भारतकोश
बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

बृहत् सामुद्रिक शास्त्र एवं हस्तरेखा विज्ञान (प्राचीन ऋषि प्रणीत सानुवाद सटीक)

Vrihat Samudrika Shastra and Hastarekha Vijnana

महर्षि गर्ग एवं नारद परम्परा द्वारा

DevanagariHindipublished350 पृष्ठ

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(१८६) ६. स्वास्थ्य रेखा। ७. विवाह रेखा । इनके अतिरिक्त बारह गौण रेखाएं होती है। यद्यपि ये गौण रेखाएं कहलाती हैं परन्तु हथेली में इनका महत्त्व स्वतंत्र होता है और वह जीवन में बहुत अधिक महत्त्व रखने वाली होती हैं। गौण रेखाएं : १. गुरु वलय २. मंगल रेखा ३. शनि वलय ४. रवि वलय ५. शुक्र वलय ६. चन्द्र रेखा ७. प्रतिभा प्रभावक रेखा ८. यात्रा रेखा ९. सन्तति रेखा १०. मणिबन्ध रेखाएं ११. आकस्मिक रेखाएं १२. उच्च पद रेखाएं इन रेखाओं का अध्ययन सावधानी के साथ करना चाहिए। परन्तु रेखाओं का अध्ययन करने से पूर्व रेखा के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर लेनी उचित रहेगी। मुख्यतः चार प्रकार की रेखाएं होती हैं : १. मोटी रेखा : ये वे रेखाएं होती हैं जो अपने आप में गहरी, स्पष्ट और सामान्यतः चौड़ाई लिये हुए होती हैं। ऐसी रेखाएं धुंधल में भी स्पष्ट देखी जा सकती हैं। २. पतली रेखाएं: ये रेखाएं प्रारम्भ से लेकर अन्त तक पतली परन्तु स्पष्ट होती हैं। ऐसी रेखाएं ज्यादा प्रभावपूर्ण कही जाती हैं। ३. गहरी रेखा : ये रेखाएं सामान्यतः पतली तो होती हैं परन्तु साथ ही साथ गहरी भी होती हैं, और ऐसा प्रतीत होता है जैसे हथेली के मांस में धंसी हुई सी हों। ४. ढलवा रेखा :- ये रेखाएं प्रारम्भ में तो मोटी होती हैं परन्तु ज्यों-ज्यों आगे बढ़ती है त्यों-त्यों अपेक्षाकृत पतली होती जाती हैं।