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विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)

Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished153 पृष्ठ

ब्रह्म-भावना ७३ एकमेव सदनेककारणं कारणान्तरनिरासकारणम् । कार्यकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६१ ॥ जो एक होकर भी अनेकोंका कारण तथा अन्य कारणोंके निषेधका कारण है; किन्तु जो स्वयं कार्य-कारणभावसे अलग है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसा मनमें मनन करो। निर्विकल्पकमनल्पमक्षरं यत्क्षराक्षरविलक्षणं परम्। नित्यमव्ययसुखं निरञ्जनं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६२ ॥ जो निर्विकल्प, महान् और अविनाशी है, क्षर (शरीर) और अक्षर (जीव)-से भिन्न है तथा नित्य, अव्यय, आनन्दस्वरूप और निष्कलंक है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसी हृदयमें भावना करो। यद्विभाति सदनेकधा भ्रमा- नामरूपगुणविक्रियात्मना । हेमवत्स्वयविक्रियं सदा ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६३ ॥ जो सर्वदा सत् और सुवर्णके समान स्वयं निर्विकार है तथापि भ्रमवश [ उसके विकार कटक-कुण्डलादिके समान ] नाना नाम, रूप, गुण और विकारोंके रूपमें भासता है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसा अपने चित्तमें चिन्तन करो। यच्चकास्त्यनपरं परात्परं प्रत्यगेकरसमात्मलक्षणम् । सत्यचित्सुखमनन्तमव्ययं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि ॥ २६४ ॥

७४ विवेक-चूडामणि जो अनपररूपसे [ अर्थात् जिससे परे और कोई न हो इस प्रकार ] प्रकाशमान है, पर (अव्यक्त प्रकृति)-से भी परे है, प्रत्यक्, एकरस और सबका अन्तरात्मा है तथा सच्चिदानन्दस्वरूप, अनन्त और अव्यय है वह ब्रह्म ही तुम हो—ऐसी अपने अन्तःकरणमें भावना करो। उक्तमर्थमिममात्मनि स्वयं भावय प्रथितयुक्तिभिर्धिया। संशयादिरहितं कराम्बुवत् तेन तत्त्वनिगमो भविष्यति ॥ २६५ ॥ इस पूर्वोक्त विषयको अपनी बुद्धिसे [ वेदान्तकी ] प्रसिद्ध युक्तियोंद्वारा अपने चित्तमें स्वयं विचारो। इससे हस्तगत जलके समान संशय-विपर्ययसे रहित तत्त्वबोध हो जायगा। स्वं बोधमात्रं परिशुद्धतत्त्वं विज्ञाय सङ्घे नृपवच्च सैन्ये। तदात्मनैवात्मनि सर्वदा स्थितो विलापय ब्रह्मणि दृश्यजातम् ॥ २६६ ॥ सेनाके बीचमें रहनेवाले राजाके समान भूतोंके संघातरूप शरीरके मध्यमें स्थित इस स्वयंप्रकाशस्वरूप विशुद्ध तत्त्वको जानकर सदा तन्मयभावसे स्वस्वरूपमें स्थित रहते हुए सम्पूर्ण दृश्यवर्गको उस ब्रह्ममें ही लीन करो। बुद्धौ गुहायां सदसद्विलक्षणं ब्रह्मास्ति सत्यं परमद्वितीयम्। तदात्मना योऽत्र वसेद्गुहायां पुनर्न तस्याङ्गगुहाप्रवेशः ॥ २६७ ॥ वह सत्-असत्से विलक्षण अद्वितीय सत्य परब्रह्म बुद्धिरूप गुहामें विराजमान है। जो इस गुहामें उससे एकरूप होकर रहता है, हे वत्स ! उसका फिर शरीररूपी कन्दरामें प्रवेश नहीं होता [ अर्थात् वह फिर जन्म ग्रहण नहीं करता ]।

वासना-त्याग ७५ वासना-त्याग ज्ञाते वस्तुन्यपि बलवती वासनानादिरेषा कर्ता भोक्ताप्यहमिति दृढा यास्य संसारहेतुः। प्रत्यग्दृष्ट्यात्मनि निवसता सापनेया प्रयत्नान् मुक्तिं प्राहुस्तदिह मुनयो वासनातानवं यत् ॥ २६८ ॥ आत्म-वस्तुका ज्ञान हो जानेपर भी, जो 'मैं कर्ता और भोक्ता हूँ' इस रूपसे दृढ़ होकर [ जन्म-मरणरूप ] संसारका कारण होती है, उस प्रबल अनादि-वासनाको प्रत्यक् (आन्तरिक) दृष्टिसे आत्मस्वरूपमें स्थित होकर प्रयत्नपूर्वक दूर करना चाहिये; क्योंकि इस संसारमें वासनाकी क्षीणताको ही मुनियोंने मुक्ति कहा है। अहंममेति यो भावो देहाक्षादावनात्मनि। अध्यासोऽयं निरस्तव्यो विदुषा स्वात्मनिष्ठया ॥ २६९ ॥ देह-इन्द्रिय आदि अनात्म-वस्तुओंमें जीवका जो अहं अथवा ममभाव है यही अध्यास है। विद्वान्‌को आत्मनिष्ठाद्वारा इसे दूर कर देना चाहिये। ज्ञात्वा स्वं प्रत्यगात्मानं बुद्धितद्वृत्तिसाक्षिणम्। सोऽहमित्येव सद्वृत्त्यानात्मन्यात्ममतिं जहि ॥ २७० ॥ प्रत्यगात्मरूप अपने-आपको बुद्धि और उसकी वृत्तियोंका साक्षी जानकर 'मैं वही हूँ' ऐसी समीचीन वृत्तिसे अनात्म-वस्तुओंमें फैली हुई आत्मबुद्धिका त्याग करो। लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम्। शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७१ ॥ लोकवासना, देहवासना और शास्त्रवासना-इन तीनोंको छोड़कर आत्मामें हुए संसारके अध्यासका त्याग करो। लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च। देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ २७२ ॥

