बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०७ ) २. यदि भाग्य रेखा मोटी तथा हथेली में धंसी हुई हो और वह मध्यमा उंगली के प्रथम पौर तक पहुंच गई हो । ३. यदि शुक्र पर्वत दबा हुआ हो और उस पर जरूरत से ज्यादा बाधक रेखाएं हों । ४. यदि हथेली में बहुत अधिक रेखाएं ऊपर से नीचे की ओर जा रही हों । ५. यदि मध्यमा उंगली के सबसे नीचे के पौर पर तारे का चिह्न हो तथा भाग्य रेखा कमजोर हो । ६. यदि सूर्य रेखा मुड़कर शुक्र पर्वत की ओर जा रही हो । ७. यदि हथेली मोटी तथा भारी हो, साथ ही उस पर सभी पर्वत कमजोर और दबे हुए हों । ८. चन्द्र पर्वत कमजोर हो तथा उस पर एक से अधिक क्रास हों । ६. यदि हाथ की उंगलियां छोटी हों तथा उंगलियों के सिरे वर्गाकार हों एवं भाग्य रेखा पलट कर हथेली के बाहर जा रही हो । इनमें से कोई भी योग होने पर व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से अत्यन्त कमजोर रहता है । दुरधरा योग : यदि हथेली में शुक्र पर्वत, सूर्य पर्वत एवं शनि पर्वत दबे हुए हों तथा सूर्य रेखा टूटी हुई हो तो दुरधरा योग बनता है । फल : जिसके हाथ में दुरधरा योग होता है उस व्यक्ति का प्रारम्भिक जीवन अत्यन्त कष्ट के साथ व्यतीत होता है । परन्तु उसका भाग्योदय जीवन के ३६वें साल से प्रारम्भ होता है और इस आयु के बाद वह आश्चर्यजनक रूप से प्रगति करता है । [चित्र: दुरधरा] टिप्पणी : वस्तुतः दुरधरा योग का फल विचित्र है, इस योग के होने से जीवन के पहले ३६ वर्ष अत्यन्त दुखदायी, कष्टप्रद तथा परेशानीपूर्ण होते हैं । परन्तु ३६ वर्ष से आगे की आयु पूर्णतः सुखमय एवं समृद्धिपूर्ण होती है । हकीकत में वह आगे चलकर धन, मान, यश, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ प्राप्त करने में सफल होता है ।