विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 130, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ेंबोधोपलब्धि १३३ रवेर्यथा कर्मणि साक्षिभावो वह्नेर्यथा वायसि दाहकत्वम्। रज्जौर्यथारोपितवस्तुसङ्ग- स्तथैव कूटस्थचिदात्मनो मे॥५०७॥ मनुष्योंके कर्मोंमें जैसे सूर्यका साक्षीभाव है, लोहेके जलानेमें जैसे अग्निकी दाहकता है और आरोपित सर्पादिसे जैसे रज्जुका संग है, वैसे ही मुझ कूटस्थ चेतन आत्माका विषयोंमें साक्षीभाव है। [अर्थात् जैसे उनकी प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक हैं, क्रियमाण नहीं, वैसे ही आत्माका साक्षीभाव भी विषयोंकी अपेक्षासे स्वाभाविक है, वह उसकी क्रिया नहीं है।] कर्तापि वा कारयितापि नाहं भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम्। द्रष्टापि वा दर्शयितापि नाहं सोऽहं स्वयंज्योतिरनीदृगात्मा॥५०८॥ मैं न करनेवाला हूँ, न करानेवाला हूँ; न भोगनेवाला हूँ, न भुगतवानेवाला हूँ; और न देखनेवाला हूँ, न दिखानेवाला हूँ। मैं तो सबसे विलक्षण स्वयंप्रकाश आत्मा ही हूँ। चलत्युपाधौ प्रतिबिम्बलौल्य- मौपाधिकं मूढधियो नयन्ति। स्वविम्बभूतं रविवद्विनिष्क्रियं कर्तास्मि भोक्तास्मि हतोऽस्मि हेति॥५०९॥ जिस प्रकार [ जलरूप ] उपाधिके चंचल होनेपर मूढबुद्धि पुरुष औपाधिक प्रतिबिम्बकी चंचलताका विम्बभूत सूर्यमें आरोप करते हैं, उसी प्रकार वे सूर्यके समान निष्क्रिय आत्मामें [ चित्तकी चंचलताका आरोप कर ] 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ, हाय मारा गया' ऐसा कहा करते हैं। जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः। नाहं विलिप्य तद्धर्मैर्घटधर्मैर्नभो यथा॥५१०॥