विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
८२ विवेक-चूडामणि पुरुषको इस संसार-बन्धनकी प्राप्तिके कारणरूप और भी अनेक प्रतिबन्ध हैं; किन्तु उन सबका मूल प्रथम विकार अहंकार ही है, [क्योंकि अन्य समस्त अनात्मभावोंका प्रादुर्भाव इसीसे होता है]। यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहङ्कारेण दुरात्मना। तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा॥ ३००॥ जबतक इस दुरात्मा अहंकारसे आत्माका सम्बन्ध है, तबतक मुक्ति- जैसी विलक्षण बातकी लेशमात्र भी आशा न रखनी चाहिये। अहङ्कारग्रहान्मुक्तः स्वरूपमुपपद्यते। चन्द्रवद्विमलः पूर्णः सदानन्दः स्वयंप्रभः॥ ३०१॥ अहंकाररूपी ग्रह (राहु)-से मुक्त हो जानेपर चन्द्रमाके समान आत्मा निर्मल, पूर्ण एवं नित्यानन्दस्वरूप स्वयंप्रकाश होकर अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। यो वा पुरे सोऽहमिति प्रतीतो बुद्ध्या विक्लृप्तस्तमसातिमूढया। तस्यैव निःशेषतया विनाशे ब्रह्मात्मभावः प्रतिबन्धशून्यः॥ ३०२॥ अज्ञानसे अत्यन्त मोहित बुद्धिकी कल्पनासे इस शरीरमें ही जो 'यही मैं हूँ'—ऐसी प्रतीति हो रही है, उसका सर्वथा नाश हो जानेपर ब्रह्ममें निर्बाध आत्मभाव हो जाता है। ब्रह्मानन्दनिधिर्महाबलवताहङ्कारघोराहिना संवेष्ट्यात्मनि रक्ष्यते गुणमयैश्चण्डैस्त्रिभिर्मस्तकैः। विज्ञानाख्यमहासिना द्युतिमता विच्छिद्य शीर्षत्रयं निर्मूल्याहिमिमं निधिं सुखकरं धीरोऽनुभोक्तुं क्षमः॥ ३०३॥ ब्रह्मानन्दरूपी परमधनको अहंकाररूप महाभयंकर सर्पने अपने सत्त्व, रज, तमरूप तीन प्रचण्ड मस्तकोंसे लपेटकर छिपा रखा है; जब विवेकी पुरुष अनुभव-ज्ञानरूप चमचमाते हुए महान् खड्गसे इन तीनों मस्तकोंको
अहंकार-निन्दा ८३ काटकर इस सर्पका नाश कर देता है, तभी वह इस परम आनन्ददायिनी सम्पत्तिको भोग सकता है। यावद्वा यत्किञ्चिद्विषदोषस्फूर्तिरस्ति चेद्देहे। कथमारोग्याय भवेत्तद्वदहन्तापि योगिनो मुक्त्यै ॥ ३०४ ॥ जबतक देहमें विषका थोड़ा-सा भी दोष रहता है, तबतक वह उसे नीरोग कैसे रहने देगा ? उसी प्रकार योगीकी मुक्तिके मार्गमें अहंकारका यत्किंचित् लेश भी भारी प्रतिबन्धक होता है। अहमोऽत्यन्तनिवृत्त्या तत्कृतनानाविकल्पसंहृत्या । प्रत्यक्तत्त्वविवेकादयमहमस्मीति विन्दते तत्त्वम् ॥ ३०५ ॥ अहंकारकी निःशेष निवृत्तिसे उससे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके विकल्पोंका नाश हो जानेपर आत्मतत्त्वका विवेक हो जानेसे 'यह आत्मा ही मैं हूँ' ऐसा तत्त्व-बोध प्राप्त होता है। अहंकर्त्र्यस्मिन्नहमिति मतिं मुंच सहसा विकारात्मन्यात्मप्रतिफलजुषि स्वस्थितिमुषि। यदध्यासात्प्राप्ता जनिमृतिजरादुःखबहुला प्रतीचश्चिन्मूर्तेस्तव सुखतनोः संसृतिरियम् ॥ ३०६॥ इस विकारात्मक, आत्मप्रतिविम्बयुक्त और स्वरूपको छिपानेवाले अहंकारमें अहंबुद्धिको शीघ्र ही त्याग दे। इसके अध्याससे ही तुझ 'चैतन्यमूर्ति, आनन्दस्वरूप प्रत्यगात्माको जन्म, मरण, बुढ़ापा आदि नाना प्रकारके दुःखोंसे पूर्ण यह संसार-बन्धन प्राप्त हुआ है। सदैकरूपस्य चिदात्मनो विभो- रानन्दमूर्तेरनवद्यकीर्तेः । नैवान्यथा क्वाप्यविकारिणस्ते विनाहमध्यासममुष्य संसृतिः ॥ ३०७॥
