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विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

बोधोपलब्धि १३३ रवेर्यथा कर्मणि साक्षिभावो वह्नेर्यथा वायसि दाहकत्वम्। रज्जौर्यथारोपितवस्तुसङ्ग- स्तथैव कूटस्थचिदात्मनो मे॥५०७॥ मनुष्योंके कर्मोंमें जैसे सूर्यका साक्षीभाव है, लोहेके जलानेमें जैसे अग्निकी दाहकता है और आरोपित सर्पादिसे जैसे रज्जुका संग है, वैसे ही मुझ कूटस्थ चेतन आत्माका विषयोंमें साक्षीभाव है। [अर्थात् जैसे उनकी प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक हैं, क्रियमाण नहीं, वैसे ही आत्माका साक्षीभाव भी विषयोंकी अपेक्षासे स्वाभाविक है, वह उसकी क्रिया नहीं है।] कर्तापि वा कारयितापि नाहं भोक्तापि वा भोजयितापि नाहम्। द्रष्टापि वा दर्शयितापि नाहं सोऽहं स्वयंज्योतिरनीदृगात्मा॥५०८॥ मैं न करनेवाला हूँ, न करानेवाला हूँ; न भोगनेवाला हूँ, न भुगतवानेवाला हूँ; और न देखनेवाला हूँ, न दिखानेवाला हूँ। मैं तो सबसे विलक्षण स्वयंप्रकाश आत्मा ही हूँ। चलत्युपाधौ प्रतिबिम्बलौल्य- मौपाधिकं मूढधियो नयन्ति। स्वविम्बभूतं रविवद्विनिष्क्रियं कर्तास्मि भोक्तास्मि हतोऽस्मि हेति॥५०९॥ जिस प्रकार [ जलरूप ] उपाधिके चंचल होनेपर मूढबुद्धि पुरुष औपाधिक प्रतिबिम्बकी चंचलताका विम्बभूत सूर्यमें आरोप करते हैं, उसी प्रकार वे सूर्यके समान निष्क्रिय आत्मामें [ चित्तकी चंचलताका आरोप कर ] 'मैं कर्ता हूँ, भोक्ता हूँ, हाय मारा गया' ऐसा कहा करते हैं। जले वापि स्थले वापि लुठत्वेष जडात्मकः। नाहं विलिप्य तद्धर्मैर्घटधर्मैर्नभो यथा॥५१०॥

१३४ विवेक-चूड़ामणि घड़ेके धर्मोंसे जैसे आकाशका कोई सम्बन्ध नहीं होता वैसे ही यह जड देह जलमें अथवा स्थलमें कहीं भी लोटता रहे मैं इसके धर्मोंसे लिप्त नहीं हो सकता। कर्तृत्वभोक्तृत्वखलत्वमत्तता- जडत्वबद्धत्वविमुक्ततादयः । बुद्धेर्विकल्पा न तु सन्ति वस्तुतः स्वस्मिन्यरे ब्रह्मणि केवलेऽद्वये ॥ ५११ ॥ कर्तापन, भोक्तापन, दुष्टता, उन्मत्तता, जडता, बन्धन और मोक्ष— ये सब बुद्धिकी ही कल्पनाएँ हैं; ये प्रकृति आदिसे अतीत केवल अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप स्वात्मामें वस्तुतः नहीं हैं। सन्तु विकाराः प्रकृतेर्दशधा शतधा सहस्रधा वापि। किं मेऽसंगचितेस्तैर्न घनः क्वचिदम्बरं स्पृशति ॥ ५१२ ॥ प्रकृतिमें दसों, सैकड़ों और हजारों विकार क्यों न हों, उनसे मुझ असंग चेतन आत्माका क्या सम्बन्ध ? मेघ कभी भी आकाशको नहीं छू सकता। अव्यक्तादिस्थूलपर्यन्तमेत- द्विश्वं यत्राभासमात्रं प्रतीतम्। व्योमप्रख्यं सूक्ष्ममाद्यन्तहीनं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ ५१३ ॥ अव्यक्तसे लेकर स्थूलभूतपर्यन्त यह समस्त विश्व जिसमें आभासमात्र प्रतीत होता है तथा जो आकाशके समान सूक्ष्म और आदि-अन्तसे रहित अद्वैत ब्रह्म है, वही मैं हूँ। सर्वाधारं सर्ववस्तुप्रकाशं सर्वाकारं सर्वगं सर्वशून्यम्। नित्यं शुद्धं निश्चलं निर्विकल्पं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि ॥ ५१४ ॥

बोधोपलब्धि १३५ जो सबका आधार, सब वस्तुओंका प्रकाशक, सर्वरूप, सर्वव्यापी, सबसे रहित, नित्य, शुद्ध, निश्चल और विकल्परहित अद्वैत ब्रह्म है, वही मैं हूँ। यत्प्रत्यस्ताशेषमायाविशेषं प्रत्यग्रूपं प्रत्ययागम्यमानम्। सत्यज्ञानानन्तमानन्दरूपं ब्रह्माद्वैतं यत्तदेवाहमस्मि॥५१५॥ जो समस्त मायिक भेदोंसे रहित, अन्तरात्मारूप और साक्षात् प्रतीतिका अविषय तथा अनन्त सच्चिदानन्दस्वरूप अद्वैत ब्रह्म है, वही मैं हूँ। निष्क्रियोऽस्म्यविकारोऽस्मि निष्कलोऽस्मि निराकृतिः। निर्विकल्पोऽस्मि नित्योऽस्मि निरालम्बोऽस्मि निर्द्वयः॥५१६॥ मैं क्रियारहित, विकाररहित, कलारहित और निराकार हूँ तथा निर्विकल्प, नित्य, निरालम्ब और अद्वितीय हूँ। सर्वात्मकोऽहं सर्वोऽहं सर्वातीतोऽहमद्वयः। केवलाखण्डबोधोऽहमानन्दोऽहं निरन्तरः॥५१७॥ मैं सबका आत्मा, सर्वरूप, सबसे परे और अद्वितीय हूँ; तथा केवल अखण्डज्ञानस्वरूप और निरन्तर आनन्दरूप हूँ। स्वराज्यसाम्राज्यविभूतिरेषा भवत्कृपाश्रीमहिमप्रसादात् । प्राप्ता मया श्रीगुरवे महात्मने नमो नमस्तेऽस्तु पुनर्नमोऽस्तु॥५१८॥ हे गुरो! आपकी कृपा और महिमाके प्रसादसे मुझे यह स्वराज्य- साम्राज्यकी विभूति प्राप्त हुई है। आप महात्माको मेरा बारम्बार नमस्कार हो। महास्वप्ने मायाकृतजनिजरामृत्युगहने भ्रमन्तं क्लिश्यन्तं बहुलतरतापैरनुदिनम्। अहङ्कारव्याघ्रव्यथितमिममत्यन्तकृपया प्रबोध्य प्रस्वापात्परमवितवान्मामसि गुरो॥५१९॥

