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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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इष्टि को अधिक महत्त्वपूर्ण कहा गया है, वह प्रसङ्ग भी इसी तथ्य को पुष्ट करता है। पतञ्जलि की यह मान्यता पश्चाद्वर्ती वैयाकरणों में भी इसी रूप में स्वीकार हुई। महाकवि श्रीहर्ष ने भी इस बात को समर्थन देते हुए कहा है कि शश से युक्त पदार्थ को शशी मानकर भी तदनुरूप मृग से युक्त पदार्थ को मृगी नहीं कहा जाता क्योंकि यह प्रयोग लोक व्यवहार में स्वीकार्य नहीं हुआ— भङ्क्तुं प्रभुर्व्याकरणस्य दर्पं पदप्रयोगाध्वनि लोक एषः । शशो यदस्यास्ति शशी ततोऽयमेवं मृगोऽस्यास्ति मृगीति नोक्तः ।। नैषध०-२२।८४. वाक्यपदीयकार के अनुसार कालान्तर में पतञ्जलि के शिष्यों बैजि, सौभव और हर्यक्ष ने शुष्क तर्कपद्धति का आश्रय लेकर इस ग्रन्थ के महत्त्व को घटा दिया,⁶ जिससे यह एक लम्बे समय तक लुप्त प्राय ही रहा। केवल ग्रन्थ रूप में यह अस्तव्यस्त रूप में अवशिष्ट रहा। भर्तृहरि और कल्हण⁷ दोनों ने चन्द्राचार्य को महाभाष्य का उद्धारक माना है। उसके बाद भर्तृहरि ने महाभाष्य पर 'त्रिपदी' नाम की टीका लिखी। कैयट ने अपने महाभाष्य प्रदीप पर त्रिपदी का प्रभाव स्वयं स्वीकार किया है। प्रदीप पर नागेशभट्ट ने उद्योत नाम का व्याख्यान लिखा । प्रदीपोद्योत पर वैद्यनाथ पायगुण्डे की छाया नाम की व्याख्या भी उपलब्ध होती है जिस पर काशी विश्वविद्यालय के व्याकरणाचार्य पं० रुद्रधर झा ने १९५४ में 'तत्त्वालोक' नाम की टीका लिखी है। सम्पूर्ण महाभाष्य कुल ८५ आह्निकों में विभक्त है। 'आह्निक' शब्द का अर्थ है—एक दिन में अधीत अंश । ग्रन्थ की शैली भी इसी प्रकार की है मानों गुरु अपने शिष्यों को विद्याभ्यास करवा रहा हो। व्याकरण शास्त्र के मूल सिद्धान्तों को सरलतम रूप में हृदयङ्गम कराने की दृष्टि से यह शैली अत्यन्त आकर्षक, रोचक तथा उपयुक्त है। पस्पशाह्निक इस विशाल ग्रन्थ का प्रथम आह्निक है जिसे वस्तुतः सम्पूर्ण ग्रन्थ की प्रस्तावना कहा जा सकता है। 'पस्पश' शब्द प्रारम्भ अथवा उपोद्घात के अर्थ में प्रयुक्त होता है। माघ के 'शिशुपालबधम्' में यह शब्द गुप्तचर के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ है जहाँ श्लेष की सहायता से गुप्तचरों के बिना राज्य की श्रीहीनता की उपमा पस्पशाह्निक के बिना शब्दविद्या की शोभाहीनता से की गई है—"शब्दविद्येव नो भाति राजनीतिरपस्पशा ।" एवं च प्रकारान्तर से महाकाव्य का यह प्रसङ्ग पस्पशाह्निक के महत्त्व को भी स्पष्ट कर पाने में कृतकार्य हुआ है। ६. बैजिसौभवहर्यक्षैः शुष्कतर्कानुसारिभिः । आर्षे विप्लावित ग्रन्थे सङ्ग्रहप्रतिकञ्चुके ॥ —वाक्य० २।४८७ ७. राजतरङ्गिणी १।१७५