व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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पस्पशा शब्द का महाकाव्यसम्मत अर्थ भी पस्पशाह्निक पर इस रूप में चरितार्थ हो जाता है कि यहाँ भी वस्तुतः व्याकरणदर्शन के अनेक निगूढ़ प्रश्नों पर विचार प्रस्तुत किया गया है। व्याकरणशास्त्र लौकिक और वैदिक उभयविध शब्दों के साधुत्व का अनुशासन करता है, अतः सर्वप्रथम शब्दस्वरूप पर विचार किया गया है। अखण्ड और नित्य स्फोटरूप शब्दब्रह्म की संसिद्धि वैयाकरणों को अभीष्ट है। इसी मत की स्थापना के निमित्त ही द्रव्य, गुण, क्रिया और जातिशब्दवादियों के सिद्धान्त को पूर्वपक्ष के रूप में स्थापित कर उनका प्रत्याख्यान किया गया है। वह नित्य तत्त्व जो ध्वनि से व्यक्त होता है तथा उच्चरित होने पर तत्तदर्थ का बोध करवाता है। वैयाकरणों की दृष्टि में शब्द है। इसे ही स्फोट का नाम दिया गया है। यद्यपि लोकव्यवहार की दृष्टि से ध्वनि में भी पतञ्जलि ने शब्दत्व स्वीकार किया ही है। इन्हीं ध्वनि- रूप शब्दों का साधुत्व प्रतिपादन ही व्याकरणशास्त्र का विषय है। तदनन्तर व्याकरणशास्त्र अथवा व्याकरणाध्ययन के मुख्य एवं गौण प्रयोजनों का अन्वाख्यान किया गया है। वेदों की रक्षा के लिए तो व्याकरणाध्ययन अनिवार्य है ही, आगम (शास्त्र) भी व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक है— रक्षार्थं वेदानामध्येयं व्याकरणम् । आगमः खल्वपि। ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च । इस विवेचन में पतञ्जलि के वेदविषयक पाण्डित्य का परिचय भी उपलब्ध होता है, जहाँ अनेक वैदिक मन्त्रों को उद्धृत करके उनका व्याख्यान किया गया है। “चत्वारि शृङ्गा०" इत्यादि मन्त्र का शब्दब्रह्म को लक्ष्य करके पतञ्जलि ने मौलिक व्याख्यान प्रस्तुत किया है। इससे पूर्व यास्क ने इसी मन्त्र को यज्ञपुरुष के रूप में व्याख्यात किया था। बाद में राजशेखर ने इसी मन्त्र की सहायता से काव्यपुरुष के शरीर का निर्माण किया। शब्दों का साधुत्वप्रतिपादन शब्दानुशासन शास्त्र का विषय है, “रक्षोहागम- लघ्वसन्देहाः" इसके प्रयोजन । अधिकारी का निर्देश तेभ्य एव विप्रतिपन्न- बुद्धिभ्योऽध्येतृभ्यः सुहृद्भूत्वाऽऽचार्य इदं शास्त्रमन्वाचष्टे, इस वाक्य के द्वारा हुआ है। प्रमेय रूप शब्दज्ञान तथा साधन रूप शब्दानुशासन में परस्पर बोध्यबोधकभाव सम्बन्ध है। शास्त्र का विषयभूत यह शब्दोपदेश साधु शब्दों, असाधु शब्दों तथा साधु और असाधु उभयविध शब्दों के उपदेश को लेकर भी किया जा सकता है। उभयविध शब्दोपदेश की पद्धति में स्पष्टता और सरलता होते हुए भी यह गौरव दोष से दूषित है, अतः इसे स्वीकार नहीं किया गया। अपशब्दोपदेश से भी साधु शब्दों का का अनुमान किया जा सकता है। गावी, गोणी इत्यादि समस्त असाधु शब्दरूपों को एक स्थान पर उल्लिखित देखकर उनसे व्यतिरिक्त एक साधु शब्द तक पहुँचाया