१३६ विवेक-चूड़ामणि मैं मायासे प्रतीत होनेवाले जन्म, जरा और मृत्युके कारण अत्यन्त भयानक महास्वप्नमें भटकता हुआ दिन-दिन नाना प्रकारके तापोंसे सन्तप्त हो रहा था, हे गुरो! अहंकाररूपी व्याघ्रसे अत्यन्त व्यथित मुझ दीनको निद्रासे जगाकर आपने मेरी बहुत बड़ी रक्षा की है। नमस्तस्मै सदेकस्मै कस्मैचिन्महसे नमः। यदेतद्विश्वरूपेण राजते गुरुराज ते॥५२०॥ हे गुरुराज! आपके किसी उस महान् तेजको नमस्कार है, जो सत्स्वरूप और एक होकर भी विश्वरूपसे विराजमान है। उपदेशका उपसंहार इति नतमवलोक्य शिष्यवर्यं समधिगतात्मसुखं प्रबुद्धतत्त्वम्। प्रमुदितहृदयः स देशिकेन्द्रः पुनरिदमाह वचः परं महात्मा ॥५२१॥ इस प्रकार आत्मानन्द और तत्त्वबोधको प्राप्त हुए उस शिष्य श्रेष्ठको प्रणाम करते देख महात्मा गुरुदेव अति प्रसन्नचित्तसे फिर इस प्रकार श्रेष्ठ वचन कहने लगे। ब्रह्मप्रत्ययसन्ततिर्जगदतो ब्रह्मैव सत्सर्वतः पश्याध्यात्मदृशा प्रशान्तमनसा सर्वास्ववस्थास्वपि। रूपादन्यदवेक्षितुं किमभितश्चक्षुष्मतां विद्यते तद्वद्ब्रह्मविदः सतः किमपरं बुद्धेर्विहारास्पदम् ॥५२२॥ हे वत्स! अपनी आध्यात्मिक दृष्टिसे शान्तचित्त होकर सब अवस्थाओंमें ऐसा ही देख कि यह संसार ब्रह्म-प्रतीतिका ही प्रवाह है, इसलिये यह सर्वथा सत्यस्वरूप ब्रह्म ही है। नेत्रयुक्त व्यक्तिको चारों ओर देखनेके लिये रूपके अतिरिक्त और क्या वस्तु है? उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानीकी बुद्धिका विषय सत्यस्वरूप ब्रह्मसे अतिरिक्त और क्या हो सकता है?

उपदेशका उपसंहार १३७ कस्तां परानन्दरसानुभूति- मुत्सृज्य शून्येषु रमेत विद्वान्। चन्द्रे महाह्लादिनि दीप्यमाने चित्रेन्दुमालोकयितुं क इच्छेत् ॥ ५२३ ॥ उस परमानन्दरसके अनुभवको छोड़कर अन्य थोथे विषयोंमें कौन बुद्धिमान् रमण करेगा ? अति आनन्ददायक पूर्णचन्द्रके प्रकाशित रहते हुए चित्र-लिखित चन्द्रमाको देखनेकी इच्छा कौन करेगा ? असत्पदार्थानुभवे न किञ्चि- न ह्यस्ति तृप्तिर्न च दुःखहानिः । तदद्वयानन्दरसानुभूत्या तृप्तः सुखं तिष्ठ सदात्मनिष्ठया ॥ ५२४ ॥ असत् पदार्थोंके अनुभवसे न तो कुछ तृप्ति ही होती है और न दुःखका नाश ही; अतः इस अद्वयानन्दरसके अनुभवसे तृप्त होकर सत्य आत्मनिष्ठ-भावसे सुखपूर्वक स्थित हो। स्वमेव सर्वथा पश्यन्मन्यमानः स्वमद्वयम्। स्वानन्दमनुभुञ्जानः कालं नय महामते ॥ ५२५ ॥ हे महाबुद्धे ! सब ओर केवल अपनेको ही देखता हुआ, अपनेको अद्वितीय मानता हुआ और आत्मानन्दका अनुभव करता हुआ कालक्षेप कर। अखण्डबोधात्मनि निर्विकल्पे विकल्पनं व्योम्नि पुरःप्रकल्पनम्। तदद्वयानन्दमयात्मना सदा शान्तिं परामेत्य भजस्व मौनम् ॥ ५२६ ॥ अखण्डबोधस्वरूप निर्विकल्प आत्मामें किसी विकल्पका होना आकाशमें नगरकी कल्पनाके समान है। इसलिये अद्वितीय आनन्दमय आत्मस्वरूपसे स्थित होकर परमशान्ति लाभ कर मौन धारण करो।