७६ विवेक-चूडामणि लोकवासना, शास्त्रवासना और देहवासना-इन तीनोंके कारण ही जीवको ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता। संसारकारागृहमोक्षमिच्छो- रयोमयं पादनिबद्धशृङ्खलम्। वदन्ति तज्ज्ञाः पटुवासनात्रयं योऽस्माद्विमुक्तः समुपैति मुक्तिम् ॥ २७३ ॥ संसाररूप कारागारसे मुक्त होनेकी इच्छावाले पुरुषके लिये, ब्रह्मज्ञ पुरुष इस प्रबल वासनात्रयको पैरोंमें पड़ी हुई लोहेकी बेड़ी बतलाते हैं। जो इससे छुटकारा पा जाता है वही मोक्ष प्राप्त कर लेता है। जलादिसम्पर्कवशात्प्रभूत- दुर्गन्धधूतागरुदिव्यवासना । सङ्घर्षणेनैव विभाति सम्य- ग्विधूयमाने सति बाह्यगन्धे ॥ २७४ ॥ अन्तःश्रितानन्तदुरन्तवासना- धूलीविलिप्ता परमात्मवासना। प्रज्ञातिसङ्घर्षणतो विशुद्धा प्रतीयते चन्दनगन्धवत्स्फुटा ॥ २७५ ॥ जिस प्रकार जल आदिके संसर्गवश [ किसी अन्य ] अत्यन्त दुर्गन्धयुक्त वस्तुका लेप चढ़ जानेसे दबी हुई अगरुकी दिव्य सुगन्ध संघर्षण (घिसने) -के द्वारा ही बाह्य दुर्गन्धके दूर होनेपर फिर अच्छी तरह प्रतीत होती है; उसी प्रकार अन्तःकरणमें स्थित अनन्त दुर्वासनारूपी धूलिसे ढकी हुई परमात्मवासना बुद्धिके अत्यन्त संघर्षसे शुद्ध होकर चन्दनकी गन्धके समान ही स्पष्ट प्रतीत होने लगती है। अनात्मवासनाजालैस्तिरोभूतात्मवासना । नित्यात्मनिष्ठया तेषां नाशे भाति स्वयं स्फुटा ॥ २७६ ॥

अध्यास-निरास ७७ अनात्मवासनाओंके समूहसे आत्मवासना छिप गयी है; इसलिये निरन्तर आत्मनिष्ठामें स्थित रहनेसे उनका नाश हो जानेपर वह स्पष्ट भासने लगती है। यथा यथा प्रत्यगवस्थितं मन- स्तथा तथा मुञ्चति बाह्यवासनाः । निःशेषमोक्षे सति वासनाना- मात्मानुभूतिः प्रतिबन्धशून्या ॥ २७७ ॥ मन जैसे-जैसे अन्तर्मुख होता जाता है, वैसे-वैसे ही वह बाह्य वासनाओंको छोड़ता जाता है। जिस समय वासनाओंसे पूर्णतया छुटकारा हो जाता है, उस समय आत्माका प्रतिबन्धशून्य अनुभव होने लगता है। अध्यास-निरास स्वात्मन्येव सदा स्थित्या मनो नश्यति योगिनः । वासनानां क्षयश्चातः स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७८ ॥ [ चित्तवृत्तियोंको रोककर ] निरन्तर आत्मस्वरूपमें ही स्थिर रहनेसे योगीका मन नष्ट हो जाता है और उसकी वासनाओंका भी क्षय हो जाता है इसलिये अपने अध्यासको दूर करो। तमो द्वाभ्यां रजः सत्त्वात्सत्त्वं शुद्धेन नश्यति । तस्मात्सत्त्वमवष्टभ्य स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २७९ ॥ रजोगुण और सत्त्वगुणसे तम, सत्त्वगुणसे रज और शुद्ध सत्त्वसे सत्त्वगुणका नाश होता है, इसलिये शुद्ध सत्त्वका आश्रय लेकर अपने अध्यासका त्याग करो। प्रारब्धं पुष्यति वपुरिति निश्चित्य निश्चलः । धैर्यमालम्ब्य यत्नेन स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८० ॥ प्रारब्ध ही शरीरका पोषण करता है, ऐसा निश्चय कर निश्चलभावसे धैर्य धारण करके यत्नपूर्वक अपने अध्यासको छोड़ो।

