विवेकचूड़ामणि (हिन्दी अनुवाद सहित)
Viveka Chudamani with Hindi Translation - Gita Press
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1940 (उद्गम)
१५० विवेक-चूडामणि ग्रन्थ-प्रशंसा संसाराध्वनि तापभानुकिरणप्रोद्भूतदाहव्यथा- खिन्नानां जलकाङ्क्षया मरुभुवि श्रान्त्या परिभ्राम्यताम्। अत्यासन्नसुधाम्बुधिं सुखकरं ब्रह्माद्वयं दर्शय- न्त्येषा शंकरभारती विजयते निर्वाणसन्धायिनी ॥ ५८१ ॥ संसार-मार्गमें नाना प्रकारके क्लेशरूपी सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न हुए दाहकी व्यथासे पीड़ित होकर मरुस्थलमें जलकी इच्छासे भटकते हुए थके-माँदे पुरुषोंको अति निकटमें ही अद्वितीय ब्रह्मरूप अत्यन्त आनन्ददायक अमृतका समुद्र दिखानेवाली यह श्रीशंकराचार्यजीकी निर्वाणदायिनी वाणी निरन्तर जयको प्राप्त हो रही है। इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यश्रीमच्छंकर- भगवत्कृतो विवेकचूडामणिः समाप्तः
भगवान् शंकराचार्य और विवेक-चूडामणि
संसारके दार्शनिकोंमें भगवान् शंकराचार्यका नाम सर्वाग्रणी है। अबतक उनके जीवनचरित-सम्बन्धी छोटी-बड़ी हजारों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कई तो दिग्विजय-सम्बन्धी हैं। उदयवीर शास्त्रीके वेदान्तदर्शनका इतिहासका प्रथम भाग जो बृहत् कलेवरका है, केवल आचार्यके काल- निर्णयमें ही पर्यवसित हो गया है। दूसरा आधुनिक ग्रन्थ कामकोटिमठद्वारा प्रकाशित अंग्रेजीमें Shankracharya an Appriser (शंकराचार्यकी जीवनियोंका पुनर्मूल्यांकन) बंबईसे छपा है, जिसमें अनेक रंगीन चित्र हैं और मूल्य एक हजार रुपया है। आचार्यका संक्षिप्त जीवन-वृत्त इस प्रकार है— भगवान् शंकरके दिग्विजय तथा गुरवंशकाव्यम् एवं गुरुपरम्परा चरित्रम् आदि जो ग्रन्थ मिलते हैं तथा अन्यत्र उनकी जीवनचरित-सम्बन्धी जो सामग्रियाँ प्राप्त होती हैं, उनसे ज्ञात होता है कि वे सर्वथा अलौकिक दिव्य-प्रतिभासम्पन्न व्यक्ति थे। उनके अंदर प्रकाण्ड पाण्डित्य, गम्भीर विचारशैली, प्रचण्ड कर्मशीलता, अगाध भगवद्भक्ति, उत्कृष्ट वैराग्य, अद्भुत योगैश्वर्य आदि अनेक गुणोंका दुर्लभ सामंजस्य उपलब्ध होता है। उनकी वाणीपर तो मानो साक्षात् सरस्वती ही विराजती थीं। यही कारण है कि अपने ३२ वर्षकी अल्प आयुमें ही उन्होंने अनेक बड़े-बड़े ग्रन्थ रच डाले। सारे भारतमें भ्रमण करके विरोधियोंको शास्त्रार्थमें परास्त किया, भारतके चारों कोनोंमें चार प्रधान मठ स्थापित किये और समग्र देशमें सनातन वैदिकधर्मकी ध्वजा फहरा दी। थोड़ेमें यह कहा जा सकता है कि शंकराचार्यने अवतरित होकर डूबते हुए सनातनधर्मकी रक्षा की और उसीके फलस्वरूप आज हम सनातनधर्मको जीता-जागता देखते हैं। उनके इस धर्मसंस्थापनके कार्यको देखकर यह विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है