१३८ विवेक-चूड़ामणि तूष्णीमवस्था परमोपशान्ति- र्बुद्धेरसत्कल्पविकल्पहेतोः । ब्रह्मात्मना ब्रह्मविदो महात्मनो यत्राद्वयानन्दसुखं निरन्तरम् ॥ ५२७ ॥ महात्मा ब्रह्मवेत्ताके मिथ्या विकल्पोंकी हेतुभूता बुद्धिकी जो ब्रह्मभावसे मौनावस्था है वही परम उपशम है, जिसमें कि निरन्तर अद्वयानन्दरसका अनुभव होता है। नास्ति निर्वासनान्मौनात्परं सुखकृदुत्तमम् । विज्ञातात्मस्वरूपस्य स्वानन्दरसपायिनः ॥ ५२८ ॥ जिसने आत्मस्वरूपको जान लिया है उस स्वानन्दरसका पान करनेवाले पुरुषके लिये वासनारहित मौनसे बढ़कर उत्तम सुखदायक और कुछ भी नहीं है। गच्छंस्तिष्ठन्नुपविशञ्छयानो वान्यथापि वा। यथेच्छया वसेद्विद्वानात्मारामः सदा मुनिः ॥ ५२९ ॥ विद्वान् मुनिको उचित है कि चलते-फिरते, बैठते-उठते, सोते-जागते अथवा किसी और अवस्थामें रहते निरन्तर आत्मामें रमण करता हुआ इच्छानुकूल रहे। न देशकालासनदिग्यमादि- लक्ष्याद्यपेक्षा प्रतिबद्धवृत्तेः । संसिद्धतत्त्वस्य महात्मनोऽस्ति स्ववेदने का नियमाद्यपेक्षा ॥ ५३० ॥ जिसकी चित्तवृत्ति निरन्तर आत्मस्वरूपमें लगी रहती है तथा जिसे आत्मतत्त्वकी सिद्धि हो गयी है उस महापुरुषको [ध्यानादिके उपयोगी] देश, काल, आसन, दिशा, यम, नियम तथा लक्ष्य आदिकी कोई आवश्यकता नहीं है। अपने-आपको जाननेके लिये भला नियम आदिकी क्या अपेक्षा है?

उपदेशका उपसंहार १३१ घटोऽयमिति विज्ञातुं नियमः को न्वपेक्ष्यते। विना प्रमाणसुष्ठुत्वं यस्मिन्सति पदार्थधीः॥ ५३१॥ 'यह घड़ा है' ऐसा जाननेके लिये, जिससे वस्तुका ज्ञान होता है, उस प्रमाण-सौष्ठवके अतिरिक्त भला और किस नियमकी आवश्यकता है? अयमात्मा नित्यसिद्धः प्रमाणे सति भासते। न देशं नापि वा कालं न शुद्धिं वाप्यपेक्षते ॥ ५३२ ॥ आत्मा नित्य-सिद्ध है, प्रमाणकी शुद्धि होते ही वह स्वयं भासने लगता है। [अपनी प्रतीतिके लिये] वह देश, काल अथवा शुद्धि आदि किसीकी भी अपेक्षा नहीं रखता। देवदत्तोऽहमित्येतद्विज्ञानं निरपेक्षकम्। तद्वद्ब्रह्मविदोऽप्यस्य ब्रह्माहमिति वेदनम् ॥ ५३३ ॥ जिस प्रकार 'मैं देवदत्त हूँ' इस ज्ञानमें किसी नियमकी अपेक्षा नहीं है उसी प्रकार ब्रह्मवेत्ताको 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान स्वतः ही होता है। भानुनेव जगत्सर्वं भासते यस्य तेजसा। अनात्मकमसत्तुच्छं किं नु तस्यावभासकम् ॥ ५३४॥ सूर्यसे जैसे जगत् प्रकाशित होता है वैसे ही जिसके प्रकाशसे समस्त असत् और तुच्छ अनात्मपदार्थ भासते हैं उसको भासित करनेवाला और कौन हो सकता है? वेदशास्त्रपुराणानि भूतानि सकलान्यपि। येनार्थवन्ति तं किं नु विज्ञातारं प्रकाशयेत् ॥ ५३५ ॥ वेद, शास्त्र, पुराण और समस्त भूतमात्र जिससे अर्थवान् हो रहे हैं उस सर्वसाक्षी परमात्माको और कौन प्रकाशित करेगा? एष स्वयंज्योतिरनन्तशक्ति- रात्माप्रमेयः सकलानुभूतिः । यमेव विज्ञाय विमुक्तबन्धो जयत्ययं ब्रह्मविदुत्तमोत्तमः ॥ ५३६ ॥

१४० विवेक-चूडामणि यह [ सर्वसाक्षी ] आत्मा स्वयंप्रकाश, अनन्तशक्ति, अप्रमेय और सर्वानुभवस्वरूप है, इसको ही जान लेनेपर वह ब्रह्मवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ महात्मा संसार-बन्धनसे मुक्त होकर धन्य हो जाता है। न खिद्यते नो विषयैः प्रमोदते न सज्जते नापि विरज्यते च। स्वस्मिन्सदा क्रीडति नन्दति स्वयं निरन्तरानन्दरसेन तृप्तः ॥ ५३७॥ विषयोंके प्राप्त होनेपर वह न दुःखी होता है, न आनन्दित होता है, न उनमें आसक्त होता है और न उनसे विरक्त होता है। वह तो निरन्तर आत्मानन्दरससे तृप्त होकर स्वयं अपने-आपमें ही क्रीडा करता और आनन्दित होता है। क्षुधां देहव्यथां त्यक्त्वा बालः क्रीडति वस्तुनि। तथैव विद्वान् रमते निर्ममो निरहं सुखी ॥ ५३८ ॥ जिस प्रकार खिलौना मिलनेपर बालक अपनी भूख और शारीरिक व्यथाको भी भूलकर उससे खेलनेमें लगा रहता है उसी प्रकार अहंकार और ममतासे शून्य होकर विद्वान् अपने आत्मामें आनन्दपूर्वक रमण करता रहता है। चिन्ताशून्यमदैन्यभैक्षमशनं पानं सरिद्वारिषु स्वातन्त्र्येण निरङ्कुशा स्थितिरभीर्निद्रा श्मशाने वने । वस्त्रं क्षालनशोषणादिरहितं दिग्वास्तु शय्या मही सञ्चारो निगमान्तवीथिषु विदां क्रीडा परे ब्रह्मणि ॥ ५३९ ॥ ब्रह्मवेत्ता विद्वान्का चिन्ता और दीनतारहित भिक्षान्न ही भोजन तथा नदियोंका जल ही पान होता है। उनकी स्थिति स्वतन्त्रतापूर्वक और निरंकुश (मनमानी) होती है। उन्हें किसी प्रकारका भय नहीं होता, वे वन अथवा श्मशानमें सुखकी नींद सोते हैं। धोने-सुखाने आदिकी अपेक्षासे रहित दिशा [ अथवा वल्कलादि ] ही उनके वस्त्र हैं, पृथिवी ही बिछौना है, उनका आना-जाना वेदान्त-वीथियोंमें ही हुआ करता है और परब्रह्ममें ही उनकी क्रीडा होती है।