८४ विवेक-चूडामणि इस अहंकाररूप अध्यासके बिना तुझ सर्वदा एकरूप, चिदात्मा, व्यापक, आनन्दस्वरूप, पवित्रकीर्ति और अविकारी आत्माको और किसी प्रकार संसार-बन्धनकी प्राप्ति नहीं हो सकती। तस्मादहङ्कारमिमं स्वशत्रुं भोक्तुर्गले कण्टकवत्प्रतीतम्। विच्छिद्य विज्ञानमहासिना स्फुटं भुङ्क्ष्वात्मसाम्राज्यसुखं यथेष्टम् ॥ ३०८ ॥ इसलिये हे विद्वन् ! भोजन करनेवाले पुरुषके गलेमें काँटेके समान खटकनेवाले इस अहंकाररूप अपने शत्रुको विज्ञानरूप महाखड्गसे भली प्रकार छेदन कर आत्म-साम्राज्य-सुखका यथेष्ट भोग करो। ततोऽहमादेर्विनिवर्त्य वृत्तिं सन्त्यक्तरागः परमार्थलाभात्। तूष्णीं समास्वात्मसुखानुभूत्या पूर्णात्मना ब्रह्मणि निर्विकल्पः ॥ ३०९ ॥ फिर अहंकार आदिकी कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि वृत्तियोंको हटाकर परमार्थ-तत्त्वकी प्राप्तिसे रागरहित होकर आत्मानन्दके अनुभवसे ब्रह्मभावमें पूर्णतया स्थित होकर निर्विकल्प और मौन हो जाओ। समूलकृत्तोऽपि महानहं पुन- र्व्युल्लेखितः स्याद्यदि चेतसा क्षणम्। सञ्जीव्य विक्षेपशतं करोति नभस्वता प्रावृषि वारिदो यथा ॥ ३१० ॥ यह प्रबल अहंकार जड़-मूलसे नष्ट कर दिया जानेपर भी यदि एक क्षणमात्रको चित्तका सम्पर्क प्राप्त कर ले तो पुनः प्रकट होकर सैकड़ों उत्पात खड़े कर देता है; जैसे कि वर्षाकालमें वायुसे संयुक्त हुआ मेघ।
क्रिया, चिन्ता और वासनाका त्याग ८५ क्रिया, चिन्ता और वासनाका त्याग निगृह्य शत्रोरहमोऽवकाशः क्वचिन्न देयो विषयानुचिन्त्या। स एव संजीवनहेतुरस्य प्रक्षीणजम्बीरतरोरिवाम्बु ॥ ३११ ॥ इस अहंकाररूप शत्रु का निग्रह कर लेनेपर फिर विषयचिन्तनके द्वारा इसे सिर उठानेका अवसर कभी न देना चाहिये, क्योंकि नष्ट हुए जम्बीरके वृक्षके लिये जलके समान इसके पुनरुज्जीवन (फिर जी उठने)- का कारण यह विषय-चिन्तन ही है। देहात्मना संस्थित एव कामी विलक्षणः कामयिता कथं स्यात्। अतोऽर्थसन्धानपरत्वमेव भेदप्रसक्त्या भवबन्धहेतुः ॥ ३१२ ॥ जो पुरुष देहात्म-बुद्धिसे स्थित है, वही कामनावाला होता है। जिसका देहसे सम्बन्ध नहीं है, वह विलक्षण आत्मा कैसे सकाम हो सकता है? इसलिये भेदासक्तिका कारण होनेसे विषय-चिन्तनमें लगा रहना ही संसार-बन्धनका मुख्य कारण है। कार्यप्रवर्धनाद्बीजप्रवृद्धिः परिदृश्यते। कार्यनाशाद्बीजनाशस्तस्मात्कार्यं निरोधयेत् ॥ ३१३ ॥ कार्यके बढ़नेसे उसके बीजकी वृद्धि होती भी देखी जाती है और कार्यका नाश हो जानेसे बीज भी नष्ट हो जाता है; इसलिये कार्यका ही नाश कर देना चाहिये। वासनावृद्धितः कार्यं कार्यवृद्ध्या च वासना। वर्धते सर्वथा पुंसः संसारो न निवर्तते ॥ ३१४॥ वासनाके बढ़नेसे कार्य बढ़ता है और कार्यके बढ़नेसे वासना बढ़ती है; इस प्रकार मनुष्यका संसार-बन्धन बिलकुल नहीं छूटता।
८६ विवेक-चूडामणि संसारबन्धविच्छित्त्यै तद्द्वयं प्रदहेद्यतिः । वासनावृद्धिरेताभ्यां चिन्तया क्रियया बहिः ॥ ३१५ ॥ इसलिये संसार-बन्धनको काटनेके लिये मुनि इन दोनोंका नाश करे। विषयोंकी चिन्ता और बाह्य-क्रिया—इनसे ही वासनाकी वृद्धि होती है। ताभ्यां प्रवर्धमाना सा सूते संसृतिमात्मनः । त्रयाणां च क्षयोपायः सर्वावस्थासु सर्वदा ॥ ३१६ ॥ सर्वत्र सर्वतः सर्वं ब्रह्ममात्रावलोकनम्। सद्भाववासनादार्ढ्यात्तत्त्रयं लयमश्नुते ॥ ३१७॥ और इन दोनोंसे ही बढ़कर वह वासना आत्माके लिये संसाररूप बन्धन उत्पन्न करती है। इन तीनोंके क्षयका उपाय सब अवस्थाओंमें सदा सब जगह सब ओर सबको ब्रह्ममात्र देखना ही है। इस ब्रह्ममय वासनाके दृढ़ हो जानेपर इन तीनोंका लय हो जाता है। क्रियानाशे भवेच्चिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः । वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥ ३१८ ॥ क्रियाके नष्ट हो जानेसे चिन्ताका नाश होता है और चिन्ताके नाशसे वासनाओंका क्षय होता है; इस वासनाक्षयका नाम ही मोक्ष है और यही जीवन्मुक्ति कहलाती है। सद्वासनास्फूर्तिविजृम्भणे सति ह्यसौ विलीना त्वहमादिवासना । अतिप्रकृष्टाप्यरुणप्रभायां विलीयते साधु यथा तमिस्रा ॥ ३१९ ॥ सूर्यकी प्रभाके उदय होते ही जैसे अत्यन्त घोर अँधेरी रातका भी सर्वथा नाश हो जाता है उसी प्रकार ब्रह्म-वासनाकी स्फूर्तिका विस्तार होनेपर यह अहंकारादिकी वासनाएँ लीन हो जाती हैं।
