बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३२६ ) १०. भयोतुरा : यह गौर वर्ण-नाजुक-लज्जा से सिकुड़ सिमट कर बात करने वाली तथा थोड़ी-थोड़ी बातों से डरने वाली होती है। यह कभी अकेली नहीं रहती । यह सबसे प्रेम करने वाली, मधुर भाषण करने वाली तथा अपने धर्म को निभाने वाली होती है। ११. डाकिनी : यह हंसकर बातें करने वाली तथा धोखा देने में चतुर होती है। इसके नेत्र लाल होते हैं। ऊपर से यह बहुत प्यार दिखाती है पर निकट से यह लालची तथा धोखा देने वाली होती है। इससे प्रेम करना और सांप से प्रेम करना बराबर होता है। इसका पति इसकी बदनामी से हर समय दुखी रहता है। १२. हंसिनी : यह सुखी तथा समझदार होती है। इसकी चाल हंस के समान मनमोहक होती है। यह सत्य बोलने वाली तथा रति के समान सुन्दर होती है। यह मधुर प्रीति करने वाली होती है। ऐसी स्त्रियां सौभाग्यशाली पुरुषों को ही मिलती हैं। १३. बहुवंशिनी : ऐसी स्त्री गेहूंएं रंग वाली तथा पूरी तरह से गृहस्थ धर्म को निभाने वाली होती है। यह असत्य नहीं बोलती तथा पति सेवा में ही प्रसन्न रहती है। समाज में इसका सम्मान होता है। १४. कृपणी : ऐसी स्त्री निर्लज्ज, कमजोर शरीर वाली तथा कंजूस होती है। यह थोड़े बहुत रूप में बदनाम होती है तथा किसी से भी किसी भी प्रकार की बात करने में इसको शर्म नहीं आती। यह धन के लिये किसी भी पुरुष के साथ सोने को तैयार हो जाती है। १५. घातिनी : यह स्त्री चालाक, तथा दूसरों को धोखा देने में होशियार होती है। प्रकट मे यह प्रेम जताती है परन्तु इसके हृदय में जहर भरा हुआ रहता हैं। यह कुशल धोखा देने वाली होती है तथा बात-बात पर असत्य भाषण करती है। १६. प्रेमिणी : यह सुन्दर प्रेम को निभाने वाली तथा पतिप्रिय होती है। यह हमेशा मन्द-मन्द मुस्कराती रहती है तथा जो भी इसकी भलाई करता है उस पर यह सब कुछ न्योछावर करने के लिये तैयार रहती है। इसके केस लम्बे सुन्दर तथा चेहरा आकर्षक होता है । १७. कृशतन्वी : यह स्त्री दुबली पतली तथा क्रोध करने वाली होती है यह अपने आपको बहुत अधिक चतुर समझती है तथा जब बोलती है तो इसका शरीर थरथराता रहता है । १८. मध्यमस्तिनी : यह घमंड में चूर तथा कामपिपासू होती है । काम कला में हमेशा पुरुष ही पराजित होता है। यह कभी भी हार नहीं मानती । यह अत्यधिक कामी होती है तथा अन्त में यह वैश्या के समान हो जाती है। एक स्थान पर टिक कर बैठना इसको अच्छा नहीं लगता ।