उपदेशका उपसंहार १४१ विमानमालम्ब्य शरीरमेतद् भुनक्त्यशेषान्विषयानुपस्थितान् । परेच्छया बालवदात्मवेत्ता योऽव्यक्तलिङ्गोऽननुषक्तबाह्यः ॥५४०॥ वह आत्मज्ञानी महापुरुष इस शरीररूप विमानमें बैठकर अर्थात् अपने सर्वाभिमानशून्य शरीरका आश्रय लेकर दूसरोंके द्वारा उपस्थित किये समस्त विषयोंको बालकके समान भोगता है; किन्तु वास्तवमें वह प्रकट- चिह्नरहित और बाह्य पदार्थोंमें आसक्तिरहित होता है। दिगम्बरो वापि च साम्बरो वा त्वगम्बरो वापि चिदम्बरस्थः। उन्मत्तवद्वापि च बालवद्वा पिशाचवद्वापि चरत्यवन्याम् ॥५४१॥ चैतन्यरूप वस्त्रसे युक्त वह महाभाग्यवान् पुरुष वस्त्रहीन, वस्त्रयुक्त अथवा मृगचर्मादि धारण करनेवाला होकर उन्मत्तके समान, बालकके समान अथवा पिशाचादिके समान स्वेच्छानुकूल भूमण्डलमें विचरता रहता है। कामान्नी कामरूपी संश्चरत्येकचरो मुनिः। स्वात्मनैव सदा तुष्टः स्वयं सर्वात्मना स्थितः ॥ ५४२॥ स्वयं सर्वात्मभावसे स्थित, सदा अपने आत्मामें ही सन्तुष्ट और अकेला विचरनेवाला वह मुनि अपने इच्छानुसार (जब इच्छा हो तब) अन्न ग्रहण करता है और मनमाना रूप धारणकर विचरता रहता है। क्वचिन्मूढो विद्वान्क्वचिदपि महाराजविभवः क्वचिद्भ्रान्तः सौम्यः क्वचिदजगराचारकलितः। क्वचित्पात्रीभूतः क्वचिदवमतः क्वाप्यविदित- श्चरत्येवं प्राज्ञः सततपरमानन्दसुखितः ॥ ५४३ ॥ ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कहीं मूढ, कहीं विद्वान् और कहीं राजा- महाराजाओंके-से ठाट-बाटसे युक्त दिखायी देता है। वह कहीं भ्रान्त, कहीं

१४२ विवेक-चूड़ामणि शान्त और कहीं अजगरके समान निश्चल भावसे पड़ा दीख पड़ता है। इस प्रकार निरन्तर परमानन्दमें मग्न हुआ विद्वान् कहीं सम्मानित, कहीं अपमानित और कहीं अज्ञात रहकर अलक्षित गतिसे विचरता है। निर्धनोऽपि सदा तुष्टोऽप्यसहायो महाबलः। नित्यतृप्तोऽप्यभुञ्जानोऽप्यसमः समदर्शनः॥ ५४४॥ वह निर्धन होनेपर भी सदा सन्तुष्ट, असहाय होनेपर भी महाबलवान्, भोजन न करनेपर भी नित्य-तृप्त और विषमभावसे बर्तता हुआ भी समदर्शी होता है। अपि कुर्वन्नकुर्वाणश्चाभोक्ता फलभोग्यपि। शरीर्यप्यशरीर्येष परिच्छिन्नोऽपि सर्वगः॥ ५४५॥ वह महात्मा सब कुछ करता हुआ भी अकर्ता है, नाना प्रकारके फल भोगता हुआ भी अभोक्ता है, शरीरधारी होनेपर भी अशरीरी है और परिच्छिन्न होनेपर भी सर्वव्यापी है। अशरीरं सदा सन्तमिमं ब्रह्मविदं क्वचित्। प्रियाप्रिये न स्पृशतस्तथैव च शुभाशुभे ॥ ५४६॥ सदा अशरीर-भावमें स्थित रहनेसे इस ब्रह्मवेत्ताको प्रिय अथवा अप्रिय तथा शुभ अथवा अशुभ कभी छू नहीं सकते। स्थूलादिसम्बन्धवतोऽभिमानिनः सुखं च दुःखं च शुभाशुभे च। विध्वस्तबन्धस्य सदात्मनो मुनेः कुतः शुभं वाप्यशुभं फलं वा ॥ ५४७॥ जिस देहाभिमानीका स्थूल-सूक्ष्म आदि देहोंसे सम्बन्ध होता है, उसीको सुख अथवा दुःख तथा शुभ अथवा अशुभकी प्राप्ति होती है; जिसका देहादि-बन्धन टूट गया है, उस सत्स्वरूप मुनिको शुभ अथवा अशुभ फलकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? तमसा ग्रस्तवद्भानाद्ग्रस्तोऽपि रविर्जनैः। ग्रस्त इत्युच्यते भ्रान्त्या ह्यज्ञात्वा वस्तुलक्षणम् ॥ ५४८॥