७८ विवेक-चूड़ामणि नाहं जीवः परं ब्रह्मेत्यतद्व्यावृत्तिपूर्वकम् । वासनावेगतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८१ ॥ मैं जीव नहीं हूँ, परब्रह्म हूँ, इस प्रकार अपनेमें जीवभावका निषेध करते हुए, वासनात्रयके वेगसे प्राप्त हुए जीवत्वके अध्यासका त्याग करो। श्रुत्या युक्त्या स्वानुभूत्या ज्ञात्वा सर्वात्म्यमात्मनः । क्वचिदाभासतः प्राप्तस्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८२ ॥ श्रुति, युक्ति और अपने अनुभवसे आत्माकी सर्वात्मताको जानकर कभी भ्रमसे प्राप्त हुए अपने अध्यासका त्याग करो। अनादानविसर्गाभ्यामीषन्नास्ति क्रिया मुनेः । तदेकनिष्ठया नित्यं स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८३ ॥ बोधवान् मुनिको कोई भी वस्तु ग्राह्य अथवा त्याज्य न होनेसे कुछ भी कर्तव्य नहीं है, इसलिये निरन्तर आत्मनिष्ठाद्वारा आत्मामें हुए अध्यासको त्यागो। तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थब्रह्मात्मैकत्वबोधतः । ब्रह्मण्य आत्मत्वदार्ढ्याय स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८४ ॥ 'तत्त्वमसि' (छान्दो० ६।८) आदि महावाक्योंसे हुए ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानसे ब्रह्ममें आत्मबुद्धिको दृढ़ करनेके लिये अपने अध्यासको दूर करो। अहंभावस्य देहेऽस्मिन्निःशेषविलयावधि । सावधानेन युक्तात्मा स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८५ ॥ इस देहमें जो अहंभाव (मैं-पन) हो रहा है, उसका जबतक पूर्णतया लय न हो जाय, तबतक सावधानतापूर्वक युक्तचित्तसे अपने अध्यासको दूर करो। प्रतीतिर्जीवजगतोः स्वप्नवद्भाति यावता । तावन्निरन्तरं विद्वन्स्वाध्यासापनयं कुरु ॥ २८६ ॥ जबतक स्वप्नके समान जीव और जगत्की प्रतीति हो रही है, तबतक हे विद्वन् ! अपने आत्मामें हुए इस अध्यासका निरन्तर त्याग करते रहो।

अध्यास-निरास ७९ निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरपि विस्मृतेः। क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि॥ २८७॥ निद्रा, लौकिक बातचीत अथवा शब्दादि किसीसे भी आत्मविस्मृतिको अवसर न देकर अर्थात् किसी भी कारणसे स्वरूपानुसन्धानको न भूलकर अपने अन्तःकरणमें निरन्तर आत्माका चिन्तन करो। मातापित्रोर्मलोद्भूतं मलमांसमयं वपुः। त्यक्त्वा चाण्डालवद्दूरं ब्रह्मीभूय कृती भव॥ २८८॥ माता-पिताके मलसे उत्पन्न तथा मल-मांससे भरे हुए इस शरीरको चाण्डालके समान दूरसे ही त्यागकर ब्रह्मभावमें स्थित होकर कृतकृत्य हो जाओ। घटाकाशं महाकाश इवात्मानं परात्मनि। विलाप्याखण्डभावेन तूष्णीं भव सदा मुने॥ २८९॥ हे मुने! [ घटका नाश होनेपर ] जैसे घटाकाश महाकाशमें मिल जाता है, वैसे ही जीवात्माको परमात्मामें लीन करके सर्वदा अखण्डभावसे मौन होकर स्थित रहो। स्वप्रकाशमधिष्ठानं स्वयंभूय सदात्मना। ब्रह्माण्डमपि पिण्डाण्डं त्यज्यतां मलभाण्डवत्॥ २९०॥ जगत्का अधिष्ठान जो स्वयंप्रकाश परब्रह्म है, उस सत्स्वरूपसे स्वयं एक होकर पिण्ड और ब्रह्माण्ड दोनों उपाधियोंको मलसे भरे हुए भाण्डके समान त्याग दो। चिदात्मनि सदानन्दे देहरूढामहंधियम्। निवेश्य लिङ्गमुत्सृज्य केवलो भव सर्वदा ॥ २९१॥ देहमें व्याप्त हुई अहंबुद्धिको नित्यानन्दस्वरूप चिदात्मामें स्थित करके लिंग-शरीरके अभिमानको छोड़कर सदा अद्वितीयरूपसे स्थित रहो। यत्रैष जगदाभासो दर्पणान्तः पुरं यथा। तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २९२॥

