बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१८ ) १७. यात्राकाल में मृत्यु : यदि यात्रा रेखाएं टूटी हुई तथा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हों। १८. कैंसर : यदि दोनों हाथों में मंगल रेखा पर शाखाएं निकली हुई हों या जीवन रेखा के प्रारम्भ में तारे का चिह्न हो। १६. मिरगी : यदि हृदय रेखा पर क्रास हो या स्वास्थ्य रेखा कई रंगों की दिखाई देती हो। २०. पक्षाघात : यदि हृदय रेखा तथा चन्द्र पर्वत पर दो खड़ी लम्बी लाइनें हों। २१. मस्तिष्क रोग : यदि मस्तिष्क रेखा लहरदार या सीढ़ीदार हो तथा उसका झुकाव स्वास्थ्य रेखा की ओर हो या मस्तिष्क रेखा स्वास्थ्य रेखा से जुड़ी हुई हो या जुड़ने के स्थान पर रेखाओं का गुच्छा सा बन गया हो। २२. दमा : यदि हाथ लुजलुजा हो तथा जीवन रेखा पर द्वीप का चिह्न हो। २३. अन्धा : यदि जीवन रेखा पर वृत्त हो या हृदय रेखा पर धब्बा हो अथवा स्वास्थ्य रेखा पर क्रॉस हो या सूर्य रेखा के प्रारम्भ में बड़ा काला धब्बा हो। २४. मस्तिष्क रोग : यदि मस्तिष्क रेखा जरूरत से ज्यादा चौड़ी हो तथा उस पर काला धब्बा हो। २५. एनीमिया : यदि हृदय रेखा चौड़ी और कमजोर हो तथा नाखूनों का रंग नीला सा हो। २६. जुकाम या नजला : यदि चन्द्र पर्वत बहुत अधिक विकसित तथा उठा हुआ हो। २७. हृदय रोग : यदि हृदय रेखाएं दो हों तथा बीच-बीच में आपस में मिल जाती हों अथवा हृदय रेखा शनि पर्वत पर पहुंच गई हो। २८. गठिया : यदि चन्द्र पर्वत जरूरत से ज्यादा विकसित हो और पूरे चन्द्र पर्वत को कोई एक रेखा काटती हो या उसे दो भागों में विभाजित करती हो। अथवा जीवन रेखा के अन्तिम स्थल पर छोटी-छोटी रेखाओं का गुच्छा हो। २६. मूर्च्छा का रोग : यदि स्वास्थ्य रेखा जीवन रेखा से प्रारम्भ हो रही हो तथा मस्तिष्क रेखा हृदय रेखा की ओर बढ़ रही हो तो उसे जीवन में मूर्च्छा के बार-बार दौरे आते हैं।