उपदेशका उपसंहार १४३ तद्देहादिबन्धेभ्यो विमुक्तं ब्रह्मवित्तमम्। पश्यन्ति देहिवन्मूढाः शरीराभासदर्शनात् ॥ ५४९ ॥ वास्तविक बातको न जाननेके कारण जैसे राहुसे ग्रस्त न होनेपर भी ग्रस्त-सा प्रतीत होनेके कारण लोग भ्रमवश सूर्यको राहु-ग्रस्त कहते हैं; वैसे ही देहादि-बन्धनसे छूटे हुए ब्रह्मवेत्ताका आभासमात्र शरीर देखकर अज्ञानीजन उसे देहयुक्त-सा मानते हैं। अहिनिर्व्लयनीवायं मुक्तदेहस्तु तिष्ठति। इतस्ततश्चाल्यमानो यत्किञ्चित्प्राणवायुना ॥ ५५० ॥ यह मुक्त पुरुषका शरीर तो साँपकी काँचुलीके समान प्राणवायुद्वारा कुछ इधर-उधर चलायमान होता हुआ पड़ा रहता है। [उसमें कर्तृत्वाभिमानका अत्यन्ताभाव होनेके कारण वास्तवमें क्रिया नहीं होती।] स्रोतसा नीयते दारु यथा निम्नोन्नतस्थलम्। दैवेन नीयते देहो यथाकालोपभुक्तिषु ॥ ५५१ ॥ जैसे जलके प्रवाहसे लकड़ी ऊँचे-नीचे स्थानोंमें बहा ले जायी जाती है, उसी प्रकार दैवके द्वारा ही उसका शरीर समयानुकूल भोगोंको प्राप्त करता है। प्रारब्धकर्मपरिकल्पितवासनाभिः संसारिवच्चरति भुक्तिषु मुक्तदेहः। सिद्धः स्वयं वसति साक्षिवदत्र तूष्णीं चक्रस्य मूलमिव कल्पविकल्पशून्यः ॥ ५५२ ॥ मुक्त पुरुषका शरीर प्रारब्धकर्मसे कल्पित वासनाओंद्वारा संसारी पुरुषके समान नाना भोगोंको भोगता है। सिद्ध पुरुष तो स्वयं कुलाल-चक्रके मूलकी भाँति संकल्प-विकल्पसे रहित होकर साक्षी-भावसे मौन होकर रहता है। नैवेन्द्रियाणि विषयेषु नियुङ्क्त एष नैवापयुङ्क्त उपदर्शनलक्षणस्थः। नैव क्रियाफलमपीषदवेक्षते स स्वानन्दसान्द्ररसपानसुमत्तचित्तः ॥ ५५३ ॥

१४४ विवेक-चूडामणि ब्रह्मवेत्ता पुरुष अत्यन्त सघन आत्मानन्दरसके पानसे मतवाला होकर साक्षीरूपसे स्थित हुआ इन्द्रियोंको न तो विषयोंमें लगाता है और न उन्हें विषयोंसे हटाता है। वह अपने कर्मोंके फलकी ओर तो देखता भी नहीं है। लक्ष्यालक्ष्यगतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना। शिव एव स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ॥ ५५४॥ जो लक्ष्य और अलक्ष्य दोनों दृष्टियोंको त्यागकर केवल एक आत्मस्वरूपसे स्थित रहता है वह ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महापुरुष साक्षात् शिव ही है। [ अर्थात् अन्य वस्तुके अभावके कारण जिसका कोई लक्ष्य (प्राप्तव्य) नहीं होता और जड अथवा सोये हुए पुरुषके समान जो ज्ञानशून्य भी नहीं होता वह पुरुष ही श्रेष्ठतम आत्मनिष्ठ है। ] जीवन्नेव सदा मुक्तः कृतार्थो ब्रह्मवित्तमः। उपाधिनाशाद्ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति निर्द्वयम् ॥ ५५५ ॥ ऐसा ब्रह्मज्ञानी जीता हुआ भी सदा मुक्त और कृतार्थ ही है, शरीररूप उपाधिके नष्ट होनेपर वह ब्रह्मभावमें स्थित हुआ ही अद्वितीय ब्रह्ममें लीन हो जाता है। शैलूषो वेषसद्भावाभावयोश्च यथा पुमान्। तथैव ब्रह्मविच्छ्रेष्ठः सदा ब्रह्मैव नापरः ॥ ५५६ ॥ नट जैसे विचित्र वेष-विन्यास धारण किये रहनेपर अथवा उसके अभावमें भी पुरुष ही है, वैसे ही ब्रह्मवेत्ता उपाधियुक्त हो अथवा उपाधिमुक्त, सदा ब्रह्म ही है और कुछ नहीं। यत्र क्वापि विशीर्णं सत्पर्णमिव तरोर्वपुःपतनात्। ब्रह्मीभूतस्य यतेः प्रागेव हि तच्चिदग्निना दग्धम् ॥ ५५७॥ जहाँ-तहाँ गिरे हुए वृक्षके सूखे पत्तोंके समान ब्रह्मीभूत यतिका शरीर कहीं भी गिरे वह तो पहले ही चैतन्याग्निसे दग्ध हुआ रहता है।

उपदेशका उपसंहार १४५ सदात्मनि ब्रह्मणि तिष्ठतो मुनेः पूर्णाद्वयानन्दमयात्मना सदा। न देशकालाद्युचितप्रतीक्षा त्वङ्मांसविट्पिण्डविसर्जनाय ॥ ५५८ ॥ सत्स्वरूप ब्रह्ममें सदैव परिपूर्ण अद्वितीय आनन्दस्वरूपसे स्थित रहनेवाले मुनिको इस त्वचा, मांस और मल-मूत्रके पिण्डको त्यागनेके लिये किसी योग्य देशकाल आदिकी अपेक्षा नहीं होती। देहस्य मोक्षो नो मोक्षो न दण्डस्य कमण्डलोः। अविद्याहृदयग्रन्थिमोक्षो मोक्षो यतस्ततः ॥ ५५९ ॥ क्योंकि मोक्ष हृदयकी अविद्यारूप ग्रन्थिके नाशको ही कहते हैं। इसलिये देह अथवा दण्ड-कमण्डलुके त्यागका नाम मोक्ष नहीं है। कुल्यायामथ नद्यां वा शिवक्षेत्रेऽपि चत्वरे। पर्णं पतति चेत्तेन तरोः किं नु शुभाशुभम् ॥ ५६० ॥ वृक्षका सूखकर झड़ा हुआ पत्ता नालीमें, नदीमें, शिवालयमें अथवा किसी चबूतरेपर कहीं भी गिरे, उससे वृक्षका क्या हानि-लाभ हो सकता है ? पत्रस्य पुष्पस्य फलस्य नाशवद् देहेन्द्रियप्राणधियां विनाशः। नैवात्मनः स्वस्य सदात्मकस्या- नन्दाकृतेर्वृक्षवदस्ति चैषः ॥ ५६१ ॥ वृक्षके पत्ते, फूल और फलोंके समान नाश तो जीवके देह, इन्द्रिय, प्राण और बुद्धि आदिका ही होता है, सदानन्दस्वरूप स्वयं आत्माका नाश कभी नहीं होता; वह तो वृक्षके समान नित्य निश्चल है। प्रज्ञानघन इत्यात्मलक्षणं सत्यसूचकम्। अनूद्यौपाधिकस्यैव कथयन्ति विनाशनम् ॥ ५६२ ॥ 'प्रज्ञानघन' यह आत्माका लक्षण उसकी सत्यताका सूचक है—विज्ञजन ऐसा अनुवाद (वर्णन) करके उपाधि-कल्पित वस्तुका ही विनाश बतलाते हैं।

