बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८६ ) यह स्पष्ट है कि पाश्चात्य हस्तरेखा विशेषज्ञ कीरो या चीरियो भी पंचांगुली देवी की साधना करते थे। कीरो भारत में लगभग ३ वर्ष तक रहा था और उसने यहां के एक योगी से पंचांगुली साधना का अध्ययन किया था और इसी साधना की वजह से वह विश्वविख्यात हो सका था। मेरा स्वयं का यह अनुभव है कि इसकी साधना से व्यक्ति को हस्तरेखाओं का पूर्ण और सहज ज्ञान हो जाता है। पंचांगुली साधना में शुभ मुहूर्त का होना आवश्यक है। मास : यह साधना किसी भी महीने से प्रारंभ की जा सकती है। पर बैसाख, कार्तिक, आश्विन तथा माघ मास विशेष शुभ माने गये हैं। तिथि : यह साधना शुक्ल पक्ष की द्वितीया, पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, दशमी, अथवा पूर्णमासी से प्रारम्भ की जा सकती है। वार : रवि, बुध, गुरु, तथा शुक्रवार इस कार्य को प्रारम्भ करने के लिये श्रेष्ठ माने गये हैं। नक्षत्र : कृतिका, रोहिणी, पुनर्वसु, हस्त, तीनों उत्तरा, अनुराधा, तथा श्रवण नक्षत्र विशेष अनुकूल माने जाते हैं। लग्न : स्थिर लग्न, वृष, सिंह वृश्चिक, कुंभ। स्थान : तीर्थभूमि, गंगा यमुना संगम, नदी का तट, पर्वत गुफाएं तथा स्कंध देव मन्दिर इसके लिये शुभ हैं। पर यदि ये स्थान सुलभ न हों तो घर के एकान्त कमरे का उपयोग किया जा सकता है। पंचांगुली यंत्र : किसी भी तंत्र साधना में आवश्यकता पड़ने पर यंत्र का उपयोग करना आवश्यक होता है। पंचांगुली साधना सिद्ध करने के लिये प्राण प्रतिष्ठा युक्त तंत्र सिद्ध पंचांगुली यंत्र तथा पंचांगुली देवी का चित्र बहुत अधिक आवश्यक है। केन्द्र से सम्पर्क स्थापित करने पर इस प्रकार का यंत्र अथवा चित्र भेजने की व्यवस्था की जा सकती है ।