८० विवेक-चूड़ामणि जिसमें यह जगत्का आभास दर्पणमें प्रतिबिम्बित नगरके समान प्रतीत हो रहा है, वह ब्रह्म ही मैं हूँ, ऐसा जान लेनेपर तुम कृतकृत्य हो जाओगे। यत्सत्यभूतं निजरूपमाद्यं चिदद्वयानन्दरूपमक्रियम् । तदेत्य मिथ्यावपुरुत्सृजैत- च्छैलूषवद्वेषमुपात्तमात्मनः ॥ २९३॥ जो चेतन, अद्वितीय, आनन्दस्वरूप और निष्क्रिय ब्रह्म सत्यस्वरूप तथा अपना आद्य (पहला—मूल) स्वरूप है, उसको प्राप्त होकर नटके समान धारण किये इस शरीररूपी मिथ्या वेषकी आस्था त्याग दो। अहंपदार्थ-निरूपण सर्वात्मना दृश्यमिदं मृषैव नैवाहमर्थः क्षणिकत्वदर्शनात्। जानाम्यहं सर्वमिति प्रतीतिः कुतोऽहमादेः क्षणिकस्य सिध्येत् ॥ २९४॥ यह दृश्य जगत् सर्वथा मिथ्या ही है। इसकी क्षणिकता देखनेमें आती है, इसलिये यह अहंपदार्थ नहीं हो सकता। अतः इन क्षणिक अहंकारादिको 'मैं सब कुछ जानता हूँ'—ऐसी प्रतीति कैसे हो सकती है? अहंपदार्थस्त्वहमादिसाक्षी नित्यं सुषुप्तावपि भावदर्शनात्। ब्रूते ह्यजो नित्य इति श्रुतिः स्वयं तत्प्रत्यगात्मा सदसद्विलक्षणः ॥ २९५॥ अहंपदार्थ तो अहंकार आदिका साक्षी है, क्योंकि उसकी सत्ता सुषुप्तिमें भी देखी जाती है। स्वयं श्रुति भी उसे 'अजो नित्यः'—ऐसा कहती है। अतः वह प्रत्यगात्मा है और सत्-असत्से विलक्षण है।

अहंकार-नन्दा ८१ विकारिणां सर्वविकारवेत्ता नित्योऽविकारो भवितुं समर्हति। मनोरथस्वप्नसुषुप्तिषु स्फुटं पुनः पुनर्दृष्टमसत्त्वमेतयोः ॥ २९६ ॥ अहंकार आदि विकारी वस्तुओंके समस्त विकारोंको जाननेवाला नित्य तथा अविकारी ही होना चाहिये। मनोरथ, स्वप्न और सुषुप्ति- कालमें इन स्थूल-सूक्ष्म दोनों शरीरोंका अभाव बार-बार स्पष्ट देखा गया है [ अतः ये 'अहंपदार्थ आत्मा' कैसे हो सकते हैं? ] अतोऽभिमानं त्यज मांसपिण्डे पिण्डाभिमानिन्यपि बुद्धिकल्पिते। कालत्रयाबाध्यमखण्डबोधं ज्ञात्वा स्वमात्मानमुपैहि शान्तिम् ॥ २९७ ॥ इसलिये इस मांस-पिण्ड और इसके बुद्धि-कल्पित अभिमानी जीवमें अहंबुद्धि छोड़ो और अपने आत्माको तीनों कालोंमें अबाधित और अखण्ड ज्ञानस्वरूप जानकर शान्ति-लाभ करो। त्यजाभिमानं कुलगोत्रनाम- रूपाश्रमेष्वाद्र्रशवाश्रितेषु । लिङ्गस्य धर्मानपि कर्तृतादीं- स्त्यक्त्वा भवाखण्डसुखस्वरूपः ॥ २९८ ॥ इस लिबलिबे मांस-पिण्डके आश्रित रहनेवाले कुल, गोत्र, नाम, रूप और आश्रमका अभिमान छोड़ो तथा कर्तापन, भोक्तापन आदि लिंगदेहके धर्मोंको भी त्यागकर अखण्ड आनन्दस्वरूप हो जाओ। अहंकार-निन्दा सन्त्यन्ये प्रतिबन्धाः पुंसः संसारहेतवो दृष्टाः। तेषामेकं मूलं प्रथमविकारो भवत्यहङ्कारः ॥ २९९ ॥

८२ विवेक-चूडामणि पुरुषको इस संसार-बन्धनकी प्राप्तिके कारणरूप और भी अनेक प्रतिबन्ध हैं; किन्तु उन सबका मूल प्रथम विकार अहंकार ही है, [क्योंकि अन्य समस्त अनात्मभावोंका प्रादुर्भाव इसीसे होता है]। यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहङ्कारेण दुरात्मना। तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा॥ ३००॥ जबतक इस दुरात्मा अहंकारसे आत्माका सम्बन्ध है, तबतक मुक्ति- जैसी विलक्षण बातकी लेशमात्र भी आशा न रखनी चाहिये। अहङ्कारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते। चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः॥ ३०१॥ अहंकाररूपी ग्रह (राहु)-से मुक्त हो जानेपर चन्द्रमाके समान आत्मा निर्मल, पूर्ण एवं नित्यानन्दस्वरूप स्वयंप्रकाश होकर अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। यो वा पुरे सोऽहमिति प्रतीतो बुद्ध्या विक्लृप्तस्तमसातिमूढया। तस्यैव निःशेषतया विनाशे ब्रह्मात्मभावः प्रतिबन्धशून्यः॥ ३०२॥ अज्ञानसे अत्यन्त मोहित बुद्धिकी कल्पनासे इस शरीरमें ही जो 'यही मैं हूँ'—ऐसी प्रतीति हो रही है, उसका सर्वथा नाश हो जानेपर ब्रह्ममें निर्बाध आत्मभाव हो जाता है। ब्रह्मानन्दनिधिर्महाबलवताहङ्कारघोराहिना संवेष्ट्यात्मनि रक्ष्यते गुणमयैश्चण्डैस्त्रिभिर्मस्तकैः। विज्ञानाख्यमहासिना द्युतिमता विच्छिद्य शीर्षत्रयं निर्मूल्याहिमिमं निधिं सुखकरं धीरोऽनुभोक्तुं क्षमः॥ ३०३॥ ब्रह्मानन्दरूपी परमधनको अहंकाररूप महाभयंकर सर्पने अपने सत्त्व, रज, तमरूप तीन प्रचण्ड मस्तकोंसे लपेटकर छिपा रखा है; जब विवेकी पुरुष अनुभव-ज्ञानरूप चमचमाते हुए महान् खड्गसे इन तीनों मस्तकोंको