१४६ विवेक-चूड़ामणि अविनाशी वा अरेऽयमात्मेति श्रुतिरात्मनः । प्रब्रवीत्यविनाशित्वं विनश्यत्सु विकारिषु ॥ ५६३ ॥ 'अरे यह आत्मा अविनाशी है' यह श्रुति* भी विकारी देह आदिका नाश होनेपर आत्माके अविनाशित्वका ही प्रतिपादन करती है। पाषाणवृक्षतृणधान्यकटाम्बराद्या दग्धा भवन्ति हि मृदेव यथा तथैव । देहेन्द्रियासुमनआदि समस्तदृश्यं ज्ञानाग्निदग्धमुपयाति परात्मभावम् ॥ ५६४ ॥ जिस प्रकार पत्थर, वृक्ष, तृण, अन्न, भूसा और वस्त्र आदि जलनेपर मिट्टी ही हो जाते हैं उसी प्रकार देह, इन्द्रिय, प्राण और मन आदि सम्पूर्ण दृश्य पदार्थ ज्ञानाग्निसे दग्ध हो जानेपर परमात्मस्वरूप ही हो जाते हैं। विलक्षणं यथा ध्वान्तं लीयते भानुतेजसि। तथैव सकलं दृश्यं ब्रह्मणि प्रविलीयते ॥ ५६५ ॥ जैसे सूर्यका प्रकाश होनेपर उससे विपरीत स्वभाववाला अन्धकार उसीमें लीन हो जाता है वैसे ही सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच ज्ञानोदय होनेपर ब्रह्ममें ही लीन हो जाता है। घटे नष्टे यथा व्योम व्योमैव भवति स्फुटम्। तथैवोपाधिविलये ब्रह्मैव ब्रह्मवित्स्वयम् ॥ ५६६ ॥ घड़ेके नष्ट होनेपर जैसे घटाकाश महाकाश ही हो जाता है वैसे ही उपाधिका लय होनेपर ब्रह्मवेत्ता स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है। क्षीरं क्षीरे यथा क्षिप्तं तैलं तैले जलं जले। संयुक्तमेकतां याति तथात्मन्यात्मविन्मुनिः ॥ ५६७ ॥ जैसे दूधमें मिलकर दूध, तैलमें मिलकर तैल और जलमें मिलकर जल एक ही हो जाते हैं वैसे ही आत्मज्ञानी मुनि आत्मामें लीन होनेपर आत्मस्वरूप ही हो जाता है।

  • 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा' (बृह० ४।५।१४)

उपदेशका उपसंहार १४७ एवं विदेहकैवल्यं सन्मात्रत्वमखण्डितम्। ब्रह्मभावं प्रपद्यैष यतिर्नावर्तते पुनः॥ ५६८॥ अखण्ड सत्तामात्रसे स्थित होना ही विदेह-कैवल्य है। इस प्रकार ब्रह्म-भावको प्राप्त होकर यह यति फिर संसार-चक्रमें नहीं पड़ता। सदात्मैकत्वविज्ञानदग्धाविद्यादिवर्ष्मणः । अमुष्य ब्रह्मभूतत्वाद्व्रह्मणः कुत उद्भवः॥ ५६९॥ ब्रह्म और आत्माके एकत्व-ज्ञानरूप अग्निसे अविद्याजन्य शरीरादि उपाधिके दग्ध हो जानेपर तो यह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मरूप ही हो जाता है और ब्रह्मका फिर जन्म कैसा? मायाक्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न स्तः स्वात्मनि वस्तुतः। यथा रज्जौ निष्क्रियायां सर्पाभासविनिर्गमौ ॥ ५७०॥ बन्धन और मोक्ष मायासे ही हुए हैं; वे वस्तुतः आत्मामें नहीं हैं; जैसे क्रियाहीन रज्जुमें सर्प-प्रतीतिका होना न होना भ्रममात्र है, वास्तवमें नहीं। आवृतेः सदसत्त्वाभ्यां वक्तव्ये बन्धमोक्षणे। नावृतिर्ब्रह्मणः काचिदन्याभावादनावृतम्। यद्यस्त्यद्वैतहानिः स्याद्द्वैतं नो सहते श्रुतिः॥ ५७१॥ अज्ञानकी आवरणशक्तिके रहने और न रहनेसे ही क्रमशः बन्ध और मोक्ष कहे जाते हैं और ब्रह्मका कोई आवरण हो नहीं सकता, क्योंकि उससे अतिरिक्त और कोई वस्तु है नहीं; अतः वह अनावृत है। यदि ब्रह्मका भी आवरण माना जाय तो अद्वैत सिद्ध नहीं हो सकता और द्वैत श्रुतिको मान्य नहीं है। बन्धं च मोक्षं च मृषैव मूढा बुद्धेर्गुणं वस्तुनि कल्पयन्ति। दृगावृतिं मेघकृतां यथा रवौ यतोऽद्वयासङ्गचिदेकमक्षरम् ॥ ५७२॥ बन्ध और मोक्ष दोनों बुद्धिके गुण हैं। जैसे मेघके द्वारा दृष्टिके ढँक जानेपर सूर्यको ढँका हुआ कहा जाता है, उसी प्रकार मूढ़ पुरुष उनकी