प्रमाद-निन्दा ८७ तमस्तमःकार्यमनर्थजालं न दृश्यते सत्युदिते दिनेशे। तथाद्वयानन्दरसानुभूतौ नैवास्ति बन्धो न च दुःखगन्धः ॥ ३२०॥ सूर्यके उदय होनेपर जैसे अन्धकार और उसमें होनेवाले [ चोरी आदि ] अनर्थ-समूह कहीं दिखलायी नहीं देते, वैसे ही इस अद्वितीय आत्मानन्दके रसका अनुभव होनेपर न तो संसार-बन्धन रहता है और न दुःखका ही गन्ध रहता है। प्रमाद-निन्दा दृश्यं प्रतीतं प्रविलापयन्स्वयं सन्मात्रमानन्दघनं विभावयन्। समाहितः सन्बहिरन्तरं वा कालं नयेथाः सति कर्मबन्धे ॥ ३२१॥ यदि तुम्हारा कर्मबन्धन अभी शेष है तो इस प्रतीयमान दृश्यका लय करते हुए तथा बाहर-भीतरसे सावधान रहकर अपने सत्तामात्र आनन्दघन स्वरूपका चिन्तन करते हुए कालक्षेप करो। प्रमादो ब्रह्मनिष्ठायां न कर्तव्यः कदाचन। प्रमादो मृत्युरित्याह भगवान्ब्रह्मणः सुतः ॥ ३२२॥ ब्रह्मविचारमें कभी प्रमाद (असावधानी) न करना चाहिये, क्योंकि ब्रह्माजीके पुत्र (भगवान् सनत्कुमारजी)-ने 'प्रमाद मृत्यु है'-ऐसा कहा है। न प्रमादादनर्थोऽन्यो ज्ञानिनः स्वस्वरूपतः। ततो मोहस्ततोऽहंधीस्ततो बन्धस्ततो व्यथा ॥ ३२३॥ विचारवान् पुरुषके लिये अपने स्वरूपानुसन्धानसे प्रमाद करनेसे बढ़कर और कोई अनर्थ नहीं है, क्योंकि इसीसे मोह होता है और मोहसे अहंकार, अहंकारसे बन्धन तथा बन्धनसे क्लेशकी प्राप्ति होती है।
८८ विवेक-चूड़ामणि विषयाभिमुखं दृष्ट्वा विद्वांसमपि विस्मृतिः। विक्षेपयति धीदोषैर्योषा जारमिव प्रियम्॥ ३२४॥ जिस प्रकार कुलटा स्त्री अपने प्रेमी जार-पुरुषको उसकी बुद्धि बिगाड़कर पागल बना देती है उसी प्रकार विद्वान् पुरुषको भी विषयोंमें प्रवृत्त होता देखकर आत्मविस्मृति बुद्धिदोषोंसे विक्षिप्त कर देती है। यथापकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति। आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम्॥ ३२५॥ जिस प्रकार शैवालको जलपरसे एक बार हटा देनेपर वह क्षणभर भी अलग नहीं रहता, [ तुरन्त ही फिर उसको ढँक लेता है ] उसी प्रकार आत्म-विचार-हीन विद्वान्को भी माया फिर घेर लेती है। लक्ष्यच्युतं सद्यदि चित्तमीषद् बहिर्मुखं सन्निपतेत्ततस्ततः। प्रमादतः प्रच्युतकेलिकन्दुकः सोपानपङ्क्तौ पतितो यथा तथा॥ ३२६॥ जैसे असावधानतावश (हाथसे छूटकर) सीढ़ियोंपर गिरी हुई खेलकी गेंद एक सीढ़ीसे दूसरी सीढ़ीपर गिरती हुई नीचे चली जाती है वैसे ही यदि चित्त अपने लक्ष्य (ब्रह्म)-से हटकर थोड़ा-सा भी बहिर्मुख हो जाता है तो फिर बराबर नीचेहीकी ओर गिरता जाता है। विषयेष्वाविशच्चेतः संकल्पयति तद्गुणान्। सम्यक्संकल्पनात्कामः कामात्पुंसः प्रवर्तनम्॥ ३२७॥ विषयोंमें लगा हुआ चित्त उनके गुणोंका चिन्तन करता है, फिर निरन्तर चिन्तन करनेसे उनकी कामना जागृत होती है और कामनासे पुरुषकी विषयोंमें प्रवृत्ति हो जाती है। ततः स्वरूपविभ्रंशो विभ्रष्टस्तु पतत्यधः। पतितस्य विना नाशं पुनर्नारोह ईक्ष्यते। सङ्कल्पं वर्जयेत्तस्मात्सर्वानर्थस्य कारणम्॥ ३२८॥
प्रमाद-निन्दा ८९ विषयोंकी प्रवृत्तिसे मनुष्य आत्मस्वरूपसे गिर जाता है और जो एक बार स्वरूपसे गिर गया, उसका निरन्तर अधःपतन होता रहता है तथा पतित पुरुषका नाशके सिवा फिर उत्थान तो प्रायः कभी देखा नहीं जाता है। इसलिये सम्पूर्ण अनर्थोंके कारणरूप संकल्पको त्याग देना चाहिये। अतः प्रमादान्न परोऽस्ति मृत्यु- र्विवेकिनो ब्रह्मविदः समाधौ। समाहितः सिद्धिमुपैति सम्यक् समाहितात्मा भव सावधानः ॥ ३२९ ॥ इसलिये विवेकी और ब्रह्मवेत्ता पुरुषके लिये समाधिमें प्रमाद करनेसे बढ़कर और कोई मृत्यु नहीं है। समाहित पुरुष ही पूर्ण आत्म-सिद्धि प्राप्त कर सकता है; इसलिये सावधानतापूर्वक चित्तको समाहित (स्थिर) करो।