अहंकार-निन्दा ८३ काटकर इस सर्पका नाश कर देता है, तभी वह इस परम आनन्ददायिनी सम्पत्तिको भोग सकता है। यावद्वा यत्किञ्चिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे। कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥ ३०४ ॥ जबतक देहमें विषका थोड़ा-सा भी दोष रहता है, तबतक वह उसे नीरोग कैसे रहने देगा ? उसी प्रकार योगीकी मुक्तिके मार्गमें अहंकारका यत्किंचित् लेश भी भारी प्रतिबन्धक होता है। अहमोऽत्यन्तनिवृत्त्या तत्कृतनानाविकल्पसंहृत्या । प्रत्यक्तत्त्वविवेकादयमहमस्मीति विन्दते तत्त्वम् ॥ ३०५ ॥ अहंकारकी निःशेष निवृत्तिसे उससे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके विकल्पोंका नाश हो जानेपर आत्मतत्त्वका विवेक हो जानेसे 'यह आत्मा ही मैं हूँ' ऐसा तत्त्व-बोध प्राप्त होता है। अहंकर्त्र्यस्मिन्नहमिति मतिं मुंच सहसा विकारात्मन्यात्मप्रतिफलजुषि स्वस्थितिमुषि। यदध्यासात्प्राप्ता जनिमृतिजरादुःखबहुला प्रतीचश्चिन्मूर्तेस्तव सुखतनोः संसृतिरियम् ॥ ३०६॥ इस विकारात्मक, आत्मप्रतिविम्बयुक्त और स्वरूपको छिपानेवाले अहंकारमें अहंबुद्धिको शीघ्र ही त्याग दे। इसके अध्याससे ही तुझ 'चैतन्यमूर्ति, आनन्दस्वरूप प्रत्यगात्माको जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण यह संसार-बन्धन प्राप्त हुआ है। सदैकरूपस्य चिदात्मनो विभो- रानन्दमूर्तेरनवद्यकीर्तेः । नैवान्यथा क्वाप्यविकारिणस्ते विनाहमध्यासममुष्य संसृतिः ॥ ३०७॥

८४ विवेक-चूडामणि इस अहंकाररूप अध्यासके बिना तुझ सर्वदा एकरूप, चिदात्मा, व्यापक, आनन्दस्वरूप, पवित्रकीर्ति और अविकारी आत्माको और किसी प्रकार संसार-बन्धनकी प्राप्ति नहीं हो सकती। तस्मादहङ्कारमिमं स्वशत्रुं भोक्तुर्गले कण्टकवत्प्रतीतम्। विच्छिद्य विज्ञानमहासिना स्फुटं भुङ्क्ष्वात्मसाम्राज्यसुखं यथेष्टम् ॥ ३०८ ॥ इसलिये हे विद्वन् ! भोजन करनेवाले पुरुषके गलेमें काँटेके समान खटकनेवाले इस अहंकाररूप अपने शत्रुको विज्ञानरूप महाखड्गसे भली प्रकार छेदन कर आत्म-साम्राज्य-सुखका यथेष्ट भोग करो। ततोऽहमादेर्विनिवर्त्य वृत्तिं सन्त्यक्तरागः परमार्थलाभात्। तूष्णीं समास्वात्मसुखानुभूत्या पूर्णात्मना ब्रह्मणि निर्विकल्पः ॥ ३०९ ॥ फिर अहंकार आदिकी कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि वृत्तियोंको हटाकर परमार्थ-तत्त्वकी प्राप्तिसे रागरहित होकर आत्मानन्दके अनुभवसे ब्रह्मभावमें पूर्णतया स्थित होकर निर्विकल्प और मौन हो जाओ। समूलकृत्तोऽपि महानहं पुन- र्व्युल्लेखितः स्याद्यदि चेतसा क्षणम्। सञ्जीव्य विक्षेपशतं करोति नभस्वता प्रावृषि वारिदो यथा ॥ ३१० ॥ यह प्रबल अहंकार जड़-मूलसे नष्ट कर दिया जानेपर भी यदि एक क्षणमात्रको चित्तका सम्पर्क प्राप्त कर ले तो पुनः प्रकट होकर सैकड़ों उत्पात खड़े कर देता है; जैसे कि वर्षाकालमें वायुसे संयुक्त हुआ मेघ।