१४८ विवेक-चूड़ामणि कल्पना आत्मतत्त्वमें व्यर्थ ही करते हैं क्योंकि ब्रह्म तो सदैव अद्वितीय, असंग, चैतन्यस्वरूप, एक और अविनाशी है। अस्तीति प्रत्ययो यश्च यश्च नास्तीति वस्तुनि। बुद्धेरेव गुणावेतौ न तु नित्यस्य वस्तुनः ॥ ५७३॥ पदार्थका होना और न होना—ऐसा जो ज्ञान है वह बुद्धिका ही गुण है; नित्य वस्तु आत्माका नहीं। अतस्तौ मायया क्लृप्तौ बन्धमोक्षौ न चात्मनि। निष्कले निष्क्रिये शान्ते निरवद्ये निरंजने। अद्वितीये परे तत्त्वे व्योमवत्कल्पना कुतः ॥ ५७४॥ इसलिये आत्मामें ये बन्ध और मोक्ष दोनों मायासे कल्पित हैं, वस्तुतः नहीं हैं; क्योंकि आकाशके समान निरवयव, निष्क्रिय, शान्त, निर्मल, निरंजन और अद्वितीय परमतत्त्वमें कल्पना कैसे हो सकती है? न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥ ५७५ ॥ अतः परमार्थ (वास्तविक बात) तो यही है कि न किसीका नाश है, न उत्पत्ति है, न बन्धन है और न कोई साधक है तथा न मुमुक्षु (मुक्त होनेकी इच्छावाला) है, न मुक्त है। सकलनिगमचूडास्वान्तसिद्धान्तरूपं परमिदमतिगुह्यं दर्शितं ते मयाद्य। अपगतकलिदोषं कामनिर्मुक्तबुद्धिं स्वसुतवदसकृत्त्वां भावयित्वा मुमुक्षुम् ॥ ५७६ ॥ हे वत्स! कलिके दोषोंसे रहित, कामनाशून्य तुझ मुमुक्षुको अपने पुत्रके समान समझकर मैंने बारम्बार सकल शास्त्रोंका सार-शिरोमणि यह अति गुह्य परम सिद्धान्त तेरे सामने प्रकट किया है।

अनुबन्ध-चतुष्टय १४९ शिष्यकी विदाई इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं प्रश्रयेण कृतानतिः। स तेन समनुज्ञातो ययौ निर्मुक्तबन्धनः ॥ ५७७॥ गुरुदेवके ऐसे वचन सुन शिष्यने अति नम्रतासे उन्हें प्रणाम किया और संसार-बन्धनसे मुक्त हो उनकी आज्ञा पाकर चला गया। गुरुरेवं सदानन्दसिन्धौ निर्मग्नमानसः । पावयन्वसुधां सर्वां विचचार निरन्तरम् ॥ ५७८ ॥ और गुरुजी भी सच्चिदानन्द-समुद्रमें मग्नमन हुए सम्पूर्ण पृथिवीको पवित्र करते निरन्तर विचरने लगे। अनुबन्ध-चतुष्टय इत्याचार्यस्य शिष्यस्य संवादेनात्मलक्षणम्। निरूपितं मुमुक्षूणां सुखबोधोपपत्तये ॥ ५७९ ॥ इस प्रकार गुरु और शिष्यके संवाद-रूपसे मुमुक्षुओंको सुगमतासे बोध होनेके लिये यह आत्मज्ञानका निरूपण किया गया है।* हितमिममुपदेशमाद्रियन्तां विहितनिरस्तसमस्तचित्तदोषाः । भवसुखविरताः प्रशान्तचित्ताः श्रुतिरसिका यतयो मुमुक्षवो ये ॥ ५८० ॥ वेदान्तविहित श्रवणादिके द्वारा जिनके चित्तके समस्त दोष निकल गये हैं और जो संसारसुखसे विरक्त, शान्तचित्त, श्रुतिरहस्यके रसिक और मोक्ष-कामी हैं। वे यतिजन इस हितकारी उपदेशका आदर करें।

  • इस श्लोकमें श्रीशंकराचार्यजीने ग्रन्थके अनुबन्ध-चतुष्टयका वर्णन किया है। इस ग्रन्थका अधिकारी मुमुक्षु पुरुष है, विषय आत्मज्ञान है, सम्बन्ध निरूप्य-निरूपक है और प्रयोजन 'मुमुक्षुओंको सुगमतासे आत्मज्ञानकी सिद्धि' है।

१५० विवेक-चूडामणि ग्रन्थ-प्रशंसा संसाराध्वनि तापभानुकिरणप्रोद्भूतदाहव्यथा- खिन्नानां जलकाङ्क्षया मरुभुवि श्रान्त्या परिभ्राम्यताम्। अत्यासन्नसुधाम्बुधिं सुखकरं ब्रह्माद्वयं दर्शय- न्त्येषा शंकरभारती विजयते निर्वाणसन्धायिनी ॥ ५८१ ॥ संसार-मार्गमें नाना प्रकारके क्लेशरूपी सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न हुए दाहकी व्यथासे पीड़ित होकर मरुस्थलमें जलकी इच्छासे भटकते हुए थके-माँदे पुरुषोंको अति निकटमें ही अद्वितीय ब्रह्मरूप अत्यन्त आनन्ददायक अमृतका समुद्र दिखानेवाली यह श्रीशंकराचार्यजीकी निर्वाणदायिनी वाणी निरन्तर जयको प्राप्त हो रही है। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकर- भगवत्कृतो विवेकचूडामणिः समाप्तः