असत्-परिहार जीवतो यस्य कैवल्यं विदेहे स च केवलः। यत्किञ्चित्पश्यतो भेदं भयं ब्रूते यजुःश्रुतिः॥ ३३०॥ जिसने जीते हुए ही कैवल्यपद प्राप्त कर लिया है उसीकी देहपातके अनन्तर कैवल्यमुक्ति होती है, क्योंकि जो थोड़ा-सा भी भेद देखता है उसके लिये यजुर्वेदकी श्रुति भय बताती है। यदा कदा वापि विपश्चिदेष ब्रह्मण्यनन्तेऽप्यणुमात्रभेदम् । पश्यत्यथामुष्य भयं तदैव यद्वीक्षितं भिन्नतया प्रमादात् ॥ ३३१ ॥ जब कभी यह विद्वान् अनन्त ब्रह्ममें अणुमात्र भी भेद-दृष्टि करता है तभी इसको भयकी प्राप्ति होती है, क्योंकि स्वरूपके प्रमादसे ही अखण्ड आत्मामें भेदकी प्रतीति हुई है। श्रुतिस्मृतिन्यायशतैर्निषिद्धे दृश्येऽत्र यः स्वात्ममतिं करोति। उपैति दुःखोपरि दुःखजातं निषिद्धकर्ता स मलिम्लुचो यथा॥ ३३२ ॥ श्रुति, स्मृति और सैकड़ों युक्तियोंसे निषिद्ध हुए इस दृश्य (देहादि)- में जो आत्मबुद्धि करता है, वह निषिद्ध कर्म करनेवाले चोरके समान दुःख-पर-दुःख भोगता है। सत्याभिसन्धानरतो विमुक्तो महत्त्वमात्मीयमुपैति नित्यम्। मिथ्याभिसन्धानरतस्तु नश्येद् दृष्टं तदेतद्यदचोरचोरयोः ॥ ३३३ ॥ जो अद्वितीय ब्रह्मरूप सत्य पदार्थकी खोज करता है वही मुक्त होकर अपने
असत्-परिहार ९१ नित्य महत्त्वको प्राप्त करता है और जो मिथ्या दृश्य पदार्थोंके पीछे पड़ा रहता है वह नष्ट हो जाता है; ऐसा ही साधु और चोरके विषयमें * देखा भी गया है। यतिरसदनुसन्धिं बन्धहेतुं विहाय स्वयमयमहमस्मीत्यात्मदृष्ट्यैव तिष्ठेत् । सुखयति ननु निष्ठा ब्रह्मणि स्वानुभूत्या हरति परमविद्याकार्यदुःखं प्रतीतम् ॥ ३३४॥ यतिको चाहिये कि असत्-पदार्थोंका पीछा छोड़कर 'यह साक्षात् ब्रह्म ही मैं हूँ' ऐसी आत्मदृष्टिमें ही स्थिर होकर रहे। अपने अनुभवसे उत्पन्न हुई ब्रह्मनिष्ठा ही अविद्याके कार्यभूत इस प्रतीयमान प्रपंचके दुःखको दूर करके परम सुख देती है। बाह्यानुसन्धिः परिवर्धयेत्फलं दुर्वासनामेव ततस्ततोऽधिकाम् । ज्ञात्वा विवेकैः परिहृत्य बाह्यं स्वात्मानुसन्धिं विदधीत नित्यम् ॥ ३३५ ॥ बाह्य विषयोंका चिन्तन अपने दुर्वासनारूप फलको ही उत्तरोत्तर बढ़ाता है, इसलिये विवेकपूर्वक आत्मस्वरूपको जानकर बाह्य विषयोंको छोड़ता हुआ नित्य आत्मानुसन्धान ही करता रहे। बाह्ये निरुद्धे मनसः प्रसन्नता मनःप्रसादे परमात्मदर्शनम् । तस्मिन्सुदृष्टे भवबन्धनाशो बहिर्निरोधः पदवी विमुक्तेः ॥ ३३६ ॥
- इस प्रसंगका छान्दोग्योपनिषद् (६। १६। १-२)-में इस प्रकार वर्णन किया है कि जिस व्यक्तिपर चोरी करनेका सन्देह होता है उसे राजपुरुष तपाया हुआ परशु देते हैं। यदि उसने चोरी की होती है और वह 'मैंने चोरी नहीं की' ऐसा कहकर मिथ्या भाषण करता है तो उससे दग्ध हो जाता है और तब राजपुरुष भी उसे मार डालते हैं; और यदि वह वास्तवमें चोर नहीं होता तो सत्यसे सुरक्षित रहनेके कारण वह उस परशुसे दग्ध नहीं होता और उसे राजपुरुष भी छोड़ देते हैं।