क्रिया, चिन्ता और वासनाका त्याग ८५ क्रिया, चिन्ता और वासनाका त्याग निगृह्य शत्रोरहमोऽवकाशः क्वचिन्न देयो विषयानुचिन्त्या। स एव संजीवनहेतुरस्य प्रक्षीणजम्बीरतरोरिवाम्बु ॥ ३११ ॥ इस अहंकाररूप शत्रु का निग्रह कर लेनेपर फिर विषयचिन्तनके द्वारा इसे सिर उठानेका अवसर कभी न देना चाहिये, क्योंकि नष्ट हुए जम्बीरके वृक्षके लिये जलके समान इसके पुनरुज्जीवन (फिर जी उठने)- का कारण यह विषय-चिन्तन ही है। देहात्मना संस्थित एव कामी विलक्षणः कामयिता कथं स्यात्। अतोऽर्थसन्धानपरत्वमेव भेदप्रसक्त्या भवबन्धहेतुः ॥ ३१२ ॥ जो पुरुष देहात्म-बुद्धिसे स्थित है, वही कामनावाला होता है। जिसका देहसे सम्बन्ध नहीं है, वह विलक्षण आत्मा कैसे सकाम हो सकता है? इसलिये भेदासक्तिका कारण होनेसे विषय-चिन्तनमें लगा रहना ही संसार-बन्धनका मुख्य कारण है। कार्यप्रवर्धनाद्बीजप्रवृद्धिः परिदृश्यते। कार्यनाशाद्बीजनाशस्तस्मात्कार्यं निरोधयेत् ॥ ३१३ ॥ कार्यके बढ़नेसे उसके बीजकी वृद्धि होती भी देखी जाती है और कार्यका नाश हो जानेसे बीज भी नष्ट हो जाता है; इसलिये कार्यका ही नाश कर देना चाहिये। वासनावृद्धितः कार्यं कार्यवृद्ध्या च वासना। वर्धते सर्वथा पुंसः संसारो न निवर्तते ॥ ३१४॥ वासनाके बढ़नेसे कार्य बढ़ता है और कार्यके बढ़नेसे वासना बढ़ती है; इस प्रकार मनुष्यका संसार-बन्धन बिलकुल नहीं छूटता।

८६ विवेक-चूडामणि संसारबन्धविच्छित्त्यै तद्द्वयं प्रदहेद्यतिः । वासनावृद्धिरेताभ्यां चिन्तया क्रियया बहिः ॥ ३१५ ॥ इसलिये संसार-बन्धनको काटनेके लिये मुनि इन दोनोंका नाश करे। विषयोंकी चिन्ता और बाह्य-क्रिया—इनसे ही वासनाकी वृद्धि होती है। ताभ्यां प्रवर्धमाना सा सूते संसृतिमात्मनः । त्रयाणां च क्षयोपायः सर्वावस्थासु सर्वदा ॥ ३१६ ॥ सर्वत्र सर्वतः सर्वं ब्रह्ममात्रावलोकनम्। सद्भाववासनादार्ढ्यात्तत्त्रयं लयमश्नुते ॥ ३१७॥ और इन दोनोंसे ही बढ़कर वह वासना आत्माके लिये संसाररूप बन्धन उत्पन्न करती है। इन तीनोंके क्षयका उपाय सब अवस्थाओंमें सदा सब जगह सब ओर सबको ब्रह्ममात्र देखना ही है। इस ब्रह्ममय वासनाके दृढ़ हो जानेपर इन तीनोंका लय हो जाता है। क्रियानाशे भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः । वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥ ३१८ ॥ क्रियाके नष्ट हो जानेसे चिन्ताका नाश होता है और चिन्ताके नाशसे वासनाओंका क्षय होता है; इस वासनाक्षयका नाम ही मोक्ष है और यही जीवन्मुक्ति कहलाती है। सद्वासनास्फूर्तिविजृम्भणे सति ह्यसौ विलीना त्वहमादिवासना । अतिप्रकृष्टाप्यरुणप्रभायां विलीयते साधु यथा तमिस्रा ॥ ३१९ ॥ सूर्यकी प्रभाके उदय होते ही जैसे अत्यन्त घोर अँधेरी रातका भी सर्वथा नाश हो जाता है उसी प्रकार ब्रह्म-वासनाकी स्फूर्तिका विस्तार होनेपर यह अहंकारादिकी वासनाएँ लीन हो जाती हैं।

प्रमाद-निन्दा ८७ तमस्तमःकार्यमनर्थजालं न दृश्यते सत्युदिते दिनेशे। तथाद्वयानन्दरसानुभूतौ नैवास्ति बन्धो न च दुःखगन्धः ॥ ३२०॥ सूर्यके उदय होनेपर जैसे अन्धकार और उसमें होनेवाले [ चोरी आदि ] अनर्थ-समूह कहीं दिखलायी नहीं देते, वैसे ही इस अद्वितीय आत्मानन्दके रसका अनुभव होनेपर न तो संसार-बन्धन रहता है और न दुःखका ही गन्ध रहता है। प्रमाद-निन्दा दृश्यं प्रतीतं प्रविलापयन्स्वयं सन्मात्रमानन्दघनं विभावयन्। समाहितः सन्बहिरन्तरं वा कालं नयेथाः सति कर्मबन्धे ॥ ३२१॥ यदि तुम्हारा कर्मबन्धन अभी शेष है तो इस प्रतीयमान दृश्यका लय करते हुए तथा बाहर-भीतरसे सावधान रहकर अपने सत्तामात्र आनन्दघन स्वरूपका चिन्तन करते हुए कालक्षेप करो। प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याह भगवान्ब्रह्मणः सुतः ॥ ३२२॥ ब्रह्मविचारमें कभी प्रमाद (असावधानी) न करना चाहिये, क्योंकि ब्रह्माजीके पुत्र (भगवान् सनत्कुमारजी)-ने 'प्रमाद मृत्यु है'-ऐसा कहा है। न प्रमादादनर्थोऽन्यो ज्ञानिनः स्वस्वरूपतः। ततो मोहस्ततोऽहंधीस्ततो बन्धस्ततो व्यथा ॥ ३२३॥ विचारवान् पुरुषके लिये अपने स्वरूपानुसन्धानसे प्रमाद करनेसे बढ़कर और कोई अनर्थ नहीं है, क्योंकि इसीसे मोह होता है और मोहसे अहंकार, अहंकारसे बन्धन तथा बन्धनसे क्लेशकी प्राप्ति होती है।

