्यरसार्द्रदृष्ट्या दद्यादभीतिं सहसा महात्मा ॥ ४३ ॥ इस प्रकार कहते हुए, अपनी शरणमें आये संसारानल-सन्तप्त शिष्यको महात्मा गुरु करुणामयी दृष्टिसे देखकर सहसा अभय प्रदान करे।
१६ विवेक-चूडामणि विद्वान्स तस्मा उपसत्तिमियुषे मुमुक्षवे साधु यथोक्तकारिणे। प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय तत्त्वोपदेशं कृपयैव कुर्यात् ॥ ४४॥ शरणागतिकी इच्छावाले उस मुमुक्षु, आज्ञाकारी, शान्तचित्त, शमादि- संयुक्त साधु शिष्यको गुरु कृपया [ इस प्रकार ] तत्त्वोपदेश करे— श्रीगुरुरुवाच मा भैष्ट विद्वंस्तव नास्त्यपायः संसारसिन्धोस्तरणेऽस्त्युपायः । येनैव याता यतयोऽस्य पारं तमेव मार्गं तव निर्दिशामि ॥ ४५ ॥ गुरु—हे विद्वन्! तू डर मत, तेरा नाश नहीं होगा। संसार-सागरसे तरनेका उपाय है। जिस मार्गसे यतिजन इसके पार गये हैं, वही मार्ग मैं तुझे दिखाता हूँ। अस्त्युपायो महान्कश्चित्संसारभयनाशनः। येन तीर्त्वा भवाम्भोधिं परमानन्दमाप्स्यसि ॥ ४६ ॥ संसाररूपी भयका नाश करनेवाला कोई एक महान् उपाय है जिसके द्वारा तू संसार-सागरको पार करके परमानन्द प्राप्त करेगा। वेदान्तार्थविचारेण जायते ज्ञानमुत्तमम्। तेनात्यन्तिकसंसारदुःखनाशो भवत्यनु ॥ ४७ ॥ वेदान्त-वाक्योंके अर्थका विचार करनेसे उत्तम ज्ञान होता है, जिससे फिर संसार-दुःखका आत्यन्तिक नाश हो जाता है। श्रद्धाभक्तिध्यानयोगान्मुमुक्षो- र्मुक्तेर्हेतून्वक्ति साक्षाच्छ्रुतेर्गीः। यो वा एतेष्वेव तिष्ठत्यमुष्य मोक्षोऽविद्याकल्पिताद्देहबन्धात् ॥ ४८ ॥
प्रश्न-निरूपण १७ श्रद्धा, भक्ति, ध्यान और योग इनको भगवती श्रुति मुमुक्षुकी मुक्तिके साक्षात् हेतु बतलाती है। जो इन्हींमें स्थित हो जाता है उसका अविद्याकल्पित देह-बन्धनसे मोक्ष हो जाता है। अज्ञानयोगात्परमात्मनस्तव ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः। तयोर्विवेकोदितबोधवह्नि- रज्ञानकार्यं प्रदहेत्समूलम् ॥ ४९ ॥ तुझ परमात्माका अनात्म-बन्धन अज्ञानके कारण ही है और उसीसे तुझको [जन्म-मरणरूप] संसार प्राप्त हुआ है। अतः उन (आत्मा और अनात्मा) के विवेकसे उत्पन्न हुआ बोधरूप अग्नि अज्ञानके कार्यरूप संसारको मूलसहित भस्म कर देगा। प्रश्न-निरूपण शिष्य उवाच कृपया श्रूयतां स्वामिन्प्रश्नोऽयं क्रियते मया। तदुत्तरमहं श्रुत्वा कृतार्थः स्यां भवन्मुखात् ॥ ५० ॥ शिष्य—हे स्वामिन्! कृपया सुनिये; मैं यह प्रश्न करता हूँ। उसका उत्तर आपके श्रीमुखसे सुनकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा। को नाम बन्धः कथमेष आगतः कथं प्रतिष्ठास्य कथं विमोक्षः। कोऽसावनात्मा परमः क आत्मा तयोर्विवेकः कथमेतदुच्यताम् ॥ ५१ ॥ बन्ध क्या है ? यह कैसे हुआ ? इसकी स्थिति कैसे है ? और इससे मोक्ष कैसे मिल सकता है ? अनात्मा क्या है ? परमात्मा किसे कहते हैं ? और उनका विवेक (पार्थक्य-ज्ञान) कैसे होता है ? कृपया यह सब कहिये।
