विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
६२ विवेक-चूडामणि देहं धियं चित्प्रतिबिम्बमेतं विसृज्य बुद्धौ निहितं गुहायाम्। द्रष्टारमात्मानमखण्डबोधं सर्वप्रकाशं सदसद्विलक्षणम्॥ २२२॥ नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्म- मन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः । विज्ञाय सम्यङ्निजरूपमेतत् पुमान्विपाप्मा विरजो विमृत्युः॥ २२३॥ विद्वान् पुरुष घड़ा, जल और उसमें स्थित सूर्यका प्रतिबिम्ब—इन सबको छोड़कर जैसे इन तीनोंके प्रकाशक इनसे पृथक् और स्वयंप्रकाशरूप सूर्यको देखता है, उसी प्रकार देह, बुद्धि और चिदाभास—इन तीनोंको छोड़कर बुद्धिगुहामें स्थित साक्षीरूप इस आत्माको अखण्डबोधस्वरूप, सबके प्रकाशक और सत्-असत् दोनोंसे भिन्न, नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्म, भीतर-बाहरके भेदसे रहित और अपने-आपसे सर्वथा अभिन्न इस-(आत्मा) को भलीभाँति अपना निजरूप जानकर पुरुष पापरहित, निर्मल और अमर हो जाता है। विशोक आनन्दघनो विपश्चित् स्वयं कुतश्चिन्न बिभेति कश्चित्। नान्योऽस्ति पन्था भवबन्धमुक्ते- र्विना स्वतत्त्वावगमं मुमुक्षोः॥ २२४॥ वह अति बुद्धिमान् पुरुष शोकरहित और आनन्दघनरूप हो जानेसे कभी किसीसे भयभीत नहीं होता। मुमुक्षु पुरुषके लिये आत्मतत्त्वके ज्ञानको छोड़कर संसारबन्धनसे छूटनेका और कोई मार्ग नहीं है। ब्रह्माभिन्नत्वविज्ञानं भवमोक्षस्य कारणम्। येनाद्वितीयमानन्दं ब्रह्म सम्पद्यते बुधैः॥ २२५॥ ब्रह्म और आत्माके अभेदका ज्ञान ही भवबन्धनसे मुक्त होनेका कारण
ब्रह्म और जगत्की एकता ६३ है, जिसके द्वारा बुद्धिमान् पुरुष अद्वितीय आनन्दस्वरूप ब्रह्मपदको प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मभूतस्तु संसृत्यै विद्वानावर्तते पुनः। विज्ञातव्यमतः सम्यग्ब्रह्माभिन्नत्वमात्मनः ॥ २२६ ॥ ब्रह्मभूत हो जानेपर विद्वान् फिर जन्म-मरणरूप संसारचक्रमें नहीं पड़ता; इसलिये आत्माका ब्रह्मसे अभिन्नत्व भली प्रकार जान लेना चाहिये। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म विशुद्धं परं स्वतःसिद्धम्। नित्यानन्दैकरसं प्रत्यगभिन्नं निरन्तरं जयति ॥ २२७ ॥ ब्रह्म सत्य ज्ञानस्वरूप और अनन्त है; वह शुद्ध, पर, स्वतःसिद्ध, नित्य, एकमात्र आनन्दरसस्वरूप, प्रत्यक् (अन्तरतम) और अभिन्न है, तथा निरन्तर उन्नतिशाली है। ब्रह्म और जगत्की एकता सदिदं परमाद्वैतं स्वस्मादन्यस्य वस्तुनोऽभावात्। न ह्यन्यदस्ति किञ्चित्सम्यक्परमार्थतत्त्वबोधे हि ॥ २२८ ॥ यह परमाद्वैत ही एक सत्य पदार्थ है, क्योंकि इस स्वात्मासे अतिरिक्त और कोई वस्तु है ही नहीं। इस परमार्थ-तत्त्वका पूर्ण बोध हो जानेपर और कुछ भी नहीं रहता। यदिदं सकलं विश्वं नानारूपं प्रतीतमज्ञानात्। तत्सर्वं ब्रह्मैव प्रत्यस्ताशेषभावनादोषम् ॥ २२९ ॥ यह सम्पूर्ण विश्व, जो अज्ञानसे नाना प्रकारका प्रतीत हो रहा है, समस्त भावनाओंके दोषसे रहित [ अर्थात् निर्विकल्प ] ब्रह्म ही है। मृत्कार्यभूतोऽपि मृदो न भिन्नः कुम्भोऽस्ति सर्वत्र तु मृत्स्वरूपात्। न कुम्भरूपं पृथगस्ति कुम्भः कुतो मृषा कल्पितनाममात्रः ॥ २३० ॥