कि वे साक्षात् कैलासपति भगवान् शंकरके ही अवतार थे—'शङ्करः शङ्करः साक्षात्'— और इसीसे सब लोग 'भगवान्' शब्दके साथ उनका स्मरण करते हैं। आचार्य शंकरका प्राकट्य केरल-प्रदेशके पूर्णानदीके तटवर्ती कलादी नामक गाँवमें वैशाख शुक्ल ५ को हुआ था। उनके पिताका नाम शिवगुरु तथा माताका सुभद्रा था। शिवगुरु बड़े विद्वान् और धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे।
१५२ विवेक-चूडामणि सुभद्रा भी पतिके अनुरूप ही विदुषी और धर्मपरायणा पत्नी थीं। परंतु प्रायः प्रौढावस्था समाप्त होनेपर भी जब उन्हें कोई संतान न हुई तब पति-पत्नीने बड़ी श्रद्धा-भक्तिके साथ भगवान् शंकरकी पुत्र-प्राप्तिके लिये कठिन तपःपूर्ण उपासना की। भगवान् आशुतोष ब्राह्मणदम्पतिकी उपासनासे प्रसन्न हुए और प्रकट होकर उन्होंने उन्हें मनोवांछित वरदान दिया। भगवान् शंकरके आशीर्वादसे शुभ मुहूर्तमें माँ सुभद्राके गर्भसे एक दिव्य कान्तिमान् पुत्ररत्न उत्पन्न हुआ और उसका नाम आशुतोष शंकरके नामपर ही शंकर रख दिया गया। बालक शंकरके रूपमें कोई महान् विभूति अवतरित हुई है, इसका प्रमाण शंकरके बचपनसे ही मिलने लगा। एक वर्षकी अवस्था होते-होते बालक शंकर अपनी मातृभाषामें अपने भाव प्रकट करने लगे और दो वर्षकी अवस्थामें मातासे पुराणादिकी कथाएँ सुनकर कण्ठस्थ करने लगे। उनके पिता तीन वर्षकी अवस्थामें उनका चूडाकर्म करके दिवंगत हो गये। पाँचवें वर्षमें यज्ञोपवीत कर उन्हें गुरुके घर पढ़नेके लिये भेजा गया और केवल ८ वर्षकी अवस्थामें ही वे वेद-वेदान्त और वेदांगोंका पूर्ण अध्ययन करके घर वापस आ गये। उनकी असाधारण प्रतिभा देखकर उनके गुरुजन दंग रह गये। विद्याध्ययन समाप्तकर शंकरने संन्यास लेना चाहा, परंतु जब उन्होंने मातासे आज्ञा माँगी तो उन्होंने नाहीं कर दी। शंकर माताके बड़े भक्त थे, माताको कष्ट देकर संन्यास लेना नहीं चाहते थे। एक दिन माताके साथ वे नदीमें स्नान करने गये। वहाँ शंकरको मगरने पकड़ लिया। इस प्रकार पुत्रको संकटमें देख माताके होश उड़ गये। वह बेचैन होकर हाहाकार मचाने लगी। शंकरने मातासे कहा—'मुझे संन्यास लेनेकी आज्ञा दे दो तो मगर मुझे छोड़ देगा। माताने तुरन्त आज्ञा दे दी और मगरने शंकरको छोड़ दिया। इस तरह माताकी आज्ञा प्राप्तकर वे घरसे निकल पड़े। जाते समय माताके इच्छानुसार यह वचन देते गये कि तुम्हारी मृत्युके समय मैं घरपर उपस्थित रहूँगा। घरसे चलकर शंकर नर्मदातटपर आये और वहाँ स्वामी गोविन्द भगवत्पादसे दीक्षा ली। गुरुने उनका नाम 'भगवत्पूज्यपादाचार्य' रखा। उन्होंने गुरूपदिष्ट मार्गसे साधना प्रारम्भ कर दी और अल्पकालमें ही बहुत बड़े योगसिद्ध महात्मा हो गये। उनकी सिद्धिसे प्रसन्न होकर गुरुने काशी जाकर वेदान्त-