१८ विवेक-चूडामणि शिष्य-प्रशंसा श्रीगुरुरुवाच धन्योऽसि कृतकृत्योऽसि पावितं ते कुलं त्वया। यदविद्याबन्धमुक्त्या ब्रह्मीभवितुमिच्छसि ॥ ५२ ॥ गुरु—तू धन्य है, कृतकृत्य है, तेरा कुल तुझसे पवित्र हो गया, क्योंकि तू अविद्यारूपी बन्धनसे छूटकर ब्रह्मभावको प्राप्त होना चाहता है। स्व-प्रयत्नकी प्रधानता ऋणमोचनकर्तारः पितुः सन्ति सुतादयः। बन्धमोचनकर्ता तु स्वस्मादन्यो न कश्चन ॥ ५३ ॥ पिताके ऋणको चुकानेवाले तो पुत्रादि भी होते हैं, परन्तु भवबन्धनसे छुड़ानेवाला अपनेसे भिन्न और कोई नहीं है। मस्तकन्यस्तभारादेर्दुःखमन्यैर्निवार्यते । क्षुदादिकृतदुःखं तु विना स्वेन न केनचित् ॥ ५४ ॥ [ जैसे ] सिरपर रखे हुए बोझेका दुःख और भी दूर कर सकते हैं, परन्तु भूख-प्यास आदिका दुःख अपने सिवा और कोई नहीं मिटा सकता। पथ्यमौषधसेवा च क्रियते येन रोगिणा। आरोग्यसिद्धिर्दृष्टास्य नान्यानुष्ठितकर्मणा ॥ ५५ ॥ अथवा जैसे जो रोगी पथ्य और औषधका सेवन करता है उसीको आरोग्य-सिद्धि होती देखी जाती है, किसी औरके द्वारा किये हुए कर्मोंसे कोई नीरोग नहीं होता। वस्तुस्वरूपं स्फुटबोधचक्षुषा स्वेनैव वेद्यं ननु पण्डितेन। चन्द्रस्वरूपं निजचक्षुषैव ज्ञातव्यमन्यैरवगम्यते किम् ॥ ५६ ॥ [ वैसे ही ] विवेकी पुरुषको वस्तुका स्वरूप भी स्वयं अपने ज्ञान-
आत्मज्ञानका महत्त्व १९ नेत्रोंसे ही जानना चाहिये, [ किसी अन्यके द्वारा नहीं ] । चन्द्रमाका स्वरूप अपने ही नेत्रोंसे देखा जाता है, दूसरोंके द्वारा क्या जाना जा सकता है? अविद्याकामकर्मादिपाशबन्धं विमोचितुम्। कः शक्नुयाद्विनात्मानं कल्पकोटिशतैरपि॥ ५७॥ अविद्या, कामना और कर्मादिके जालके बन्धनोंको सौ करोड़ कल्पोंमें भी अपने सिवा और कौन खोल सकता है? आत्मज्ञानका महत्त्व न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया। ब्रह्मात्मैकत्वबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा॥ ५८॥ मोक्ष न योगसे सिद्ध होता है, न सांख्यसे, न कर्मसे और न विद्यासे। वह केवल ब्रह्मात्मैक्य-बोध (ब्रह्म और आत्माकी एकताके ज्ञान)-से ही होता है और किसी प्रकार नहीं। वीणाया रूपसौन्दर्यं तन्त्रीवादनसौष्ठवम्। प्रजारञ्जनमात्रं तन्न साम्राज्याय कल्पते॥ ५९॥ वाग्वैखरी शब्दझरी शास्त्रव्याख्यानकौशलम्। वैदुष्यं विदुषां तद्वद्भुक्तये न तु मुक्तये॥ ६०॥ जिस प्रकार वीणाका रूप-लावण्य तथा तन्त्रीको बजानेका सुन्दर ढंग मनुष्योंके मनोरंजनका ही कारण होता है, उससे कुछ साम्राज्यकी प्राप्ति नहीं हो जाती; उसी प्रकार विद्वानोंकी वाणीकी कुशलता, शब्दोंकी धारावाहिकता, शास्त्र- व्याख्यानकी कुशलता और विद्वत्ता भोगहीका कारण हो सकती हैं, मोक्षका नहीं। अविज्ञाते परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला। विज्ञातेऽपि परे तत्त्वे शास्त्राधीतिस्तु निष्फला॥ ६१॥ परमतत्त्वको यदि न जाना तो शास्त्राध्ययन निष्फल (व्यर्थ) ही है और यदि परमतत्त्वको जान लिया तो भी शास्त्राध्ययन निष्फल (अनावश्यक) ही है। शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमणकारणम्। अतः प्रयत्नाज्ज्ञातव्यं तत्त्वज्ञात्तत्त्वमात्मनः॥ ६२॥
२० विवेक-चूडामणि शब्दजाल तो चित्तको भटकानेवाला एक महान् वन है, इसलिये किन्हीं तत्त्वज्ञानी महात्मासे प्रयत्नपूर्वक आत्मतत्त्वको जानना चाहिये। अज्ञानसर्पदष्टस्य ब्रह्मज्ञानौषधं विना। किमु वेदैश्च शास्त्रैश्च किमु मन्त्रैः किमौषधैः ॥ ६३ ॥ अज्ञानरूपी सर्पसे डँसे हुएको ब्रह्मज्ञानरूपी ओषधिके बिना वेदसे, शास्त्रसे, मन्त्रसे और औषधसे क्या लाभ ? अपरोक्षानुभवकी आवश्यकता न गच्छति विना पानं व्याधिरौषधशब्दतः। विनापरोक्षानुभवं ब्रह्मशब्दैर्न मुच्यते ॥ ६४ ॥ औषधको बिना पिये केवल औषध-शब्दके उच्चारणमात्रसे रोग नहीं जाता, इसी प्रकार अपरोक्षानुभवके बिना केवल 'ब्रह्म, ब्रह्म' कहनेसे कोई मुक्त नहीं हो सकता। अकृत्वा दृश्यविलयमज्ञात्वा तत्त्वमात्मनः। बाह्यशब्दैः कुतो मुक्तिरुक्तिमात्रफलैर्नृणाम् ॥ ६५ ॥ बिना दृश्य-प्रपंचका विलय किये और आत्मतत्त्वको जाने केवल बाह्य शब्दोंसे, जिनका फल केवल उच्चारणमात्र ही है, मनुष्योंकी मुक्ति कैसे हो सकती है ? अकृत्वा शत्रुसंहारमगत्वाखिलभूश्रियम्। राजाहमिति शब्दान्नो राजा भवितुमर्हति ॥ ६६ ॥ बिना शत्रुओंका वध किये और बिना सम्पूर्ण पृथिवीमण्डलका ऐश्वर्य प्राप्त किये, 'मैं राजा हूँ'—ऐसा कहनेसे ही कोई राजा नहीं हो जाता। आप्तोक्तिं खननं तथोपरिशिलाद्युत्कर्षणं स्वीकृतिं निक्षेपः समपेक्षते न हि बहिः शब्दैस्तु निर्गच्छति। तद्वद् ब्रह्मविदोपदेशमननध्यानादिभिर्लभ्यते मायाकार्यतिरोहितं स्वममलं तत्त्वं न दुर्युक्तिभिः ॥ ६७॥
प्रश्न-विचार २१ [पृथ्वीमें गड़े हुए धनको प्राप्त करनेके लिये जैसे] प्रथम किसी विश्वसनीय पुरुषके कथनकी और फिर पृथिवीको खोदने, कंकड़- पत्थर आदिको हटाने तथा [प्राप्त हुए धनको] स्वीकार करनेकी आवश्यकता होती है—कोरी बातोंसे वह बाहर नहीं निकलता, उसी प्रकार समस्त मायिक-प्रपंचसे शून्य निर्मल आत्मतत्त्व भी ब्रह्मवित् गुरुके उपदेश तथा उसके मनन और निदिध्यासनादिसे ही प्राप्त होता है, थोथी बातोंसे नहीं। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भवबन्धविमुक्तये । स्वैरेव यत्नः कर्तव्यो रोगादाविव पण्डितैः ॥ ६८ ॥ इसलिये रोग आदिके समान भव-बन्धकी निवृत्तिके लिये विद्वान्को अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर स्वयं ही प्रयत्न करना चाहिये। प्रश्न-विचार यस्त्वयाद्य कृतः प्रश्नो वरीयाञ्छास्त्रविन्मतः । सूत्रप्रायो निगूढार्थो ज्ञातव्यश्च मुमुक्षुभिः ॥ ६९ ॥ तूने आज जो प्रश्न किया है, शास्त्रज्ञ जन उसको बहुत श्रेष्ठ मानते हैं। वह प्रायः सूत्ररूप (संक्षिप्त) है, तो भी गम्भीर अर्थयुक्त और मुमुक्षुओंके जाननेयोग्य है। शृणुष्वावहितो विद्वन्यन्मया समुदीर्यते । तदेतच्छ्रवणात्सद्यो भवबन्धाद्विमोक्ष्यसे ॥ ७० ॥ हे विद्वन्! जो मैं कहता हूँ, सावधान होकर सुन; उसको सुननेसे तू शीघ्र ही भवबन्धनसे छूट जायगा। मोक्षस्य हेतुः प्रथमो निगद्यते वैराग्यमत्यन्तमनित्यवस्तुषु । ततः शमश्चापि दमस्तितिक्षा न्यासः प्रसक्ताखिलकर्मणां भृशम् ॥ ७१ ॥
२२ विवेक-चूड़ामणि ततः श्रुतिस्तन्मननं सततत्व- ध्यानं चिरं नित्यनिरन्तरं मुनेः । ततोऽविकल्पं परमेत्य विद्वा- निहैव निर्वाणसुखं समृच्छति ॥ ७२ ॥ मोक्षका प्रथम हेतु अनित्य वस्तुओंमें अत्यन्त वैराग्य होना कहा है, तदनन्तर शम, दम, तितिक्षा और सम्पूर्ण आसक्तियुक्त कर्मोंका सर्वथा त्याग है। तदुपरान्त मुनिको श्रवण, मनन और चिरकालतक नित्य-निरन्तर आत्म-तत्त्वका ध्यान करना चाहिये। तब वह विद्वान् परम निर्विकल्पावस्थाको प्राप्त होकर निर्वाण-सुखको पाता है। यद्बोद्धव्यं तवेदानीमात्मानात्मविवेचनम् । तदुच्यते मया सम्यक् श्रुत्वात्मन्यवधारय ॥ ७३ ॥ जो आत्मानात्मविवेक अब तुझे जानना चाहिये वह मैं समझाता हूँ, तू उसे भलीभाँति सुनकर अपने चित्तमें स्थिर कर।
स्थूल शरीरका वर्णन मज्जास्थिमेदःपलरक्तचर्म- त्वगाह्वयैर्धातुभिरेभिरन्वितम् । पादोरुवक्षोभुजपृष्ठमस्तकै- रङ्गैरुपाङ्गैरुपयुक्तमेतत् ॥ ७४ ॥ अहम्ममेति प्रथितं शरीरं मोहास्पदं स्थूलमितीर्यते बुधैः। मज्जा, अस्थि, मेद, मांस, रक्त, चर्म और त्वचा—इन सात धातुओंसे बने हुए तथा चरण, जंघा, वक्षःस्थल (छाती), भुजा, पीठ और मस्तक आदि अंगोपांगोंसे युक्त, 'मैं और मेरा' रूपसे प्रसिद्ध इस मोहके आश्रयरूप देहको विद्वान् लोग 'स्थूल शरीर' कहते हैं। नभोनभस्वद्दहनाम्बुभूमयः सूक्ष्माणि भूतानि भवन्ति तानि ॥ ७५ ॥ परस्परांशैर्मिलितानि भूत्वा स्थूलानि च स्थूलशरीरहेतवः । मात्रास्तदीया विषया भवन्ति शब्दादयः पञ्च सुखाय भोक्तुः ॥ ७६ ॥ आकाश, वायु, तेज, जल और पृथिवी—ये सूक्ष्म भूत हैं। इनके अंश परस्पर मिलनेसे स्थूल होकर स्थूल शरीरके हेतु होते हैं और इन्हींकी तन्मात्राएँ भोक्ता जीवके भोगरूप सुखके लिये शब्दादि पाँच विषय हो जाती हैं। य एषु मूढा विषयेषु बद्धा रागोरुपाशेन सुदुर्दमेन। आयान्ति निर्यान्त्यध ऊर्ध्वमुच्चैः स्वकर्मदूतेन जवेन नीताः ॥ ७७ ॥