भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 153 में से

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पृष्ठ 146

अनुबन्ध-चतुष्टय १४९ शिष्यकी विदाई इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं प्रश्रयेण कृतानतिः। स तेन समनुज्ञातो ययौ निर्मुक्तबन्धनः ॥ ५७७॥ गुरुदेवके ऐसे वचन सुन शिष्यने अति नम्रतासे उन्हें प्रणाम किया और संसार-बन्धनसे मुक्त हो उनकी आज्ञा पाकर चला गया। गुरुरेवं सदानन्दसिन्धौ निर्मग्नमानसः । पावयन्वसुधां सर्वां विचचार निरन्तरम् ॥ ५७८ ॥ और गुरुजी भी सच्चिदानन्द-समुद्रमें मग्नमन हुए सम्पूर्ण पृथिवीको पवित्र करते निरन्तर विचरने लगे। अनुबन्ध-चतुष्टय इत्याचार्यस्य शिष्यस्य संवादेनात्मलक्षणम्। निरूपितं मुमुक्षूणां सुखबोधोपपत्तये ॥ ५७९ ॥ इस प्रकार गुरु और शिष्यके संवाद-रूपसे मुमुक्षुओंको सुगमतासे बोध होनेके लिये यह आत्मज्ञानका निरूपण किया गया है।* हितमिममुपदेशमाद्रियन्तां विहितनिरस्तसमस्तचित्तदोषाः । भवसुखविरताः प्रशान्तचित्ताः श्रुतिरसिका यतयो मुमुक्षवो ये ॥ ५८० ॥ वेदान्तविहित श्रवणादिके द्वारा जिनके चित्तके समस्त दोष निकल गये हैं और जो संसारसुखसे विरक्त, शान्तचित्त, श्रुतिरहस्यके रसिक और मोक्ष-कामी हैं। वे यतिजन इस हितकारी उपदेशका आदर करें।

  • इस श्लोकमें श्रीशंकराचार्यजीने ग्रन्थके अनुबन्ध-चतुष्टयका वर्णन किया है। इस ग्रन्थका अधिकारी मुमुक्षु पुरुष है, विषय आत्मज्ञान है, सम्बन्ध निरूप्य-निरूपक है और प्रयोजन 'मुमुक्षुओंको सुगमतासे आत्मज्ञानकी सिद्धि' है।