भगवान् शंकराचार्य और विवेक-चूडामणि १५३ सूत्रका भाष्य लिखनेकी आज्ञा दी और वे काशी आ गये। काशी आनेपर उनकी ख्याति बढ़ने लगी और लोग आकृष्ट होकर उनका शिष्यत्व भी ग्रहण करने लगे। उनके सर्वप्रथम शिष्य सनन्दन हुए जो पीछे 'पद्मपादाचार्य' के नामसे प्रसिद्ध हुए। काशीमें शिष्योंको पढ़ानेके साथ-साथ वे ग्रन्थ भी लिखते जाते थे। कहते हैं, एक दिन भगवान् विश्वनाथने उन्हें दर्शन दिया और ब्रह्मसूत्रपर भाष्य लिखने और धर्मका प्रचार करनेका आदेश दिया। वेदान्तसूत्रपर जब वे भाष्य लिख चुके तो एक दिन एक ब्राह्मणने गंगातटपर उनसे एक सूत्रका अर्थ पूछा। उस सूत्रपर ब्राह्मणके साथ उनका सत्ताईस दिनोंतक शास्त्रार्थ चलता रहा। पीछे उन्हें मालूम हुआ कि स्वयं भगवान् वेदव्यास ब्राह्मणके वेशमें प्रकट होकर उनके साथ विवाद कर रहे हैं। तब उन्होंने उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम किया और क्षमा माँगी। फिर वेदव्यासने उन्हें अद्वैतवादका प्रचार करनेकी आज्ञा दी और उनकी १६ वर्षकी अल्पायुको ३२ वर्ष बढ़ा दिया। इस घटनाके बाद शंकराचार्य दिग्विजयके लिये निकल पड़े। काशीमें रहते समय शंकराचार्यने वहाँ रहनेवाले प्रायः सभी विरुद्ध मतवालोंको परास्त कर दिया। वहाँसे कुरुक्षेत्र होते हुए वे बदरिकाश्रम गये। वहाँ कुछ दिन रहकर उन्होंने कुछ और ग्रन्थ लिखे। जो ग्रन्थ उनके मिलते हैं, प्रायः सबको उन्होंने काशी अथवा बदरिकाश्रममें ही लिखा। १२ वर्षसे १६ वर्षतककी अवस्थामें उन्होंने सारे ग्रन्थ लिख डाले। बदरिकाश्रमसे चलकर शंकर प्रयाग आये और यहाँ कुमारिलभट्टसे उनकी भेंट हुई। कुमारिलभट्टके कथनानुसार वे प्रयागसे माहिष्मती (महेश्वर) नगरीमें मण्डनमिश्रके पास शास्त्रार्थके लिये आये। यहाँ मण्डनमिश्रके घरका दरवाजा बंद होनेके कारण योगबलसे वे आँगनमें चले गये, जहाँ मण्डनमिश्र श्राद्ध कर रहे थे और शास्त्रार्थ करनेके लिये कहा। उस शास्त्रार्थमें मध्यस्थ बनायी गयीं मण्डनमिश्रकी विदुषी पत्नी भारती। अन्तमें मण्डनमिश्रकी पराजय हुई और उन्होंने शंकराचार्यका शिष्यत्व ग्रहण किया और ये ही आगे चलकर सुरेश्वराचार्यके नामसे प्रसिद्ध हुए। कहते हैं, भारतीने पतिके हार जानेपर स्वयं शंकराचार्यसे शास्त्रार्थ किया और कामशास्त्र-सम्बन्धी प्रश्न पूछे, जिसके लिये शंकराचार्यको योगबलसे मृत राजा अमरुकके शरीरमें प्रवेश कर कामशास्त्रकी शिक्षा ग्रहण करनी