भगवान् शंकराचार्य और विवेक-चूडामणि

संसारके दार्शनिकोंमें भगवान् शंकराचार्यका नाम सर्वाग्रणी है। अबतक उनके जीवनचरित-सम्बन्धी छोटी-बड़ी हजारों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कई तो दिग्विजय-सम्बन्धी हैं। उदयवीर शास्त्रीके वेदान्तदर्शनका इतिहासका प्रथम भाग जो बृहत् कलेवरका है, केवल आचार्यके काल- निर्णयमें ही पर्यवसित हो गया है। दूसरा आधुनिक ग्रन्थ कामकोटिमठद्वारा प्रकाशित अंग्रेजीमें Shankracharya an Appriser (शंकराचार्यकी जीवनियोंका पुनर्मूल्यांकन) बंबईसे छपा है, जिसमें अनेक रंगीन चित्र हैं और मूल्य एक हजार रुपया है। आचार्यका संक्षिप्त जीवन-वृत्त इस प्रकार है— भगवान् शंकरके दिग्विजय तथा गुरवंशकाव्यम् एवं गुरुपरम्परा चरित्रम् आदि जो ग्रन्थ मिलते हैं तथा अन्यत्र उनकी जीवनचरित-सम्बन्धी जो सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं, उनसे ज्ञात होता है कि वे सर्वथा अलौकिक दिव्य-प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे। उनके अंदर प्रकाण्ड पाण्डित्य, गम्भीर विचारशैली, प्रचण्ड कर्मशीलता, अगाध भगवद्भक्ति, उत्कृष्ट वैराग्य, अद्भुत योगैश्वर्य आदि अनेक गुणोंका दुर्लभ सामंजस्य उपलब्ध होता है। उनकी वाणीपर तो मानो साक्षात् सरस्वती ही विराजती थीं। यही कारण है कि अपने ३२ वर्षकी अल्प आयुमें ही उन्होंने अनेक बड़े-बड़े ग्रन्थ रच डाले। सारे भारतमें भ्रमण करके विरोधियोंको शास्त्रार्थमें परास्त किया, भारतके चारों कोनोंमें चार प्रधान मठ स्थापित किये और समग्र देशमें सनातन वैदिकधर्मकी ध्वजा फहरा दी। थोड़ेमें यह कहा जा सकता है कि शंकराचार्यने अवतरित होकर डूबते हुए सनातनधर्मकी रक्षा की और उसीके फलस्वरूप आज हम सनातनधर्मको जीता-जागता देखते हैं। उनके इस धर्मसंस्थापनके कार्यको देखकर यह विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है कि वे साक्षात् कैलासपति भगवान् शंकरके ही अवतार थे—'शङ्करः शङ्करः साक्षात्'— और इसीसे सब लोग 'भगवान्' शब्दके साथ उनका स्मरण करते हैं। आचार्य शंकरका प्राकट्य केरल-प्रदेशके पूर्णानदीके तटवर्ती कलादी नामक गाँवमें वैशाख शुक्ल ५ को हुआ था। उनके पिताका नाम शिवगुरु तथा माताका सुभद्रा था। शिवगुरु बड़े विद्वान् और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे।

१५२ विवेक-चूडामणि सुभद्रा भी पतिके अनुरूप ही विदुषी और धर्मपरायणा पत्नी थीं। परंतु प्रायः प्रौढावस्था समाप्त होनेपर भी जब उन्हें कोई संतान न हुई तब पति-पत्नीने बड़ी श्रद्धा-भक्तिके साथ भगवान् शंकरकी पुत्र-प्राप्तिके लिये कठिन तपःपूर्ण उपासना की। भगवान् आशुतोष ब्राह्मणदम्पतिकी उपासनासे प्रसन्न हुए और प्रकट होकर उन्होंने उन्हें मनोवांछित वरदान दिया। भगवान् शंकरके आशीर्वादसे शुभ मुहूर्तमें माँ सुभद्राके गर्भसे एक दिव्य कान्तिमान् पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ और उसका नाम आशुतोष शंकरके नामपर ही शंकर रख दिया गया। बालक शंकरके रूपमें कोई महान् विभूति अवतरित हुई है, इसका प्रमाण शंकरके बचपनसे ही मिलने लगा। एक वर्षकी अवस्था होते-होते बालक शंकर अपनी मातृभाषामें अपने भाव प्रकट करने लगे और दो वर्षकी अवस्थामें मातासे पुराणादिकी कथाएँ सुनकर कण्ठस्थ करने लगे। उनके पिता तीन वर्षकी अवस्थामें उनका चूडाकर्म करके दिवंगत हो गये। पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत कर उन्हें गुरुके घर पढ़नेके लिये भेजा गया और केवल ८ वर्षकी अवस्थामें ही वे वेद-वेदान्त और वेदांगोंका पूर्ण अध्ययन करके घर वापस आ गये। उनकी असाधारण प्रतिभा देखकर उनके गुरुजन दंग रह गये। विद्याध्ययन समाप्तकर शंकरने संन्यास लेना चाहा, परंतु जब उन्होंने मातासे आज्ञा माँगी तो उन्होंने नाहीं कर दी। शंकर माताके बड़े भक्त थे, माताको कष्ट देकर संन्यास लेना नहीं चाहते थे। एक दिन माताके साथ वे नदीमें स्नान करने गये। वहाँ शंकरको मगरने पकड़ लिया। इस प्रकार पुत्रको संकटमें देख माताके होश उड़ गये। वह बेचैन होकर हाहाकार मचाने लगी। शंकरने मातासे कहा—'मुझे संन्यास लेनेकी आज्ञा दे दो तो मगर मुझे छोड़ देगा। माताने तुरन्त आज्ञा दे दी और मगरने शंकरको छोड़ दिया। इस तरह माताकी आज्ञा प्राप्तकर वे घरसे निकल पड़े। जाते समय माताके इच्छानुसार यह वचन देते गये कि तुम्हारी मृत्युके समय मैं घरपर उपस्थित रहूँगा। घरसे चलकर शंकर नर्मदातटपर आये और वहाँ स्वामी गोविन्द भगवत्पादसे दीक्षा ली। गुरुने उनका नाम 'भगवत्पूज्यपादाचार्य' रखा। उन्होंने गुरूपदिष्ट मार्गसे साधना प्रारम्भ कर दी और अल्पकालमें ही बहुत बड़े योगसिद्ध महात्मा हो गये। उनकी सिद्धिसे प्रसन्न होकर गुरुने काशी जाकर वेदान्त-