बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०५ ) अनुभव करता है । जीवन में ये व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से पूर्णतः सुखी व सफल होते हैं । तथा अपने प्रयत्नों से व्यापार को बहुत अधिक फैला देते हैं। ऐसे व्यक्ति तुरन्त निर्णय लेने वाले व सही रूप में समय को पहचानने वाले होते हैं । निश्चय ही इन व्यक्तियों के हाथों में कोई चीज अप्राप्य नहीं रहती । टिप्पणी : इस योग का अध्ययन करते समय यह बात ध्यान रखनी चाहिए कि हाथ में शुक्र, गुरु तथा चन्द्र पर्वत अपने आप में पूर्ण विकसित हों तथा शुक्र रेखा एवं चन्द्र रेखा में किसी प्रकार की कोई न्यूनता न हो ।
लग्नाधि योग : परिभाषा : यदि हथेली में भाग्य रेखा पूर्ण विकसित हो और पूरी हथेली में सभी पर्वत अपने आप में विकसित हों और बुध रेखा पूरी लम्बाई लिए हुए हो तो उस व्यक्ति के हाथ में लग्नाधियोग होता है । फल : जिस व्यक्ति के हाथ में लग्नाधियोग होता है वह पूर्ण विद्वान् और चतुर वक्ता होता है । उसकी विद्वता का लोहा अन्य लोग भी मानते हैं । शारीरिक रूप से व्यक्ति स्वस्थ, सबल, और आकर्षक होता है । हृदय से यह उच्च विचारों वाला होता है । सांसारिक कार्य और प्रपंचों में इसकी रुचि नहीं होती । यह अपने कार्य से प्रसिद्धि प्राप्त करता है । टिप्पणी : हथेली में यह योग तभी माना जायगा जब सभी पर्वत पूर्णतः विकसित हों और अपने-अपने स्थान पर स्थित हों । यदि पर्वत इधर-उधर विशृंखलित हों तो इस योग का लाभ व्यक्ति को नहीं मिल पाता ।
अधि योग : परिभाषा : यदि चन्द्र रेखा विकसित हो और बुध पर्वत तक पहुंची हो साथ ही उसकी एक शाखा शनि पर्वत को स्पर्श करती हो तो उसके हाथ में अधियोग होता है । फल : इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति विनम्र होता है तथा अपने कार्य में चतुर, सावधान तथा समय को पहचान कर कार्य करने वाला होता है । ऐसे व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन आनन्द के साथ व्यतीत होता है । भौतिक दृष्टि से उसे किसी प्रकार की कोई कमी नहीं रहती । परन्तु कई बार ऐसे व्यक्ति शत्रु पर विश्वास करके धोखा भी खा जाते हैं ।