१५४ विवेक-चूड़ामणि पड़ी। पतिके संन्यासी हो जानेपर भारती ब्रह्मलोकको जानेको उद्यत हुई, परंतु शंकराचार्य उन्हें समझा-बुझाकर शृंगगिरि लिवा लाये और वहाँ रहकर अध्यापनका कार्य करनेकी प्रार्थना की। कहते हैं, भारतीद्वारा शिक्षा प्राप्त करनेके कारण ही शृंगेरी और द्वारकाके शारदा मठोंका शिष्य-सम्प्रदाय 'भारती' के नामसे प्रसिद्ध हुआ। मध्यभारतपर विजय प्राप्तकर शंकराचार्य दक्षिणकी ओर चले और महाराष्ट्रमें शैवों और कापालिकोंको परास्त किया। एक धूर्त कापालिक तो उन्हींकी बलि चढ़ानेके लिये छलसे उनका शिष्य हो गया। परंतु जब वह बलि चढ़ानेके लिये तैयार हुआ तो पद्मपादाचार्यने उसे मार डाला। उस समय भी शंकराचार्यकी साधनाका अपूर्व प्रभाव देखा गया। कापालिककी तलवारकी धारके नीचे भी वे समाधिस्थ और शान्त बैठे रहे। वहाँसे चलकर दक्षिणमें तुंगभद्राके तटपर उन्होंने एक मन्दिर बनवाकर उसमें शारदादेवीकी स्थापना की, यहाँ जो मठ स्थापित हुआ उसे शृंगेरीमठ कहते हैं। सुरेश्वराचार्य इसी मठमें आचार्यपदपर नियुक्त हुए। इन्हीं दिनों शंकराचार्य अपनी वृद्धा माताकी मृत्यु समीप जानकर घर वापस आये और माताकी अन्त्येष्टि- क्रिया की। कहते हैं माताकी इच्छाके अनुसार इन्होंने प्रार्थना करके उन्हें विष्णुलोकमें भिजवाया। वहाँसे ये शृंगेरीमठ आये और वहाँसे पुरी आकर इन्होंने गोवर्धनमठकी स्थापना की और पद्मपादाचार्यको उसका अधिपति नियुक्त किया। इन्होंने चोल और पाण्ड्य देशके राजाओंकी सहायतासे दक्षिणके शाक्त, गाणपत्य और कापालिक-सम्प्रदायके अनाचारको दूर किया। इस प्रकार दक्षिणमें सर्वत्र धर्मकी पताका फहराकर और वेदान्तकी महिमा घोषित कर ये पुनः उत्तर भारतकी ओर मुड़े। रास्तेमें कुछ दिन बरारमें ठहरकर ये उज्जैन आये और वहाँ इन्होंने भैरवोंकी भीषण साधनाको बंद किया। वहाँसे ये गुजरात आये और द्वारकामें एक मठ स्थापितकर अपने शिष्य हस्तामलकाचार्यको आचार्य पदपर नियुक्त किया। फिर गांगेय प्रदेशके पण्डितोंको पराजित करते हुए कश्मीरके शारदाक्षेत्र पहुँचे तथा वहाँके पण्डितोंको परास्तकर अपना मत प्रतिष्ठित किया। फिर यहाँसे आचार्य आसामके कामरूप आये और वहाँके शैवोंसे शास्त्रार्थ किया। यहाँसे फिर बदरिकाश्रम
भगवान् शंकराचार्य और विवेक-चूडामणि १५५ वापस आये और वहाँ ज्योतिर्मठकी स्थापना कर तोटकाचार्यको मठाधीश बनाया। वहाँसे ये केदारक्षेत्र आये और यहींसे कुछ दिनों बाद सीधे देवलोक चले गये। यों तो शंकराचार्यके लिखे हुए लगभग २७२ ग्रन्थ बताये जाते हैं, परंतु यह कहना कठिन है कि वे सब उन्हींके लिखे हुए हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि इनमेंसे कुछ आचार्योंद्वारा रचित पीछेके होंगे जो पश्चाद्वर्ती शंकराचार्यकी उपाधि धारण करनेवाले हुए और जिन्होंने अपने पूरे नाम नहीं दिये। जो हो, प्रधान-प्रधान ग्रन्थ ये हैं—ब्रह्मसूत्रभाष्य, उपनिषद् (ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, नृसिंहपूर्वतापनीय, श्वेताश्वतर इत्यादि ) भाष्य, गीताभाष्य, विष्णुसहस्रनामभाष्य, सनत्सुजातीयभाष्य, हस्तामलकभाष्य, ललितात्रिशतीभाष्य, विवेकचूडामणि, प्रबोधसुधाकर, उपदेशसाहस्री, अपरोक्षानुभूति, शतश्लोकी, दशश्लोकी, सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह, वाक्सुधा, पंचीकरण, प्रपंचसारतन्त्र, आत्मबोध, मनीषापंचक, आनन्दलहरीस्तोत्र