विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 153 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ विवेक-चूडामणि असन्निवृत्तौ तु सदात्मना स्फुटं प्रतीतिरेतस्य भवेत्प्रतीचः । ततो निरासः करणीय एवा- सदात्मनः साध्वहमादिवस्तुनः ॥ २०७ ॥ सत्य आत्माके विचारसे असत्की निवृत्ति होनेपर इस प्रत्यक् (आन्तरिक) आत्माकी स्पष्ट प्रतीति होने लगती है। अतः अहंकार आदि असदात्माओंका भली प्रकार बाध करना ही चाहिये। अतो नायं परात्मा स्याद्विज्ञानमयशब्दभाक् । विकारित्वाज्जडत्वाच्च परिच्छिन्नत्वहेतुतः । दृश्यत्वाद्व्यभिचारित्वान्नानित्यो नित्य इष्यते ॥ २०८ ॥ अतएव विज्ञानमय शब्दसे कहा जानेवाला यह विज्ञानमय कोश भी विकारी, जड, परिच्छिन्न तथा दृश्य और व्यभिचारी होनेके कारण परात्मा नहीं हो सकता; [ क्योंकि यह अनित्य है ] और अनित्य वस्तु कभी नित्य नहीं हो सकती। आनन्दमय कोश आनन्दप्रतिविम्बचुम्बिततनुर्वृत्तिस्तमोजृम्भिता स्यादानन्दमयः प्रियादिगुणकः स्वेष्टार्थलाभोदयः । पुण्यस्यानुभवे विभाति कृतिनामानन्दरूपः स्वयं भूत्वा नन्दति यत्र साधु तनुभृन्मात्रः प्रयत्नं विना ॥ २०९ ॥ आनन्दस्वरूप आत्माके प्रतिबिम्बसे चुम्बित तथा तमोगुणसे प्रकट हुई वृत्ति आनन्दमय कोश है। वह प्रिय आदि (प्रिय, मोद और प्रमोद—इन तीन) गुणोंसे युक्त है और अपने अभीष्ट पदार्थके प्राप्त होनेपर प्रकट होती है। पुण्य-कर्मके परिपाक होनेपर उसके फलरूप सुखका अनुभव करते समय भाग्यवान् पुरुषोंको उस आनन्दमय कोशका स्वयं ही भान होता है, जिससे सम्पूर्ण देहधारी जीव बिना प्रयत्नके ही अति आनन्दित होते हैं।