६४ विवेक-चूडामणि मिट्टीका कार्य होनेपर भी घड़ा उससे पृथक् नहीं होता, क्योंकि सब ओरसे मृत्तिकारूप होनेके कारण घड़ेका रूप मृत्तिकासे पृथक् नहीं है, अतः मिट्टीमें मिथ्या ही कल्पित नाममात्र घड़ेकी सत्ता ही कहाँ है? केनापि मृद्भिन्नतया स्वरूपं घटस्य संदर्शयितुं न शक्यते। अतो घटः कल्पित एव मोहान् मृदेव सत्यं परमार्थभूतम् ॥ २३१ ॥ मिट्टीसे अलग घड़ेका रूप कोई भी नहीं दिखा सकता। इसलिये घड़ा तो मोहसे ही कल्पित है; वास्तवमें सत्य तो तत्त्वस्वरूपा मृत्तिका ही है। सद्ब्रह्मकार्यं सकलं सदैव तन्मात्रमेतन्न ततोऽन्यदस्ति। अस्तीति यो वक्ति न तस्य मोहो विनिर्गतो निद्रितवत्प्रजल्पः ॥ २३२ ॥ सत् ब्रह्मका कार्य यह सकल प्रपंच सत्स्वरूप ही है, क्योंकि यह सम्पूर्ण वही तो है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। जो कहता है कि [ उससे पृथक् भी कुछ ] है, उसका मोह दूर नहीं हुआ; उसका यह कथन सोये हुए पुरुषके प्रलापके समान है। ब्रह्मैवेदं विश्वमित्येव वाणी श्रौती ब्रूतेऽथर्वनिष्ठा वरिष्ठा। तस्मादेतद् ब्रह्ममात्रं हि विश्वं नाधिष्ठानाद्भिन्नतारोपितस्य ॥ २३३ ॥ 'यह सम्पूर्ण विश्व ब्रह्म ही है'—ऐसा अति श्रेष्ठ अथर्व-श्रुति कहती है। इसलिये यह विश्व ब्रह्ममात्र ही है, क्योंकि अधिष्ठानसे आरोपित वस्तुकी पृथक् सत्ता हुआ ही नहीं करती।
ब्रह्म और जगत्की एकता ६५ सत्यं यदि स्याज्जगदेतदात्मनो- ऽनन्तत्वहानिर्निगमाप्रमाणता । असत्यवादित्वमपीशितुः स्या- न्नैतत्त्रयं साधु हितं महात्मनाम् ॥ २३४॥ यदि यह जगत् सत्य हो तो आत्माकी अनन्ततामें दोष आता है और श्रुति अप्रामाणिक हो जाती है तथा ईश्वर (भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र) भी मिथ्यावादी ठहरते हैं। ये तीनों ही बातें सत्पुरुषोंके लिये शुभ और हितकर नहीं हैं। ईश्वरो वस्तुतत्त्वज्ञो न चाहं तेष्ववस्थितः। न च मत्स्थानि भूतानीत्येवमेव व्यचीक्लृपत् ॥ २३५॥ परमार्थ-तत्त्वके जाननेवाले भगवान् कृष्णचन्द्रने यह निश्चित किया है कि 'न तो मैं ही भूतोंमें स्थित हूँ और न वे ही मुझमें स्थित हैं।' यदि सत्यं भवेद्विश्वं सुषुप्तावुपलभ्यताम्। यन्नोपलभ्यते किञ्चिदतोऽसत्स्वप्नवन्मृषा ॥ २३६॥ यदि विश्व सत्य होता तो सुषुप्तिमें भी उसकी प्रतीति होनी चाहिये थी; किन्तु उस समय इसकी कुछ भी प्रतीति नहीं होती; इसलिये यह स्वप्नके समान असत् और मिथ्या है। अतः पृथङ्नास्ति जगत्परात्मनः पृथक्प्रतीतिस्तु मृषा गुणादिवत्। आरोपितस्यास्ति किमर्थवत्ता- धिष्ठानमाभाति तथा भ्रमेण ॥ २३७॥ इसलिये परमात्मासे पृथक् जगत् है ही नहीं, उसकी पृथक् प्रतीति तो गुणीसे गुण आदिकी पृथक् प्रतीतिके समान मिथ्या ही है; आरोपित वस्तुकी वास्तविकता ही क्या ? वह तो अधिष्ठान ही भ्रमसे उस प्रकार भास रहा है। 133 विवेक-चूड़ामणि—3 A
६६ विवेक-चूडामणि भ्रान्तस्य यद्यद्भ्रमतः प्रतीतं ब्रह्मैव तत्तद्रजतं हि शुक्तिः। इदंतया ब्रह्म सदैव रूप्यते त्वारोपितं ब्रह्मणि नाममात्रम् ॥ २३८ ॥ अज्ञानीको अज्ञानवश जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह सब ब्रह्म ही है; जिस प्रकार भ्रमसे प्रतीत हुई चाँदी वस्तुतः सीपी ही है। [ इदं जगत् (यह जगत् है)—इसमें ] इदम् (यह) रूपसे सदा ब्रह्म ही कहा जाता है, ब्रह्ममें आरोपित [ जगत् ] तो नाममात्र ही है। ब्रह्म-निरूपण अतः परं ब्रह्म सद्वितीयं विशुद्धविज्ञानघनं निरञ्जनम्। प्रशान्तमाद्यन्तविहीनमक्रियं निरन्तरानन्दरसस्वरूपम् ॥ २३९ ॥ इसलिये परब्रह्म सत्, अद्वितीय, शुद्ध विज्ञानघन, निर्मल, शान्त, आदि-अन्तरहित, अक्रिय और सदैव आनन्दरसस्वरूप है। निरस्तमायाकृतसर्वभेदं नित्यं सुखं निष्कलमप्रमेयम्। अरूपमव्यक्तमनाख्यमव्ययं ज्योतिःस्वयं किञ्चिदिदं चकास्ति ॥ २४० ॥ वह समस्त मायिक भेदोंसे रहित है; नित्य, सुख-स्वरूप, कलारहित और प्रमाणादिका अविषय है तथा वह कोई अरूप, अव्यक्त, अनाम और अक्षय तेज है जो स्वयं ही प्रकाशित हो रहा है। ज्ञातृज्ञेयज्ञानशून्यमनन्तं निर्विकल्पकम्। केवलाखण्डचिन्मात्रं परं तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ २४१ ॥ बुधजन उस परम तत्त्वको ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय इस त्रिपुटीसे रहित, अनन्त, निर्विकल्प, केवल और अखण्ड-चैतन्यमात्र जानते हैं। 133 विवेक-चूडामणि—3 B
