बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)
Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana
महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपर्वत
हथेली का अध्ययन करते समय उस पर पाये जाने वाले पर्वतों का विशेष महत्त्व है। क्योंकि पर्वतों के माध्यम से ही विभिन्न रेखाएं बनती हैं और उनका विकास हो पाता है। पर्वतों का नामकरण ग्रहों के नामकरण से हुआ है और जिस ग्रह में जो गुण विशेष रूप से होते हैं, वे ही गुण उन पर्वतों के उभार से ज्ञात किये जा सकते हैं। उदाहरणार्थ सूर्य सम्मान, प्रसिद्धि, यश आदि का कारक ग्रह है। अतः यदि हथेली में सूर्य पर्वत विकसित है तो निश्चय ही उस व्यक्ति को विशेष सम्मान तथा आदर मिलेगा, परन्तु यदि हथेली में सूर्य पर्वत का विकास नहीं हुआ है तो वह व्यक्ति भले ही कितने ही ऊंचे स्तर पर पहुंच जाय, उसको वांछनीय सम्मान अथवा ख्याति नहीं मिल पाती।
[चित्र विवरण: हथेली पर पर्वतों के स्थान]
- शनि
- सूर्य
- बुध
- गुरु
- ऊर्ध्व मंगल
- मंगल का क्षेत्र
- निम्न मंगल
- शुक्र
- चन्द्र
हथेली पर पर्वतों के स्थान
अनुभव में यह भी आया है, कि यदि जन्म-कुण्डली में कोई ग्रह विशेष बलवान है, तो वह ग्रह हथेली में भी बलवान दिखाई देता है अर्थात् उसका पर्वत विकसित