बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
पृष्ठ 133, कुल 350 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३२ ) जिन हाथों में यह रेखा कमजोर होती है या नहीं होती है उन व्यक्तियों की उन्नति तो होती है परन्तु उनकी उन्नति में भाइयों, सम्बन्धियों या रिश्तेदारों का किसी प्रकार का कोई सहयोग उसे उसके जीवन में नहीं मिलता । इस प्रकार से वह जो भी प्रगति करता है स्वयं के प्रयत्नों से ही कर पाता है। ऐसे लोगों को न तो समाज से किसी प्रकार का कोई सहयोग मिलता है और न परिवार से ही सहायता मिलती है । जिन लोगों के हाथों में शनि रेखा का अभाव हो तो यह समझ लेना चाहिए कि इसके जीवन में जो भी दिखाई दे रहा है वह सब इसके प्रयत्नों से ही संभव हुआ है । यह रेखा नीचे से ऊपर की ओर बढ़ती है जैसा कि मैंने स्पष्ट किया है कि हथेली में इस रेखा के उद्गम स्थान अलग-अलग होते हैं परन्तु इस रेखा की समाप्ति शनि पर्वत पर ही जाकर होती है। इस रेखा के माध्यम से मानव की इच्छाएं, भावनाएं उसका बौद्धिक एवं मानसिक स्तर तथा उसकी क्षमताओं का अनुमान हो जाता है । भाग्य रेखा के माध्यम से यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्ति जीवन में कितनी प्रगति करेगा। इसके जीवन में आर्थिक दृष्टि से क्या स्थिति होगी ? क्या इसको जीवन, में धन, मान, पद प्रतिष्ठा आदि मिल सकेंगे ? क्या इसका जीवन परेशानियों से भरा हुआ है ? क्या यह व्यक्ति अपने जीवन में इन बाधाओं को पार कर सफलता प्राप्त कर सकता है ? ये सारे तथ्य भाग्य रेखा के माध्यम से ही जाने जा सकते हैं । मध्यमा उंगली के मूल में शनि पर्वत होता है । हथेली के किसी भी स्थान से कोई भी रेखा प्रारम्भ होकर शनि पर्वत को स्पर्श कर लेती है तो वह भाग्य रेखा कहलाने लगती है । हथेली के भिन्न-भिन्न स्थानों से प्रारंभ होने के कारण भाग्य रेखा का महत्त्व भी भिन्न-भिन्न हो जाता । इसलिये भाग्य रेखा का उद्गम तथा उसकी समाप्ति दोनों ही बिन्दुओं का भलीभांति सूक्ष्मता से अध्ययन करना चाहिये । यदि यह रेखा कहीं से भी प्रारम्भ होकर बिना किसी अन्य रेखा का सहारा लिये शनि पर्वत पर पहुंच जाती है तो निःसन्देह ऐसी रेखा प्रबल भाग्य वर्द्धक एवं श्रेष्ठ मानी जाती है परन्तु यदि भाग्य रेखा शनि पर्वत को पार कर मध्यमा उंगली के पौर तक पहुंचने की कोशिश करती है तो ऐसी रेखा दूषित कहलाती है । ऊपर मैने भाग्य रेखा के बारे में कुछ तथ्य स्पष्ट किये हैं । मेरे अनुभव के आधार पर भाग्य रेखा का उद्गम निम्न प्रकार से हो सकते हैं : १. हथेली में भाग्य रेखा मणिबन्ध के ऊपर से निकल कर अन्य रेखाओं का सहारा लेती हुई शनि पर्वत तक पहुंचती है । २. कई बार यह रेखा जीवन रेखा के पास में से निकल कर शनि क्षेत्र पर पहुंच जाती है । ३. भाग्य रेखा शुक्र पर्वत से भी निकल कर शनि पर्वत तक पहुंचती है । ४. कभी-कभी यह रेखा मंगल पर्वत से भी निकलती हुई दिखाई दी है ।