९२ विवेक-चूडामणि बाह्य पदार्थोंका निषेध कर देनेपर मनमें आनन्द होता है और मनमें आनन्दका उद्रेक होनेपर परमात्माका साक्षात्कार होता है और उसका सम्यक् साक्षात्कार होनेपर संसारबन्धनका नाश हो जाता है। इस प्रकार बाह्य वस्तुओंका निषेध ही मुक्तिका मार्ग है। कः पण्डितः सन्सदसद्विवेकी श्रुतिप्रमाणः परमार्थदर्शी। जानन्हि कुर्यादसतोऽवलम्बं स्वपातहेतोः शिशुवन्मुमुक्षुः ॥ ३३७॥ सत्-असत् वस्तुका विवेकी, श्रुतिप्रमाणका जाननेवाला, परमार्थ-तत्त्वका ज्ञाता ऐसा कौन बुद्धिमान् होगा जो मुक्तिकी इच्छा रखकर भी जान-बूझकर बालकके समान अपने पतनके हेतु असत् पदार्थोंका ग्रहण करेगा। देहादिसंसक्तिमतो न मुक्ति- र्मुक्तस्य देहाद्यभिमत्यभावः। सुप्तस्य नो जागरणं न जाग्रतः स्वप्नस्तयोर्भिन्नगुणाश्रयत्वात् ॥ ३३८ ॥ जिसकी देह आदि अनात्मवस्तुओंमें आसक्ति है उसकी मुक्ति नहीं हो सकती और जो मुक्त हो गया है उसका देहादिमें अभिमान नहीं हो सकता। जैसे सोये हुए पुरुषको जागृतिका अनुभव नहीं हो सकता और जाग्रत् पुरुषको स्वप्नका अनुभव नहीं हो सकता, क्योंकि ये दोनों अवस्थाएँ भिन्न गुणोंके आश्रय रहती हैं। आत्मनिष्ठाका विधान अन्तर्बहिः स्वं स्थिरजङ्गमेषु ज्ञानात्मनाधारतया विलोक्य। त्यक्ताखिलोपाधिरखण्डरूपः पूर्णात्मना यः स्थित एष मुक्तः ॥ ३३९ ॥
आत्मनिष्ठाका विधान ९३ जो समस्त स्थावर-जंगम पदार्थोंके भीतर और बाहर अपनेको ज्ञानस्वरूपसे उनका आधारभूत देखकर समस्त उपाधियोंको छोड़कर अखण्ड-परिपूर्णरूपसे स्थित रहता है, वही मुक्त है। सर्वात्मना बन्धविमुक्तिहेतुः सर्वात्मभावान्न परोऽस्ति कश्चित्। दृश्याग्रहे सत्युपपद्यतेऽसौ सर्वात्मभावोऽस्य सदात्मनिष्ठया॥ ३४०॥ संसार-बन्धनसे सर्वथा मुक्त होनेमें सर्वात्म-भाव (सबको आत्मारूप देखनेके भाव)-से बढ़कर और कोई हेतु नहीं है। निरन्तर आत्मनिष्ठामें स्थित रहनेसे दृश्यका अग्रहण (बाध) होनेपर इस सर्वात्मभावकी प्राप्ति होती है। दृश्यस्याग्रहणं कथं नु घटते देहात्मना तिष्ठतो बाह्यार्थानुभवप्रसक्तमनसस्तत्तत्क्रियां कुर्वतः। संन्यस्ताखिलधर्मकर्मविषयैर्नित्यात्मनिष्ठापरै- स्तत्त्वज्ञैः करणीयमात्मनि सदानन्देच्छुभिर्यत्नतः॥ ३४१॥ जो लोग देहात्म-बुद्धिसे स्थित रहकर बाह्य पदार्थोंकी मनमें आसक्ति रखकर उन्हींके लिये निरन्तर काममें लगे रहते हैं उनको दृश्यकी अप्रतीति कैसे हो सकती है? इसलिये नित्यानन्दके इच्छुक तत्त्वज्ञानीको चाहिये कि वह समस्त धर्म, कर्म एवं विषयोंको त्यागकर निरन्तर आत्मनिष्ठामें तत्पर हो अपने आत्मामें प्रतीत होनेवाले इस दृश्य-प्रपंचका प्रयत्नपूर्वक बाध करे। सार्वात्म्यसिद्धये भिक्षोः कृतश्रवणकर्मणः। समाधिं विदधात्येषा शान्तो दान्त इति श्रुतिः॥ ३४२॥ 'शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः' (बृह० ४।४।२३) यह श्रुति यतिके लिये वेदान्त-श्रवणके अनन्तर सार्वात्म्यभावकी सिद्धिके लिये समाधिका विधान करती है।
९४ विवेक-चूड़ामणि आरूढशक्तेरहमो विनाशः कर्तुं न शक्यः सहसापि पण्डितैः । ये निर्विकल्पाख्यसमाधिनिश्चला- स्तानन्तरानन्तभवा हि वासनाः ॥ ३४३ ॥ अहंकारकी शक्ति जबतक बढ़ी-चढ़ी रहती है तबतक कोई विद्वान् उसका एकाएकी नाश नहीं कर सकता, क्योंकि जो महापुरुष निर्विकल्प- समाधिमें अविचल-भावसे स्थित हो गये हैं उनके अन्दर भी अनन्त जन्मोंकी वासनाएँ देखी जाती हैं। अहंबुद्ध्यैव मोहिन्या योजयित्वावृतेर्बलात् । विक्षेपशक्तिः पुरुषं विक्षेपयति तद्गुणैः ॥ ३४४ ॥ मोहित कर देनेवाली अहंबुद्धिके साथ अपनी आवरणशक्तिके द्वारा पुरुषका संयोग कराकर विक्षेपशक्ति उस (अहंबुद्धि)-के गुणोंसे मनुष्यको विक्षिप्त कर देती है। विक्षेपशक्तिविजयो विषमो विधातुं निःशेषमावरणशक्तिनिवृत्त्यभावे । दृग्दृश्ययोः स्फुटपयोजलवद्विभागे नश्येत्तदावरणमात्मनि च स्वभावात् । निःसंशयेन भवति प्रतिबन्धशून्यो विक्षेपणं न हि तदा यदि चेन्मृषार्थे ॥ ३४५ ॥ सम्यग्विवेकः स्फुटबोधजन्यो विभज्य दृग्दृश्यपदार्थतत्त्वम् । छिनत्ति मायाकृतमोहबन्धं यस्माद्विमुक्तस्य पुनर्न संसृतिः ॥ ३४६ ॥ आवरणशक्तिकी पूर्ण निवृत्तिके बिना विक्षेप-शक्तिपर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। दूध और जलके समान द्रष्टा और दृश्यके अलग-अलग होनेका स्पष्ट ज्ञान हो जानेपर आत्मामें छायी हुई वह