महावाक्य-विचार ६७ अहेयमनुपादेयं मनोवाचामगोचरम्। अप्रमेयमनाद्यन्तं ब्रह्म पूर्णं महन्महः॥ २४२॥ वह ब्रह्म त्याग अथवा ग्रहणके अयोग्य, मन-वाणीका अविषय, अप्रमेय, आदि-अन्तरहित, परिपूर्ण तथा महान् तेजोमय है। महावाक्य-विचार तत्त्वं पदाभ्यामभिधीयमानयो- र्ब्रह्मात्मनोः शोधितयोर्यदीत्थम्। श्रुत्या तयोस्तत्त्वमसीति सम्य- गकत्वमेव प्रतिपाद्यते मुहुः॥ २४३॥ 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८) आदि वाक्योंके तत् और त्वम् पदोंसे शोधन करके कहे हुए ब्रह्म और आत्माका श्रुतिके द्वारा बारम्बार पूर्ण एकत्व प्रतिपादन किया गया है। ऐक्यं तयोर्लक्षितयोर्न वाच्ययो- र्निगद्यतेऽन्योन्यविरुद्धधर्मिणोः । खद्योतभान्वोरिव राजभृत्ययोः कूपाम्बुराश्योः परमाणुमेर्वोः॥ २४४॥ उन सूर्य और खद्योत (जुगनू), राजा और सेवक, समुद्र और कूप तथा सुमेरु और परमाणुके समान परस्पर विरुद्ध धर्मवालोंका एकत्व लक्ष्यार्थमें ही कहा गया है, वाच्यार्थमें नहीं। तयोर्विरोधोऽयमुपाधिकल्पितो न वास्तवः कश्चिदुपाधिरेषः। ईशस्य माया महदादिकारणं जीवस्य कार्यं शृणु पंचकोशम्॥ २४५॥ उन दोनोंका यह विरोध उपाधिके कारण है और यह उपाधि कुछ वास्तविक नहीं है। ईश्वरकी उपाधि महत्तत्वादिकी कारणरूपा माया है तथा जीवकी उपाधि कार्यरूप पंचकोश हैं। 133 विवेक-चूडामणि-3 C
६८ विवेक-चूड़ामणि एतावुपाधी परजीवयोस्तयोः सम्यङ्निरासे न परो न जीवः। राज्यं नरेन्द्रस्य भटस्य खेटक- स्तयोरपोहे न भटो न राजा॥ २४६॥ ये परमात्मा और जीवकी उपाधियाँ हैं; इनका भली प्रकार बाध हो जानेपर न परमात्मा ही रहता है और न जीवात्मा ही। जिस प्रकार राज्य राजाकी उपाधि है तथा ढाल सैनिककी; इन दोनों उपाधियोंके न रहनेपर न कोई राजा है और न योद्धा। अथात आदेश इति श्रुतिः स्वयं निषेधति ब्रह्मणि कल्पितं द्वयम्। श्रुतिप्रमाणानुगृहीतयुक्त्या तयोर्निरासःकरणीय एव॥ २४७॥ ब्रह्ममें कल्पित द्वैतको 'अथात आदेशो नेति नेति' (बृह० २।३।६) इत्यादि श्रुति स्वयं निषेध करती है; इसलिये श्रुति-प्रमाणानुकूल युक्तिसे उपर्युक्त उपाधियोंका बाध करना ही चाहिये। नेदं नेदं कल्पितत्वान्न सत्यं रज्जौ दृष्टव्यालवत्स्वप्नवच्च। इत्थं दृश्यं साधुयुक्त्या व्यपोह्य ज्ञेयः पश्चादेकभावस्तयोर्यः ॥ २४८ ॥ यह दृश्य कल्पित होनेके कारण रज्जुमें प्रतीत होनेवाले सर्प और स्वप्नमें भासनेवाले विविध पदार्थोंकी भाँति सत्य नहीं है; ऐसी ही प्रबल युक्तियोंसे दृश्यका निषेध करनेपर पीछे उन (जीव और ईश्वर)-का जो एक-भाव बच रहता है वही जाननेयोग्य है। ततस्तु तौ लक्षणया सुलक्ष्यौ तयोरखण्डैकरसत्वसिद्धये । नालं जहत्या न तथाजहत्या किन्तूभयार्थात्मिकयैव भाव्यम्॥ २४९॥ 133 विवेक-चूड़ामणि—3 D
महावाक्य-विचार ६९ जीवात्मा और परमात्माकी अखण्डैकरसताकी सिद्धिके लिये महावाक्यमें लक्षणा करनेसे ही उनका ज्ञान होता है। उनका ठीक-ठीक ज्ञान न तो जहती-लक्षणासे होता है और न अजहतीसे ही; इसलिये इस जगह जहत्यजहती लक्षणाका प्रयोग करना चाहिये। स देवदत्तोऽयमितीह चैकता विरुद्धधर्मांशमपास्य कथ्यते। यथा तथा तत्त्वमसीति वाक्ये विरुद्धधर्मानुभयत्र हित्वा ॥ २५०॥ 'वह देवदत्त यह है' इस वाक्यमें [ 'वह' शब्दका परोक्षत्व और 'यह' शब्दका अपरोक्षत्व इन दोनों ] विरुद्ध धर्मोंका बाध करके जिस प्रकार देवदत्तकी एकता ही बतलायी जाती है, उसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इस वाक्यमें [ 'तत्' पदके वाच्य ईश्वरकी उपाधि 'माया' और 'त्वम्' पदके वाच्य जीवकी उपाधि 'अन्तःकरण'-इन ] दोनोंके विरुद्ध धर्मोंका बाध करके [ शुद्ध चैतन्यांशकी ] एकता कही जाती है। संलक्ष्य चिन्मात्रतया सदात्मनो- रखण्डभावः परिचीयते बुधैः। एवं महावाक्यशतेन कथ्यते ब्रह्मात्मनोरैक्यमखण्डभावः ॥ २५१ ॥ इस प्रकार लक्षणाद्वारा जीवात्मा और परमात्माके चेतनांशकी एकताका निश्चय कर बुद्धिमान् जन उनके अखण्डभावका परिचय (ज्ञान) प्राप्त करते हैं। ऐसे ही सैकड़ों महावाक्योंसे ब्रह्म और आत्माकी अखण्ड एकताका स्पष्ट वर्णन किया गया है।
