भारतकोश
विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

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ब्रह्म-भावना ७३ एकमेव सदनेककारणं कारणान्तरनिरासकारणम् । कार्यकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६१ ॥ जो एक होकर भी अनेकोंका कारण तथा अन्य कारणोंके निषेधका कारण है; किन्तु जो स्वयं कार्य-कारणभावसे अलग है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसा मनमें मनन करो। निर्विकल्पकमनल्पमक्षरं यत्क्षराक्षरविलक्षणं परम्। नित्यमव्ययसुखं निरञ्जनं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६२ ॥ जो निर्विकल्प, महान् और अविनाशी है, क्षर (शरीर) और अक्षर (जीव)-से भिन्न है तथा नित्य, अव्यय, आनन्दस्वरूप और निष्कलंक है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसी हृदयमें भावना करो। यद्विभाति सदनेकधा भ्रमा- नामरूपगुणविक्रियात्मना । हेमवत्स्वयविक्रियं सदा ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६३ ॥ जो सर्वदा सत् और सुवर्णके समान स्वयं निर्विकार है तथापि भ्रमवश [ उसके विकार कटक-कुण्डलादिके समान ] नाना नाम, रूप, गुण और विकारोंके रूपमें भासता है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसा अपने चित्तमें चिन्तन करो। यच्चकास्त्यनपरं परात्परं प्रत्यगेकरसमात्मलक्षणम् । सत्यचित्सुखमनन्तमव्ययं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६४ ॥