बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५४ ) ३. शनिवलय : जब कोई अंगूठी के समान रेखा शनि के पर्वत को घेरती है और जिसका एक सिरा तर्जनी और मध्यमा के बीच में तथा दूसरा सिरा मध्यमा और अनामिका के बीच में जाता हो तो उसे शनि वलय या शनि मुद्रा कहते हैं। सामाजिक दृष्टि से ऐसा वलय शुभ नहीं कहा जा सकता, क्योकि जिस व्यक्ति के हाथ में ऐसी मुद्रा होती है, वह व्यक्ति बीतरागी सन्यासी या एकान्त प्रिय होता है। ऐसा व्यक्ति इस संसार का मोह तथा सुख को छोड़कर परलोक को सुधारने की कोशिश में रहता है। ऐसे व्यक्ति तंत्र साधना तथा मंत्र साधना के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त करते देखे गये हैं। यदि शनि वलय की कोई रेखा भाग्य रेखा को स्पर्श नहीं करती तो वह व्यक्ति अपने उद्देश्यों में सफलता प्राप्त कर लेता है। परन्तु यदि शनि वलय की कोई रेखा भाग्य रेखा को स्पर्श करती हो तो वह व्यक्ति जीवन में कई बार गृहस्थ बनता है, और कई बार पुनः घर बार छोड़कर सन्यासी बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने किसी भी उद्देश्य में सफलता प्राप्त नहीं करता। ऐसे व्यक्ति के सभी कार्य अधूरे तथा अव्यवस्थित होते हैं। तथा एक प्रकार से इन्द्रियों के दास होते हैं। कई बार ऐसे व्यक्ति अपनी ही कुण्ठाओं के कारण आत्म-हत्या कर डालते हैं। जिनके हाथों में इस प्रकार का वलय होता है वे निराशा प्रधान व्यक्ति होते हैं। उनको जीवन में किसी प्रकार का कोई आनन्द नही मिलता । वे व्यक्ति चिन्तनशील एकान्तप्रिय तथा वीतरागी होते हैं। ४. रविवलय : यदि कोई रेखा मध्यमा और अनामिका के बीच में से निकलकर सूर्य पर्वत को घेरती हुई अनामिका और कनिष्ठिका के बीच में जाकर समाप्त होती हो तो ऐसी रेखा को रविवलय या रवि मुद्रा कहते हैं। जिस व्यक्ति के हाथ में रवि मुद्रा होती है वह जीवन में बहुत ही सामान्य स्तर का व्यक्ति होता है उसे अपने जीवन में बार-बार असफलता का सामना करना पड़ता है। जरूरत से ज्यादा परिश्रम करने पर भी उसे किसी प्रकार का कोई यश नहीं मिलता अपितु यह देखा गया है कि जिनकी भी वह भलाई करता है या जिनको भी वह सहयोग देता है उसी की तरफ से उसको अपयश मिलता है। ऐसा वलय होने पर रवि पर्वत से संबंधित सभी फल विपरीतता में बदल जाते हैं।