ब्रह्म-भावना अस्थूलमित्येतदसन्निरस्य सिद्धं स्वतो व्योमवदप्रतर्क्यम्। अतो मृषामात्रमिदं प्रतीतं जहीहि यत्स्वात्मतया गृहीतम्। ब्रह्माहमित्येव विशुद्धबुद्ध्या विद्धि स्वमात्मानमखण्डबोधम् ॥ २५२॥ 'अस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्' (बृह० ३।८।७) इत्यादि श्रुतिसे असत् स्थूलता आदिका निरास करनेसे आकाशके समान व्यापक अतर्क्य वस्तु स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। इसलिये आत्मरूपसे गृहीत ये देह आदि मिथ्या ही प्रतीत होते हैं, इनमें आत्मबुद्धिको छोड़; और 'मैं ब्रह्म हूँ' इस शुद्ध बुद्धिसे अखण्ड बोधस्वरूप अपने आत्माको जान। मृत्कार्यं सकलं घटादि सततं मृन्मात्रमेवाभित- स्तद्वत्सज्जनितं सदात्मकमिदं सन्मात्रमेवाखिलम्। यस्मान्नास्ति सतः परं किमपि तत्सत्यं स आत्मा स्वयं तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् ॥ २५३ ॥ जिस प्रकार मृत्तिकाके कार्य घट आदि हर तरहसे मृत्तिका ही हैं, उसी प्रकार सत्से उत्पन्न हुआ यह सत्स्वरूप सम्पूर्ण जगत् सन्मात्र ही है। क्योंकि सत्से परे और कुछ भी नहीं है तथा वही सत्य और स्वयं आत्मा भी है, इसलिये जो शान्त, निर्मल और अद्वितीय परब्रह्म है वह तुम्हीं हो। निद्राकल्पितदेशकालविषयज्ञात्रादि सर्वं यथा मिथ्या तद्वदिहापि जाग्रति जगत्स्वाज्ञानकार्यत्वतः। यस्मादेवमिदं शरीरकरणप्राणाहमाद्यप्यसत् तस्मात्तत्त्वमसि प्रशान्तममलं ब्रह्माद्वयं यत्परम् *॥ २५४॥
- लक्ष्मीनारायणप्रेस मुरादाबादकी प्रतिमें इसके पश्चात् यह श्लोक और है—
ब्रह्म-भावना ७१ जिस प्रकार स्वप्नमें निद्रा-दोषसे कल्पित देश, काल, विषय और ज्ञाता आदि सभी मिथ्या होते हैं, उसी प्रकार जाग्रत्-अवस्थामें भी यह जगत्, अपने अज्ञानका कार्य होनेके कारण, मिथ्या ही है। इस प्रकार क्योंकि ये शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण और अहंकार आदि सभी असत्य हैं, अतः तुम वही परब्रह्म हो जो शान्त, निर्मल और अद्वितीय है। जातिनीतिकुलगोत्रदूरगं नामरूपगुणदोषवर्जितम् । देशकालविषयातिवर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५५ ॥ जो जाति, नीति, कुल और गोत्रसे परे है; नाम, रूप, गुण और दोषसे रहित है तथा देश, काल और वस्तुसे भी पृथक् है तुम वही ब्रह्म हो— ऐसी अपने अन्तःकरणमें भावना करो। यत्परं सकलवागगोचरं गोचरं विमलबोधचक्षुषः । शुद्धचिद्घनमनादिवस्तु यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५६ ॥ जो प्रकृतिसे परे और वाणीका अविषय है, निर्मल ज्ञानचक्षुओंसे जाना जा सकता है तथा शुद्ध चिद्घन अनादि वस्तु है, तुम वही ब्रह्म हो— ऐसी अपने अन्तःकरणमें भावना करो। षड्भिरूर्मिभिरयोगि योगिहृद्- भावितं न करणैर्विभावितम् । बुद्ध्यवेद्यमनवद्यभूति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५७ ॥ यत्र भ्रान्त्या कल्पितं तद्विवेके तत्तन्मात्रं नैव तस्माद्विभिन्नम्। स्वप्ने नष्टे स्वप्नविश्वं विचित्रं स्वस्माद्भिन्नं किन्नु दृष्टं प्रबोधे ॥ जिसमें कोई वस्तु भ्रमसे कल्पित होती है विचार होनेपर वह तद्रूप ही प्रतीत होती है, उससे पृथक् नहीं। स्वप्नके नष्ट हो जानेपर जाग्रदवस्थामें क्या विचित्र स्वप्न-प्रपंच अपनेसे पृथक् दिखायी देता है ?
