विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ विवेक-चूडामणि देहोऽहमित्येव जडस्य बुद्धि- र्देहे च जीवे विदुषस्त्वहंधीः। विवेकविज्ञानवतो महात्मनो ब्रह्माहमित्येव मतिः सदात्मनि॥ १६२ ॥ जड पुरुषोंकी 'मैं देह हूँ'-ऐसी देहमें अहंबुद्धि होती है, विद्वान् (शास्त्रज्ञ)-की जीवमें और विवेक-विज्ञानयुक्त महात्माकी 'मैं ब्रह्म हूँ'- ऐसी सत्य आत्मामें ही अहंबुद्धि होती है। अत्रात्मबुद्धिं त्यज मूढबुद्धे त्वङ्मांसमेदोऽस्थिपुरीषराशौ । सर्वात्मनि ब्रह्मणि निर्विकल्पे कुरुष्व शान्तिं परमां भजस्व॥ १६३॥ अरे मूर्ख! इस त्वचा, मांस, मेद, अस्थि और मलादिके समूहमें आत्मबुद्धि छोड़ और सर्वात्मा निर्विकल्प ब्रह्ममें ही आत्मभाव करके परम शान्तिका भोग कर। देहेन्द्रियादावसति भ्रमोदितां विद्वानहन्तां न जहाति यावत्। तावन्न तस्यास्ति विमुक्तिवार्ता- प्यस्त्वेष वेदान्तनयान्तदर्शी ॥ १६४ ॥ जबतक विद्वान् असत् देह और इन्द्रिय आदिमें भ्रमसे उत्पन्न हुई अहंताको नहीं त्यागता, तबतक वह वेदान्त-सिद्धान्तोंका पारदर्शी क्यों न हो, उसके मोक्षकी कोई बात ही नहीं है। छायाशरीरे प्रतिबिम्बगात्रे यत्स्वप्नदेहे हृदि कल्पितांगे। यथात्मबुद्धिस्तव नास्ति काचि- ज्जीवच्छरीरे च तथैव मास्तु ॥ १६५ ॥ छाया, प्रतिबिम्ब, स्वप्न और मनमें कल्पित किये हुए शरीरोंमें जिस