भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 153 में से

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६२ विवेक-चूडामणि देहं धियं चित्प्रतिबिम्बमेतं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम्। द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम्॥ २२२॥ नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्म- मन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः । विज्ञाय सम्यङ्निजरूपमेतत् पुमान्विपाप्मा विरजो विमृत्युः॥ २२३॥ विद्वान् पुरुष घड़ा, जल और उसमें स्थित सूर्यका प्रतिबिम्ब—इन सबको छोड़कर जैसे इन तीनोंके प्रकाशक इनसे पृथक् और स्वयंप्रकाशरूप सूर्यको देखता है, उसी प्रकार देह, बुद्धि और चिदाभास—इन तीनोंको छोड़कर बुद्धिगुहामें स्थित साक्षीरूप इस आत्माको अखण्डबोधस्वरूप, सबके प्रकाशक और सत्-असत् दोनोंसे भिन्न, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्म, भीतर-बाहरके भेदसे रहित और अपने-आपसे सर्वथा अभिन्न इस-(आत्मा) को भलीभाँति अपना निजरूप जानकर पुरुष पापरहित, निर्मल और अमर हो जाता है। विशोक आनन्दघनो विपश्चित् स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित्। नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्ते- र्विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः॥ २२४॥ वह अति बुद्धिमान् पुरुष शोकरहित और आनन्दघनरूप हो जानेसे कभी किसीसे भयभीत नहीं होता। मुमुक्षु पुरुषके लिये आत्मतत्त्वके ज्ञानको छोड़कर संसारबन्धनसे छूटनेका और कोई मार्ग नहीं है। ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम्। येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः॥ २२५॥ ब्रह्म और आत्माके अभेदका ज्ञान ही भवबन्धनसे मुक्त होनेका कारण