७२ विवेक-चूडामणि क्षुधा-पिपासा आदि छः ऊर्मियोंसे रहित योगिजन जिसका हृदयमें ध्यान करते हैं, जो इन्द्रियोंसे ग्रहण नहीं किया जा सकता तथा बुद्धिसे अगम्य और स्तुत्य ऐश्वर्यशाली है तुम वही ब्रह्म हो—ऐसी चित्तमें भावना करो। भ्रान्तिकल्पितजगत्कलाश्रयं स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम्। निष्कलं निरुपमानमृद्धिमद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५८ ॥ जो इस भ्रान्ति-कल्पित जगत्रूप कलाका आधार है, स्वयं अपने ही आश्रय स्थित है, सत् और असत् दोनोंसे भिन्न है तथा जो निरवयव, उपमारहित और परम ऐश्वर्यसम्पन्न है, वह परब्रह्म ही तुम हो—ऐसा चित्तमें चिन्तन करो। जन्मवृद्विपरिणत्यपक्षय- व्याधिनाशनविहीनमव्ययम् । विश्वसृष्ट्यवनघातकारणं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २५९ ॥ जो जन्म, वृद्धि (बढ़ना), परिणति (बदलना), अपक्षय, व्याधि और नाश—शरीरके इन छहों विकारोंसे रहित और अविनाशी है तथा विश्वकी सृष्टि, पालन और विनाशका कारण है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसी अपने मनमें भावना करो। अस्तभेदमनपास्तलक्षणं निस्तरङ्गजलराशिनिश्चलम् । नित्यमुक्तमविभक्तमूर्ति यद् ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६० ॥ जो भेदरहित और अपरिणामिस्वरूप है, तरंगहीन जलराशिके समान निश्चल है तथा नित्यमुक्त और विभागरहित है वह ब्रह्म ही तुम हो— ऐसा मनमें विचारो।
ब्रह्म-भावना ७३ एकमेव सदनेककारणं कारणान्तरनिरासकारणम् । कार्यकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६१ ॥ जो एक होकर भी अनेकोंका कारण तथा अन्य कारणोंके निषेधका कारण है; किन्तु जो स्वयं कार्य-कारणभावसे अलग है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसा मनमें मनन करो। निर्विकल्पकमनल्पमक्षरं यत्क्षराक्षरविलक्षणं परम्। नित्यमव्ययसुखं निरञ्जनं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६२ ॥ जो निर्विकल्प, महान् और अविनाशी है, क्षर (शरीर) और अक्षर (जीव)-से भिन्न है तथा नित्य, अव्यय, आनन्दस्वरूप और निष्कलंक है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसी हृदयमें भावना करो। यद्विभाति सदनेकधा भ्रमा- नामरूपगुणविक्रियात्मना । हेमवत्स्वयविक्रियं सदा ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६३ ॥ जो सर्वदा सत् और सुवर्णके समान स्वयं निर्विकार है तथापि भ्रमवश [ उसके विकार कटक-कुण्डलादिके समान ] नाना नाम, रूप, गुण और विकारोंके रूपमें भासता है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसा अपने चित्तमें चिन्तन करो। यच्चकास्त्यनपरं परात्परं प्रत्यगेकरसमात्मलक्षणम् । सत्यचित्सुखमनन्तमव्ययं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६४ ॥
७४ विवेक-चूडामणि जो अनपररूपसे [ अर्थात् जिससे परे और कोई न हो इस प्रकार ] प्रकाशमान है, पर (अव्यक्त प्रकृति)-से भी परे है, प्रत्यक्, एकरस और सबका अन्तरात्मा है तथा सच्चिदानन्दस्वरूप, अनन्त और अव्यय है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसी अपने अन्तःकरणमें भावना करो। उक्तमर्थमिममात्मनि स्वयं भावय प्रथितयुक्तिभिर्धिया। संशयादिरहितं कराम्बुवत् तेन तत्त्वनिगमो भविष्यति ॥ २६५ ॥ इस पूर्वोक्त विषयको अपनी बुद्धिसे [ वेदान्तकी ] प्रसिद्ध युक्तियोंद्वारा अपने चित्तमें स्वयं विचारो। इससे हस्तगत जलके समान संशय-विपर्ययसे रहित तत्त्वबोध हो जायगा। स्वं बोधमात्रं परिशुद्धतत्त्वं विज्ञाय सङ्घे नृपवच्च सैन्ये। तदात्मनैवात्मनि सर्वदा स्थितो विलापय ब्रह्मणि दृश्यजातम् ॥ २६६ ॥ सेनाके बीचमें रहनेवाले राजाके समान भूतोंके संघातरूप शरीरके मध्यमें स्थित इस स्वयंप्रकाशस्वरूप विशुद्ध तत्त्वको जानकर सदा तन्मयभावसे स्वस्वरूपमें स्थित रहते हुए सम्पूर्ण दृश्यवर्गको उस ब्रह्ममें ही लीन करो। बुद्धौ गुहायां सदसद्विलक्षणं ब्रह्मास्ति सत्यं परमद्वितीयम्। तदात्मना योऽत्र वसेद्गुहायां पुनर्न तस्याङ्गगुहाप्रवेशः ॥ २६७ ॥ वह सत्-असत्से विलक्षण अद्वितीय सत्य परब्रह्म बुद्धिरूप गुहामें विराजमान है। जो इस गुहामें उससे एकरूप होकर रहता है, हे वत्स ! उसका फिर शरीररूपी कन्दरामें प्रवेश नहीं होता [ अर्थात् वह फिर जन्म ग्रहण नहीं करता ]।
