भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 153 में से

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आनन्दमय कोश ५९ आनन्दमयकोशस्य सुषुप्तौ स्फूर्तिरुत्कटा। स्वप्नजागरयोरीषदिष्टसंदर्शनादिना ॥ २१० ॥ आनन्दमय कोशकी उत्कट (तीव्र) प्रतीति तो सुषुप्तिमें ही होती है, तथापि जागर्त्ति और स्वप्नमें भी इष्टवस्तुके दर्शन आदिसे उसका यत्किंचित् भान होता है। नैवायमानन्दमयः परात्मा सोपाधिकत्वात्प्रकृतेर्विकारात् । कार्यत्वहेतोः सुकृतक्रियाया विकारसङ्घातसमाहितत्वात् ॥ २११॥ यह परात्मा आनन्दमय नहीं है, क्योंकि आनन्द उपाधियुक्त एवं प्रकृतिका विकार है, शुभ कर्मोंका कार्य है और प्रकृतिके विकारोंके समूह (स्थूल-शरीर)-के आश्रित है। पंचानामपि कोशानां निषेधे युक्तितः श्रुतेः। तन्निषेधावधिः साक्षी बोधरूपोऽवशिष्यते ॥ २१२॥ श्रुतिके अनुकूल युक्तियोंसे पाँचों कोशोंका निषेध कर देनेपर उनके निषेधकी अवधिरूप (शुद्ध) बोधस्वरूप साक्षी आत्मा बच रहता है। योऽयमात्मा स्वयंज्योतिः पञ्चकोशविलक्षणः । अवस्थात्रयसाक्षी सन्निविकारो निरंजनः । सत्स्वरूपः स विज्ञेयः स्वात्मत्वेन विपश्चिता ॥ २१३ ॥ इस प्रकार जो आत्मा स्वयंप्रकाश, अन्नमयादि पाँचों कोशोंसे पृथक् तथा जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंका साक्षी होकर सत्- रूप निर्विकार, निर्मल और शुद्धसत्स्वरूप है, उसे ही विद्वान् पुरुषको अपना वास्तविक आत्मा समझना चाहिये।