बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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उस पर अपना विचार दृढ़ नहीं बना देना चाहिए । क्योंकि केवल एक रेखा ही उससे सम्बन्धित तथ्य को स्पष्ट नहीं कर सकती, अपितु उसकी सहायक रेखाएं भी उस तथ्य को स्पष्ट करने में सहायक होती हैं। जिस प्रकार रेल के एक इंजन में सैकड़ों छोटे-मोटे-कल-पुर्जों होते हैं और उन सभी कल-पुर्जों का अपने-अपने स्थान पर महत्व है। यदि उन पुर्जों में से एक भी पुर्जा रुक जाए तो एक प्रकार से पूरा इंजन ही रुक जाएगा, ठीक यही स्थिति हाथ में रेखाओं की है। यदि इन रेखाओं को देखने के साथ- साथ उनकी सहायक रेखाएं भली प्रकार से न देखें या उन सहायक रेखाओं का महत्व न समझें तो परिणाम में भयंकर गलती होने की संभावना हो जाती है। अतः एक कुशल हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह हथेली पर पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा को अपनी आंख से ओझल न होने दे, अपितु छोटी से छोटी रेखा को उतना ही महत्व दे जितना कि बड़ी और प्रमुख रेखा का महत्व होता है।
ईश्वर ने हाथ में जो रेखाएं अंकित की हैं वे बहुत सोच-समझकर अंकित की हैं। हाथ में पाई जाने वाली प्रत्येक रेखा का अपना महत्व है और किसी भी एक रेखा का सम्बन्ध दूसरी रेखा से होता है। यदि हम एक रेखा को ध्यान में रखकर अपना निर्णय सुना दें तो उसमें गलती होने की संभावना हो जाती है, इसलिए प्रमुख रेखा और उसकी सहायक रेखाओं का भली भांति अध्ययन करना चाहिए और उसके बाद ही उससे सम्बन्धित भविष्य-कथन स्पष्ट करना चाहिए। कई लोगों की यह सहज जिज्ञासा होती है कि दाहिने हाथ को महत्व देना चाहिए अथवा बायें हाथ को ? अलग-अलग लोगों का इस सम्बन्ध में अलग-अलग मत है। कुछ लोग दाहिने हाथ को ही महत्व देते हैं। उनकी दृष्टि में बायें हाथ का कोई महत्व नहीं है, जबकि कुछ लोग बायें हाथ को ही प्रधानता देते हैं। उनका कहना है कि दाहिना हाथ सक्रिय होने के कारण उसमें बहुत जल्दी-जल्दी रेखाएं बदल जाती हैं जबकि बायें हाथ में रेखाएं ज्यादा समय तक टिकी रहती हैं। कुछ लोगों का यह भी मत है कि दोनों ही हाथों का बराबर अध्ययन करना चाहिए, परन्तु मैं ऐसा समझता हूं कि ये सभी मत एक प्रकार से अपूर्ण हैं। इन विद्वानों ने जो मत निर्धारित किये हैं वे केवल सुनी-सुनाई बातों पर अथवा अपने अधकचरे ज्ञान के आधार पर ही स्थिर किये हैं। वास्तव में इस सम्बन्ध में 'हस्तरेखा-संजीवनी' नामक ग्रन्थ में प्रामाणिक विवरण मिलता है।
हस्तरेखा विशेषज्ञ को चाहिए कि वह दाहिने हाथ को ही विशेष रूप से महत्व दे, क्योंकि हम अपने जीवन में अधिकतर कार्य दाहिने हाथ से करते हैं, अतः हमारी सक्रियता दाहिने हाथ से झांकी जा सकती है। यहां यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि जो व्यक्ति बायें हाथ से लिखते हैं या जीवन का अधिकतर कार्य बायें हाथ से करते हैं उनका हाथ देखते समय उनके बायें हाथ को महत्व देना चाहिए । इसी प्रकार जो महिलाएं स्वयं अपने पैरों पर खड़ी हैं या नौकरी कर रही हैं अथवा अपनी बुद्धि से,