वासना-त्याग ७५ वासना-त्याग ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा कर्ता भोक्ताप्यहमिति दृढा यास्य संसारहेतुः। प्रत्यग्दृष्ट्यात्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान् मुक्तिं प्राहुस्तदिह मुनयो वासनातानवं यत् ॥ २६८ ॥ आत्म-वस्तुका ज्ञान हो जानेपर भी, जो 'मैं कर्ता और भोक्ता हूँ' इस रूपसे दृढ़ होकर [ जन्म-मरणरूप ] संसारका कारण होती है, उस प्रबल अनादि-वासनाको प्रत्यक् (आन्तरिक) दृष्टिसे आत्मस्वरूपमें स्थित होकर प्रयत्नपूर्वक दूर करना चाहिये; क्योंकि इस संसारमें वासनाकी क्षीणताको ही मुनियोंने मुक्ति कहा है। अहंममेति यो भावो देहाक्षादावनात्मनि। अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा स्वात्मनिष्ठया ॥ २६९ ॥ देह-इन्द्रिय आदि अनात्म-वस्तुओंमें जीवका जो अहं अथवा ममभाव है यही अध्यास है। विद्वान्को आत्मनिष्ठाद्वारा इसे दूर कर देना चाहिये। ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम्। सोऽहमित्येव सद्वृत्त्यानात्मन्यात्ममतिं जहि ॥ २७० ॥ प्रत्यगात्मरूप अपने-आपको बुद्धि और उसकी वृत्तियोंका साक्षी जानकर 'मैं वही हूँ' ऐसी समीचीन वृत्तिसे अनात्म-वस्तुओंमें फैली हुई आत्मबुद्धिका त्याग करो। लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्। शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७१ ॥ लोकवासना, देहवासना और शास्त्रवासना-इन तीनोंको छोड़कर आत्मामें हुए संसारके अध्यासका त्याग करो। लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च। देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ २७२ ॥
७६ विवेक-चूडामणि लोकवासना, शास्त्रवासना और देहवासना-इन तीनोंके कारण ही जीवको ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता। संसारकारागृहमोक्षमिच्छो- रयोमयं पादनिबद्धशृङ्खलम्। वदन्ति तज्ज्ञाः पटुवासनात्रयं योऽस्माद्विमुक्तः समुपैति मुक्तिम् ॥ २७३ ॥ संसाररूप कारागारसे मुक्त होनेकी इच्छावाले पुरुषके लिये, ब्रह्मज्ञ पुरुष इस प्रबल वासनात्रयको पैरोंमें पड़ी हुई लोहेकी बेड़ी बतलाते हैं। जो इससे छुटकारा पा जाता है वही मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जलादिसम्पर्कवशात्प्रभूत- दुर्गन्धधूतागरुदिव्यवासना । सङ्घर्षणेनैव विभाति सम्य- ग्विधूयमाने सति बाह्यगन्धे ॥ २७४ ॥ अन्तःश्रितानन्तदुरन्तवासना- धूलीविलिप्ता परमात्मवासना। प्रज्ञातिसङ्घर्षणतो विशुद्धा प्रतीयते चन्दनगन्धवत्स्फुटा ॥ २७५ ॥ जिस प्रकार जल आदिके संसर्गवश [ किसी अन्य ] अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त वस्तुका लेप चढ़ जानेसे दबी हुई अगरुकी दिव्य सुगन्ध संघर्षण (घिसने) -के द्वारा ही बाह्य दुर्गन्धके दूर होनेपर फिर अच्छी तरह प्रतीत होती है; उसी प्रकार अन्तःकरणमें स्थित अनन्त दुर्वासनारूपी धूलिसे ढकी हुई परमात्मवासना बुद्धिके अत्यन्त संघर्षसे शुद्ध होकर चन्दनकी गन्धके समान ही स्पष्ट प्रतीत होने लगती है। अनात्मवासनाजालैस्तिरोभूतात्मवासना । नित्यात्मनिष्ठया तेषां नाशे भाति स्वयं स्फुटा ॥ २७६ ॥