८८ विवेक-चूड़ामणि विषयाभिमुखं दृष्ट्वा विद्वांसमपि विस्मृतिः। विक्षेपयति धीदोषैर्योषा जारमिव प्रियम्॥ ३२४॥ जिस प्रकार कुलटा स्त्री अपने प्रेमी जार-पुरुषको उसकी बुद्धि बिगाड़कर पागल बना देती है उसी प्रकार विद्वान् पुरुषको भी विषयोंमें प्रवृत्त होता देखकर आत्मविस्मृति बुद्धिदोषोंसे विक्षिप्त कर देती है। यथापकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति। आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम्॥ ३२५॥ जिस प्रकार शैवालको जलपरसे एक बार हटा देनेपर वह क्षणभर भी अलग नहीं रहता, [ तुरन्त ही फिर उसको ढँक लेता है ] उसी प्रकार आत्म-विचार-हीन विद्वान्को भी माया फिर घेर लेती है। लक्ष्यच्युतं सद्यदि चित्तमीषद् बहिर्मुखं सन्निपतेत्ततस्ततः। प्रमादतः प्रच्युतकेलिकन्दुकः सोपानपङ्क्तौ पतितो यथा तथा॥ ३२६॥ जैसे असावधानतावश (हाथसे छूटकर) सीढ़ियोंपर गिरी हुई खेलकी गेंद एक सीढ़ीसे दूसरी सीढ़ीपर गिरती हुई नीचे चली जाती है वैसे ही यदि चित्त अपने लक्ष्य (ब्रह्म)-से हटकर थोड़ा-सा भी बहिर्मुख हो जाता है तो फिर बराबर नीचेहीकी ओर गिरता जाता है। विषयेष्वाविशच्चेतः संकल्पयति तद्गुणान्। सम्यक्संकल्पनात्कामः कामात्पुंसः प्रवर्तनम्॥ ३२७॥ विषयोंमें लगा हुआ चित्त उनके गुणोंका चिन्तन करता है, फिर निरन्तर चिन्तन करनेसे उनकी कामना जागृत होती है और कामनासे पुरुषकी विषयोंमें प्रवृत्ति हो जाती है। ततः स्वरूपविभ्रंशो विभ्रष्टस्तु पतत्यधः। पतितस्य विना नाशं पुनर्नारोह ईक्ष्यते। सङ्कल्पं वर्जयेत्तस्मात्सर्वानर्थस्य कारणम्॥ ३२८॥

प्रमाद-निन्दा ८९ विषयोंकी प्रवृत्तिसे मनुष्य आत्मस्वरूपसे गिर जाता है और जो एक बार स्वरूपसे गिर गया, उसका निरन्तर अधःपतन होता रहता है तथा पतित पुरुषका नाशके सिवा फिर उत्थान तो प्रायः कभी देखा नहीं जाता है। इसलिये सम्पूर्ण अनर्थोंके कारणरूप संकल्पको त्याग देना चाहिये। अतः प्रमादान्न परोऽस्ति मृत्यु- र्विवेकिनो ब्रह्मविदः समाधौ। समाहितः सिद्धिमुपैति सम्यक् समाहितात्मा भव सावधानः ॥ ३२९ ॥ इसलिये विवेकी और ब्रह्मवेत्ता पुरुषके लिये समाधिमें प्रमाद करनेसे बढ़कर और कोई मृत्यु नहीं है। समाहित पुरुष ही पूर्ण आत्म-सिद्धि प्राप्त कर सकता है; इसलिये सावधानतापूर्वक चित्तको समाहित (स्थिर) करो।

असत्-परिहार जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहे स च केवलः। यत्किञ्चित्पश्यतो भेदं भयं ब्रूते यजुःश्रुतिः॥ ३३०॥ जिसने जीते हुए ही कैवल्यपद प्राप्त कर लिया है उसीकी देहपातके अनन्तर कैवल्यमुक्ति होती है, क्योंकि जो थोड़ा-सा भी भेद देखता है उसके लिये यजुर्वेदकी श्रुति भय बताती है। यदा कदा वापि विपश्चिदेष ब्रह्मण्यनन्तेऽप्यणुमात्रभेदम् । पश्यत्यथामुष्य भयं तदैव यद्वीक्षितं भिन्नतया प्रमादात् ॥ ३३१ ॥ जब कभी यह विद्वान् अनन्त ब्रह्ममें अणुमात्र भी भेद-दृष्टि करता है तभी इसको भयकी प्राप्ति होती है, क्योंकि स्वरूपके प्रमादसे ही अखण्ड आत्मामें भेदकी प्रतीति हुई है। श्रुतिस्मृतिन्यायशतैर्निषिद्धे दृश्येऽत्र यः स्वात्ममतिं करोति। उपैति दुःखोपरि दुःखजातं निषिद्धकर्ता स मलिम्लुचो यथा॥ ३३२ ॥ श्रुति, स्मृति और सैकड़ों युक्तियोंसे निषिद्ध हुए इस दृश्य (देहादि)- में जो आत्मबुद्धि करता है, वह निषिद्ध कर्म करनेवाले चोरके समान दुःख-पर-दुःख भोगता है। सत्याभिसन्धानरतो विमुक्तो महत्त्वमात्मीयमुपैति नित्यम्। मिथ्याभिसन्धानरतस्तु नश्येद् दृष्टं तदेतद्यदचोरचोरयोः ॥ ३३३ ॥ जो अद्वितीय ब्रह्मरूप सत्य पदार्थकी खोज करता है वही मुक्त होकर अपने