आत्मनिष्ठाका विधान ९५ आवरण-शक्ति अपने-आप ही नष्ट हो जाती है। यदि मिथ्या दीखनेवाले [ इन बुद्धि आदि] पदार्थोंमें द्रष्टा और दृश्य पदार्थोंके स्वरूपको पृथक्- पृथक् करके, स्पष्ट बोधके कारण होनेवाला निःसन्देहपूर्वक बाधरहित पूर्ण विवेक हो जाय तो फिर विक्षेप नहीं होता और वह विवेक मायाजनित मोहबन्धनको भी काट डालता है; जिससे मुक्त हुए पुरुषको फिर [ जन्म- मरणरूप ] संसारकी प्राप्ति नहीं होती। परावरैकत्वविवेकवह्नि- र्दहत्यविद्यागहनं ह्यशेषम्। किं स्यात्पुनः संसरणस्य बीज- मद्वैतभावं समुपेयुषोऽस्य ॥ ३४७ ॥ ब्रह्म और आत्माका एकत्वज्ञानरूप अग्नि अविद्यारूप समस्त वनको भस्म कर देता है। [ अविद्याके सर्वथा नष्ट हो जानेपर ] जब जीवको अद्वैत-भावकी प्राप्ति हो जाती है तब उसको पुनः संसार- प्राप्तिका कारण ही क्या रह जाता है ? आवरणस्य निवृत्ति- र्भवति च सम्यक्पदार्थदर्शनतः। मिथ्याज्ञानविनाश- स्तद्द्विक्षेपजनितदुःखनिवृत्तिः ॥ ३४८ ॥ आत्मवस्तुका ठीक-ठीक साक्षात्कार हो जानेसे आवरणका नाश हो जाता है तथा मिथ्याज्ञानका नाश और विक्षेप-जनित दुःखकी निवृत्ति हो जाती है।
अधिष्ठान-निरूपण एतत्त्रितयं दृष्टं सम्यग्रज्जुस्वरूपविज्ञानात् । तस्माद्वस्तु सतत्त्वं ज्ञातव्यं बन्धमुक्तये विदुषा ॥ ३४९ ॥ [रज्जुमें भ्रमके कारण सर्पकी प्रतीति होती है और उस मिथ्या प्रतीतिसे ही भय, कम्प आदि दुःखोंकी प्राप्ति होती है किन्तु दीपक आदिके द्वारा जिस प्रकार] रज्जुके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान होते ही [ रज्जुका अज्ञान (आवरण), अज्ञान-जन्य सर्प (मल) और सर्प-प्रतीतिसे होनेवाले भय, कम्प आदि (विक्षेप)] ये तीनों एक साथ निवृत्त होते देखे जाते हैं, [ उसी प्रकार आत्मस्वरूपका ज्ञान होनेपर आत्माका अज्ञान, अज्ञान-जन्य प्रपंचकी प्रतीति और उससे होनेवाले दुःखकी एक साथ ही निवृत्ति हो जाती है ] । इसलिये संसार-बन्धनसे छूटनेके लिये विद्वान्को तत्त्वसहित आत्मपदार्थका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। अयोऽग्नियोगादिव सत्समन्वयान् मात्रादिरूपेण विजृम्भते धीः। तत्कार्यमेतद्द्वितयं यतो मृषा दृष्टं भ्रमस्वप्नमनोरथेषु ॥ ३५० ॥ अग्निके संयोगसे जैसे लोहा [कुदाल आदि नाना प्रकारके रूपोंको धारण करता है] उसी प्रकार आत्माके संयोगसे बुद्धि [शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध आदि] नाना प्रकारके विषयोंमें प्रकाशित होती है। यह द्वैत- प्रपंच उस बुद्धिका ही कार्य है, इसलिये मिथ्या है; क्योंकि भ्रम, स्वप्न और मनोरथके समय इसकी प्रतीतिका मिथ्यात्व स्पष्ट देखा है। ततो विकाराः प्रकृतेरहंमुखा देहावसाना विषयाश्च सर्वे। क्षणेऽन्यथाभावितया ह्यमीषा- मसत्त्वमात्मा तु कदापि नान्यथा ॥ ३५१ ॥