अध्यास-निरास ७७ अनात्मवासनाओंके समूहसे आत्मवासना छिप गयी है; इसलिये निरन्तर आत्मनिष्ठामें स्थित रहनेसे उनका नाश हो जानेपर वह स्पष्ट भासने लगती है। यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मन- स्तथा तथा मुञ्चति बाह्यवासनाः । निःशेषमोक्षे सति वासनाना- मात्मानुभूतिः प्रतिबन्धशून्या ॥ २७७ ॥ मन जैसे-जैसे अन्तर्मुख होता जाता है, वैसे-वैसे ही वह बाह्य वासनाओंको छोड़ता जाता है। जिस समय वासनाओंसे पूर्णतया छुटकारा हो जाता है, उस समय आत्माका प्रतिबन्धशून्य अनुभव होने लगता है। अध्यास-निरास स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः । वासनानां क्षयश्चातः स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७८ ॥ [ चित्तवृत्तियोंको रोककर ] निरन्तर आत्मस्वरूपमें ही स्थिर रहनेसे योगीका मन नष्ट हो जाता है और उसकी वासनाओंका भी क्षय हो जाता है इसलिये अपने अध्यासको दूर करो। तमो द्वाभ्यां रजः सत्त्वात्सत्त्वं शुद्धेन नश्यति । तस्मात्सत्त्वमवष्टभ्य स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७९ ॥ रजोगुण और सत्त्वगुणसे तम, सत्त्वगुणसे रज और शुद्ध सत्त्वसे सत्त्वगुणका नाश होता है, इसलिये शुद्ध सत्त्वका आश्रय लेकर अपने अध्यासका त्याग करो। प्रारब्धं पुष्यति वपुरिति निश्चित्य निश्चलः । धैर्यमालम्ब्य यत्नेन स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८० ॥ प्रारब्ध ही शरीरका पोषण करता है, ऐसा निश्चय कर निश्चलभावसे धैर्य धारण करके यत्नपूर्वक अपने अध्यासको छोड़ो।
७८ विवेक-चूड़ामणि नाहं जीवः परं ब्रह्मेत्यतद्व्यावृत्तिपूर्वकम् । वासनावेगतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८१ ॥ मैं जीव नहीं हूँ, परब्रह्म हूँ, इस प्रकार अपनेमें जीवभावका निषेध करते हुए, वासनात्रयके वेगसे प्राप्त हुए जीवत्वके अध्यासका त्याग करो। श्रुत्या युक्त्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सर्वात्म्यमात्मनः । क्वचिदाभासतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८२ ॥ श्रुति, युक्ति और अपने अनुभवसे आत्माकी सर्वात्मताको जानकर कभी भ्रमसे प्राप्त हुए अपने अध्यासका त्याग करो। अनादानविसर्गाभ्यामीषन्नास्ति क्रिया मुनेः । तदेकनिष्ठया नित्यं स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८३ ॥ बोधवान् मुनिको कोई भी वस्तु ग्राह्य अथवा त्याज्य न होनेसे कुछ भी कर्तव्य नहीं है, इसलिये निरन्तर आत्मनिष्ठाद्वारा आत्मामें हुए अध्यासको त्यागो। तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थब्रह्मात्मैकत्वबोधतः । ब्रह्मण्य आत्मत्वदार्ढ्याय स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८४ ॥ 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८) आदि महावाक्योंसे हुए ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानसे ब्रह्ममें आत्मबुद्धिको दृढ़ करनेके लिये अपने अध्यासको दूर करो। अहंभावस्य देहेऽस्मिन्निःशेषविलयावधि । सावधानेन युक्तात्मा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८५ ॥ इस देहमें जो अहंभाव (मैं-पन) हो रहा है, उसका जबतक पूर्णतया लय न हो जाय, तबतक सावधानतापूर्वक युक्तचित्तसे अपने अध्यासको दूर करो। प्रतीतिर्जीवजगतोः स्वप्नवद्भाति यावता । तावन्निरन्तरं विद्वन्स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८६ ॥ जबतक स्वप्नके समान जीव और जगत्की प्रतीति हो रही है, तबतक हे विद्वन् ! अपने आत्मामें हुए इस अध्यासका निरन्तर त्याग करते रहो।
अध्यास-निरास ७९ निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरपि विस्मृतेः। क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि॥ २८७॥ निद्रा, लौकिक बातचीत अथवा शब्दादि किसीसे भी आत्मविस्मृतिको अवसर न देकर अर्थात् किसी भी कारणसे स्वरूपानुसन्धानको न भूलकर अपने अन्तःकरणमें निरन्तर आत्माका चिन्तन करो। मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमयं वपुः। त्यक्त्वा चाण्डालवद्दूरं ब्रह्मीभूय कृती भव॥ २८८॥ माता-पिताके मलसे उत्पन्न तथा मल-मांससे भरे हुए इस शरीरको चाण्डालके समान दूरसे ही त्यागकर ब्रह्मभावमें स्थित होकर कृतकृत्य हो जाओ। घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परात्मनि। विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने॥ २८९॥ हे मुने! [ घटका नाश होनेपर ] जैसे घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है, वैसे ही जीवात्माको परमात्मामें लीन करके सर्वदा अखण्डभावसे मौन होकर स्थित रहो। स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना। ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत्॥ २९०॥ जगत्का अधिष्ठान जो स्वयंप्रकाश परब्रह्म है, उस सत्स्वरूपसे स्वयं एक होकर पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों उपाधियोंको मलसे भरे हुए भाण्डके समान त्याग दो। चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्। निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा ॥ २९१॥ देहमें व्याप्त हुई अहंबुद्धिको नित्यानन्दस्वरूप चिदात्मामें स्थित करके लिंग-शरीरके अभिमानको छोड़कर सदा अद्वितीयरूपसे स्थित रहो। यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तः पुरं यथा। तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २९२॥
८० विवेक-चूड़ामणि जिसमें यह जगत्का आभास दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान प्रतीत हो रहा है, वह ब्रह्म ही मैं हूँ, ऐसा जान लेनेपर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। यत्सत्यभूतं निजरूपमाद्यं चिदद्वयानन्दरूपमक्रियम् । तदेत्य मिथ्यावपुरुत्सृजैत- च्छैलूषवद्वेषमुपात्तमात्मनः ॥ २९३॥ जो चेतन, अद्वितीय, आनन्दस्वरूप और निष्क्रिय ब्रह्म सत्यस्वरूप तथा अपना आद्य (पहला—मूल) स्वरूप है, उसको प्राप्त होकर नटके समान धारण किये इस शरीररूपी मिथ्या वेषकी आस्था त्याग दो। अहंपदार्थ-निरूपण सर्वात्मना दृश्यमिदं मृषैव नैवाहमर्थः क्षणिकत्वदर्शनात्। जानाम्यहं सर्वमिति प्रतीतिः कुतोऽहमादेः क्षणिकस्य सिध्येत् ॥ २९४॥ यह दृश्य जगत् सर्वथा मिथ्या ही है। इसकी क्षणिकता देखनेमें आती है, इसलिये यह अहंपदार्थ नहीं हो सकता। अतः इन क्षणिक अहंकारादिको 'मैं सब कुछ जानता हूँ'—ऐसी प्रतीति कैसे हो सकती है? अहंपदार्थस्त्वहमादिसाक्षी नित्यं सुषुप्तावपि भावदर्शनात्। ब्रूते ह्यजो नित्य इति श्रुतिः स्वयं तत्प्रत्यगात्मा सदसद्विलक्षणः ॥ २९५॥ अहंपदार्थ तो अहंकार आदिका साक्षी है, क्योंकि उसकी सत्ता सुषुप्तिमें भी देखी जाती है। स्वयं श्रुति भी उसे 'अजो नित्यः'—ऐसा कहती है। अतः वह प्रत्यगात्मा है और सत्-असत्से विलक्षण है।
अहंकार-नन्दा ८१ विकारिणां सर्वविकारवेत्ता नित्योऽविकारो भवितुं समर्हति। मनोरथस्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटं पुनः पुनर्दृष्टमसत्त्वमेतयोः ॥ २९६ ॥ अहंकार आदि विकारी वस्तुओंके समस्त विकारोंको जाननेवाला नित्य तथा अविकारी ही होना चाहिये। मनोरथ, स्वप्न और सुषुप्ति- कालमें इन स्थूल-सूक्ष्म दोनों शरीरोंका अभाव बार-बार स्पष्ट देखा गया है [ अतः ये 'अहंपदार्थ आत्मा' कैसे हो सकते हैं? ] अतोऽभिमानं त्यज मांसपिण्डे पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते। कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम् ॥ २९७ ॥ इसलिये इस मांस-पिण्ड और इसके बुद्धि-कल्पित अभिमानी जीवमें अहंबुद्धि छोड़ो और अपने आत्माको तीनों कालोंमें अबाधित और अखण्ड ज्ञानस्वरूप जानकर शान्ति-लाभ करो। त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम- रूपाश्रमेष्वाद्र्रशवाश्रितेषु । लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादीं- स्त्यक्त्वा भवाखण्डसुखस्वरूपः ॥ २९८ ॥ इस लिबलिबे मांस-पिण्डके आश्रित रहनेवाले कुल, गोत्र, नाम, रूप और आश्रमका अभिमान छोड़ो तथा कर्तापन, भोक्तापन आदि लिंगदेहके धर्मोंको भी त्यागकर अखण्ड आनन्दस्वरूप हो जाओ। अहंकार-निन्दा सन्त्यन्ये प्रतिबन्धाः पुंसः संसारहेतवो दृष्टाः। तेषामेकं मूलं प्रथमविकारो भवत्यहङ्कारः ॥ २९९ ॥