इत्यादि। विवेक-चूडामणिका संक्षिप्त परिचय आचार्यद्वारा रचित यद्यपि छोटे-बड़े सैकड़ों ग्रन्थ हैं, पर विवेक-चूडामणि साधना और संक्षिप्तमें सम्यक् ज्ञानोपलब्धिकी दृष्टिसे सर्वोत्तम है। इसके अनुसार मनुष्य-जन्म पाकर संसारको विलोप करते हुए सर्वत्र शुद्ध भगवद्-दृष्टि प्राप्तकर सर्वथा जीवनन्मुक्त होकर कैवल्य-प्राप्ति ही सर्वोत्तम सिद्धि है। इसी बातको उन्होंने गीताभाष्य, ब्रह्मसूत्रभाष्य आदिमें विस्तारसे प्रतिपादित किया है। पर आचार्य कहते हैं कि यह अवस्था अनन्त जन्मोंके पुण्यके बिना प्राप्त नहीं होती— मुक्तिर्नो शतकोटिजन्मसु कृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते॥ (वि०चू०म० २) यही बात गीतामें भगवान् कृष्ण भी कहते हैं— अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥ (गीता ६। ४५)
१५६ विवेक-चूडामणि साधनाकी दृष्टिसे भगवत्कृपाके द्वारा मोक्षकी इच्छा और तदर्थ प्रयत्न और सत्संगकी प्राप्ति ये तीन दुर्लभ वस्तुएँ हैं। इनसे विवेककी प्राप्ति होकर जीवन्मुक्तिकी उपलब्धि होती है। आचार्यका वचन है— दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्। मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ (वि०चू०म० ३) गोस्वामी तुलसीदासजीकी रचनाओंपर इनका स्पष्ट प्रभाव दीखता है— बिनु सत्संग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥ बिनु सत्संग भगति नहिं होई। ते तब मिलहिं द्रवै जब सोई॥ सत्संगति मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥ बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गावा॥ बड़े भाग पाइअ सत्संगा। बिनहिं प्रयास होइ भव भंगा॥ लगता तो यहाँतक है कि—'वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्' इत्यादिमें निदर्शनालंकारसे गोस्वामीजीने शंकरावतार शंकराचार्यकी ही वन्दना की है और उनके समग्र साहित्यपर आचार्यका महान् प्रभाव है और इन्हीं कारणोंसे भाषा हिन्दी होने, भाव गम्भीर होनेके कारण मानसका विश्वमें सर्वाधिक प्रचार हो गया। विवेक-चूडामणिमें नित्य-समाधिके लिये वैराग्यको ही सर्वोत्कृष्ट साधन माना गया है। आचार्य कहते हैं—'अत्यन्तवैराग्यवतः समाधिः' अर्थात् अत्यन्त विरक्तको तत्काल समाधि सिद्ध होती है। गीतामें भी यही भाव व्यक्त हुआ है। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥ श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥ (गीता २।५२-५३) विवेक-चूडामणिकी सारी उपयोगिताओंको हृदयंगम करनेके लिये ग्रन्थका पर्यावलोकन आवश्यक है। उसे शनैः-शनैः आप रसपूर्वक मनन करते हुए पूरा लाभ उठायें। यही निवेदन है।