भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

पृष्ठ 208, कुल 350 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 208

( २०७ ) २. यदि भाग्य रेखा मोटी तथा हथेली में धंसी हुई हो और वह मध्यमा उंगली के प्रथम पौर तक पहुंच गई हो । ३. यदि शुक्र पर्वत दबा हुआ हो और उस पर जरूरत से ज्यादा बाधक रेखाएं हों । ४. यदि हथेली में बहुत अधिक रेखाएं ऊपर से नीचे की ओर जा रही हों । ५. यदि मध्यमा उंगली के सबसे नीचे के पौर पर तारे का चिह्न हो तथा भाग्य रेखा कमजोर हो । ६. यदि सूर्य रेखा मुड़कर शुक्र पर्वत की ओर जा रही हो । ७. यदि हथेली मोटी तथा भारी हो, साथ ही उस पर सभी पर्वत कमजोर और दबे हुए हों । ८. चन्द्र पर्वत कमजोर हो तथा उस पर एक से अधिक क्रास हों । ६. यदि हाथ की उंगलियां छोटी हों तथा उंगलियों के सिरे वर्गाकार हों एवं भाग्य रेखा पलट कर हथेली के बाहर जा रही हो । इनमें से कोई भी योग होने पर व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त कमजोर रहता है । दुरधरा योग : यदि हथेली में शुक्र पर्वत, सूर्य पर्वत एवं शनि पर्वत दबे हुए हों तथा सूर्य रेखा टूटी हुई हो तो दुरधरा योग बनता है । फल : जिसके हाथ में दुरधरा योग होता है उस व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्ट के साथ व्यतीत होता है । परन्तु उसका भाग्योदय जीवन के ३६वें साल से प्रारम्भ होता है और इस आयु के बाद वह आश्चर्यजनक रूप से प्रगति करता है । [चित्र: दुरधरा] टिप्पणी : वस्तुतः दुरधरा योग का फल विचित्र है, इस योग के होने से जीवन के पहले ३६ वर्ष अत्यन्त दुखदायी, कष्टप्रद तथा परेशानीपूर्ण होते हैं । परन्तु ३६ वर्ष से आगे की आयु पूर्णतः सुखमय एवं समृद्धिपूर्ण होती है । हकीकत में वह आगे चलकर धन, मान, यश, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ प्राप्त करने में सफल होता है ।