समाधि-निरूपण ९७ इसलिये अहंकारसे लेकर देहतक प्रकृतिके जितने विकार अथवा विषय हैं वे सभी क्षण-क्षणमें बदलनेवाले होनेसे असत्य हैं, आत्मा तो कभी नहीं बदलता, वह तो सदा ही एकरस रहता है। नित्याद्वयाखण्डचिदेकरूपो बुद्ध्यादिसाक्षी सदसद्विलक्षणः। अहंपदप्रत्ययलक्षितार्थः प्रत्यक्सदानन्दघनः परात्मा॥ ३५२॥ जो 'अहम्' पदकी प्रतीतिसे लक्षित होता है वह नित्य आनन्दघन परमात्मा तो सदा ही अद्वितीय, अखण्ड, चैतन्यस्वरूप, बुद्धि आदिका साक्षी, सत्-असत्से भिन्न और प्रत्यक् (अन्तरतम) है। इत्थं विपश्चित्सदसद्विभज्य निश्चित्य तत्त्वं निजबोधदृष्ट्या। ज्ञात्वा स्वमात्मानमखण्डबोधं तेभ्यो विमुक्तः स्वयमेव शाम्यति॥ ३५३॥ विद्वान् पुरुष इस प्रकार सत् और असत्का विभाग करके अपनी ज्ञान-दृष्टिसे तत्त्वका निश्चय करके और अखण्ड-बोधस्वरूप आत्माको जानकर असत्पदार्थोंसे मुक्त होकर स्वयं ही शान्त हो जाता है। समाधि-निरूपण अज्ञानहृदयग्रन्थेर्निःशेषविलयस्तदा । समाधिनाविकल्पेन यदाद्वैतात्मदर्शनम्॥ ३५४॥ अज्ञानरूप हृदयकी ग्रन्थिका सर्वथा नाश तो तभी होता है जब निर्विकल्प समाधिद्वारा अद्वैत आत्मस्वरूपका साक्षात्कार कर लिया जाता है। त्वमहमिदमितीयं कल्पना बुद्धिदोषात् प्रभवति परमात्मन्यद्वये निर्विशेषे। प्रविलसति समाधावस्य सर्वो विकल्पो विलयनमुपगच्छेद्वस्तुतत्त्वावधृत्या ॥ ३५५॥ 133 विवेक-चूडामणि—4 A
९८ विवेक-चूडामणि अद्वितीय और निर्विशेष परमात्मामें बुद्धिके दोषसे 'तू, मैं, यह'—ऐसी कल्पना होती है और वही सम्पूर्ण विकल्प समाधिमें विघ्नरूपसे स्फुरित होता है; किन्तु तत्त्व-वस्तुका यथावत् ग्रहण होनेसे वह सब लीन हो जाता है। शान्तो दान्तः परमुपरतः क्षान्तियुक्तः समाधिं कुर्वन्नित्यं कलयति यतिः स्वस्य सर्वात्मभावम्। तेनाविद्यातिमिरजनितान्साधु दग्ध्वा विकल्पान् ब्रह्माकृत्या निवसति सुखं निष्क्रियो निर्विकल्पः॥ ३५६॥ योगी पुरुष चित्तकी शान्ति, इन्द्रियनिग्रह, विषयोंसे उपरति और क्षमासे युक्त होकर समाधिका निरन्तर अभ्यास करता हुआ अपने सर्वात्म- भावका अनुभव करता है और उसके द्वारा अविद्यारूप अन्धकारसे उत्पन्न हुए समस्त विकल्पोंका भलीभाँति ध्वंस करके निष्क्रिय और निर्विकल्प होकर आनन्दपूर्वक ब्रह्माकार वृत्तिसे रहता है। समाहिता ये प्रविलाप्य बाह्यं श्रोत्रादि चेतः स्वमहं चिदात्मनि। त एव मुक्ता भवपाशबन्धै- र्नान्ये तु पारोक्ष्यकथाभिधायिनः॥ ३५७॥ जो लोग श्रोत्रादि इन्द्रियवर्ग तथा चित्त और अहंकार इन बाह्य वस्तुओंको आत्मामें लीन करके समाधिमें स्थित होते हैं वे ही संसार-बन्धनसे मुक्त हैं, जो केवल परोक्ष ब्रह्मज्ञानकी बातें बनाते रहते हैं वे कभी मुक्त नहीं हो सकते। उपाधिभेदात्स्वयमेव भिद्यते चोपाध्यपोहे स्वयमेव केवलः। तस्मादुपाधेर्विलयाय विद्वान् वसेत्सदाकल्पसमाधिनिष्ठया ॥ ३५८ ॥ उपाधिके भेदसे ही आत्मामें भेदकी प्रतीति होती है और उपाधिका लय हो जानेपर वह केवल स्वयं ही रह जाता है, इसलिये उपाधिका लय करनेके लिये विचारवान् पुरुष सदा निर्विकल्प-समाधिमें स्थित होकर रहे। 133 विवेक-चूडामणि—4 B
समाधि-निरूपण ९९ सति सक्तो नरो याति सद्भावं ह्येकनिष्ठया। कीटको भ्रमरं ध्यायन्भ्रमरत्वाय कल्पते ॥ ३५९ ॥ एकाग्रचित्तसे निरन्तर सत्स्वरूप ब्रह्ममें स्थित रहनेसे मनुष्य ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है, जैसे भ्रमरका भयपूर्वक ध्यान करते-करते कीड़ा भ्रमरस्वरूप ही हो जाता है। क्रियान्तरासक्तिमपास्य कीटको ध्यायन्यथालिं ह्यलिभावमृच्छति। तथैव योगी परमात्मतत्त्वं ध्यात्वा समायाति तदेकनिष्ठया ॥ ३६० ॥ जिस प्रकार अन्य समस्त क्रियाओंकी आसक्तिको छोड़कर केवल भ्रमरका ही ध्यान करते-करते कीड़ा भ्रमररूप हो जाता है, उसी प्रकार योगी एकनिष्ठ होकर परमात्मतत्त्वका चिन्तन करते-करते परमात्मभावको ही प्राप्त हो जाता है। अतीव सूक्ष्मं परमात्मतत्त्वं न स्थूलदृष्ट्या प्रतिपत्तुमर्हति। समाधिनात्यन्तसुसूक्ष्मवृत्त्या ज्ञातव्यमार्यैरतिशुद्धबुद्धिभिः ॥ ३६१ ॥ परमात्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है, उसे स्थूल दृष्टिसे कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता, इसलिये अति शुद्ध बुद्धिवाले सत्पुरुषोंको उसे समाधिद्वारा अति सूक्ष्मवृत्तिसे जानना चाहिये। यथा सुवर्णं पुटपाकशोधितं त्यक्त्वा मलं स्वात्मगुणं समृच्छति। तथा मनः सत्त्वरजस्तमोमलं ध्यानेन सन्त्यज्य समेति तत्त्वम् ॥ ३६२॥ जिस प्रकार [ अग्निमें ] पुटपाक-विधिसे शोधा हुआ सोना सम्पूर्ण मलको त्यागकर अपने स्वाभाविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है, उसी 133 विवेक-चूडामणि—4 C
१०० विवेक-चूडामणि प्रकार मन ध्यानके द्वारा सत्त्व-रज-तमरूप मलको त्यागकर आत्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। निरन्तराभ्यासवशात्तदित्थं पक्वं मनो ब्रह्मणि लीयते यदा। तदा समाधिः स विकल्पवर्जितः स्वतोऽद्वयानन्दरसानुभावकः ॥ ३६३ ॥ जिस समय रात-दिनके निरन्तर अभ्याससे परिपक्व होकर मन ब्रह्ममें लीन हो जाता है, उस समय अद्वितीय ब्रह्मानन्दरसका अनुभव करानेवाली वह निर्विकल्प-समाधि स्वयं ही सिद्ध हो जाती है। समाधिनानेन समस्तवासना- ग्रन्थेर्विनाशोऽखिलकर्मनाशः । अन्तर्बहिः सर्वत एव सर्वदा स्वरूपविस्फूर्तिरयत्नतः स्यात् ॥ ३६४ ॥ इस निर्विकल्प-समाधिसे समस्त वासना-ग्रन्थियोंका नाश हो जाता है तथा वासनाओंके नाशसे सम्पूर्ण कर्मोंका भी नाश हो जाता है और फिर बाहर- भीतर सर्वत्र बिना प्रयत्नके ही निरन्तर स्वरूपकी स्फूर्ति होने लगती है। श्रुतेः शतगुणं विद्यान्मननं मननादपि। निदिध्यासं लक्षगुणमनन्तं निर्विकल्पकम् ॥ ३६५ ॥ वेदान्तके श्रवणमात्रसे उसका मनन करना सौगुना अच्छा है और मननसे भी लाखगुना श्रेयस्कर निदिध्यासन (आत्मभावनाको अपने चित्तमें स्थिर करना) है तथा निदिध्यासनसे भी अनन्तगुना निर्विकल्प-समाधिका महत्त्व है [जिससे चित्त फिर आत्मस्वरूपसे कभी चलायमान ही नहीं होता]। निर्विकल्पकसमाधिना स्फुटं ब्रह्मतत्त्वमवगम्यते ध्रुवम्। नान्यथा चलतया मनोगतेः प्रत्ययान्तरविमिश्रितं भवेत् ॥ ३६६ ॥ 133 विवेक-चूडामणि—4 D
समाधि-निरूपण १०१ निर्विकल्प-समाधिके द्वारा निश्चय ही ब्रह्मतत्त्वका स्पष्ट ज्ञान होता है, और किसी प्रकार वैसा बोध नहीं हो सकता; क्योंकि अन्य अवस्थाओंमें चित्तवृत्तिके चंचल रहनेसे उसमें अन्यान्य प्रतीतियोंका भी मेल रहता है। अतः समाधत्स्व यतेन्द्रियः सदा निरन्तरं शान्तमनाः प्रतीचि। विध्वंसय ध्वान्तमनाद्यविद्यया कृतं सदेकत्वविलोकनेन॥ ३६७॥ इसलिये सदा संयतेन्द्रिय होकर शान्त मनसे निरन्तर प्रत्यगात्मा ब्रह्ममें चित्त स्थिर करो और सच्चिदानन्द ब्रह्मके साथ अपना ऐक्य देखते हुए अनादि अविद्यासे उत्पन्न अज्ञानान्धकारका ध्वंस करो। योगस्य प्रथमं द्वारं वाङ्निरोधोऽपरिग्रहः। निराशा च निरीहा च नित्यमेकान्तशीलता॥ ३६८॥ वाणीको रोकना, द्रव्यका संग्रह न करना, लौकिक पदार्थोंकी आशा छोड़ना, कामनाओंका त्याग करना और नित्य एकान्तमें रहना—ये सब योगका पहला द्वार हैं। एकान्तस्थितिरिन्द्रियोपरमणे हेतुर्दमश्चेतसः संरोधे करणं शमेन विलयं यायादहंवासना। तेनानन्दरसानुभूतिरचला ब्राह्मी सदा योगिन- स्तस्माच्चित्तनिरोध एव सततं कार्यः प्रयत्नान्मुनेः॥ ३६९॥ एकान्तमें रहना इन्द्रिय-दमनका कारण है, इन्द्रिय-दमन चित्तके निरोधका कारण है और चित्त-निरोधसे वासनाका नाश होता है तथा वासनाके नष्ट हो जानेसे योगीको ब्रह्मानन्दरसका अविचल अनुभव होता है; इसलिये मुनिको सदा प्रयत्नपूर्वक चित्तका निरोध ही करना चाहिये। वाचं नियच्छात्मनि तं नियच्छ बुद्धौ धियं यच्छ च बुद्धिसाक्षिणि। तं चापि पूर्णात्मनि निर्विकल्पे विलाप्य शान्तिं परमां भजस्व॥ ३७०॥