असत्-परिहार ९१ नित्य महत्त्वको प्राप्त करता है और जो मिथ्या दृश्य पदार्थोंके पीछे पड़ा रहता है वह नष्ट हो जाता है; ऐसा ही साधु और चोरके विषयमें * देखा भी गया है। यतिरसदनुसन्धिं बन्धहेतुं विहाय स्वयमयमहमस्मीत्यात्मदृष्ट्यैव तिष्ठेत् । सुखयति ननु निष्ठा ब्रह्मणि स्वानुभूत्या हरति परमविद्याकार्यदुःखं प्रतीतम् ॥ ३३४॥ यतिको चाहिये कि असत्-पदार्थोंका पीछा छोड़कर 'यह साक्षात् ब्रह्म ही मैं हूँ' ऐसी आत्मदृष्टिमें ही स्थिर होकर रहे। अपने अनुभवसे उत्पन्न हुई ब्रह्मनिष्ठा ही अविद्याके कार्यभूत इस प्रतीयमान प्रपंचके दुःखको दूर करके परम सुख देती है। बाह्यानुसन्धिः परिवर्धयेत्फलं दुर्वासनामेव ततस्ततोऽधिकाम् । ज्ञात्वा विवेकैः परिहृत्य बाह्यं स्वात्मानुसन्धिं विदधीत नित्यम् ॥ ३३५ ॥ बाह्य विषयोंका चिन्तन अपने दुर्वासनारूप फलको ही उत्तरोत्तर बढ़ाता है, इसलिये विवेकपूर्वक आत्मस्वरूपको जानकर बाह्य विषयोंको छोड़ता हुआ नित्य आत्मानुसन्धान ही करता रहे। बाह्ये निरुद्धे मनसः प्रसन्नता मनःप्रसादे परमात्मदर्शनम् । तस्मिन्सुदृष्टे भवबन्धनाशो बहिर्निरोधः पदवी विमुक्तेः ॥ ३३६ ॥

  • इस प्रसंगका छान्दोग्योपनिषद् (६। १६। १-२)-में इस प्रकार वर्णन किया है कि जिस व्यक्तिपर चोरी करनेका सन्देह होता है उसे राजपुरुष तपाया हुआ परशु देते हैं। यदि उसने चोरी की होती है और वह 'मैंने चोरी नहीं की' ऐसा कहकर मिथ्या भाषण करता है तो उससे दग्ध हो जाता है और तब राजपुरुष भी उसे मार डालते हैं; और यदि वह वास्तवमें चोर नहीं होता तो सत्यसे सुरक्षित रहनेके कारण वह उस परशुसे दग्ध नहीं होता और उसे राजपुरुष भी छोड़ देते हैं।

९२ विवेक-चूडामणि बाह्य पदार्थोंका निषेध कर देनेपर मनमें आनन्द होता है और मनमें आनन्दका उद्रेक होनेपर परमात्माका साक्षात्कार होता है और उसका सम्यक् साक्षात्कार होनेपर संसारबन्धनका नाश हो जाता है। इस प्रकार बाह्य वस्तुओंका निषेध ही मुक्तिका मार्ग है। कः पण्डितः सन्सदसद्विवेकी श्रुतिप्रमाणः परमार्थदर्शी। जानन्हि कुर्यादसतोऽवलम्बं स्वपातहेतोः शिशुवन्मुमुक्षुः ॥ ३३७॥ सत्-असत् वस्तुका विवेकी, श्रुतिप्रमाणका जाननेवाला, परमार्थ-तत्त्वका ज्ञाता ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो मुक्तिकी इच्छा रखकर भी जान-बूझकर बालकके समान अपने पतनके हेतु असत् पदार्थोंका ग्रहण करेगा। देहादिसंसक्तिमतो न मुक्ति- र्मुक्तस्य देहाद्यभिमत्यभावः। सुप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः स्वप्नस्तयोर्भिन्नगुणाश्रयत्वात् ॥ ३३८ ॥ जिसकी देह आदि अनात्मवस्तुओंमें आसक्ति है उसकी मुक्ति नहीं हो सकती और जो मुक्त हो गया है उसका देहादिमें अभिमान नहीं हो सकता। जैसे सोये हुए पुरुषको जागृतिका अनुभव नहीं हो सकता और जाग्रत् पुरुषको स्वप्नका अनुभव नहीं हो सकता, क्योंकि ये दोनों अवस्थाएँ भिन्न गुणोंके आश्रय रहती हैं। आत्मनिष्ठाका विधान अन्तर्बहिः स्वं स्थिरजङ्गमेषु ज्ञानात्मनाधारतया विलोक्य। त्यक्ताखिलोपाधिरखण्डरूपः पूर्णात्मना यः स्थित एष मुक्तः ॥ ३३९ ॥