भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

पृष्ठ 8, कुल 96 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 8

( vi ) पर एक बृहद् व्याख्यान है, जिसे वस्तुतः पाणिनि व्याकरण के उत्कर्ष का चरम कहा जा सकता है। दर्शन से नितान्त अस्पृष्ट अष्टाध्यायी के सूत्रों में दार्शनिकता की गन्ध ढूंढकर उनका नये ढंग से व्याख्यान किया गया। भर्तृहरि ने इसे संग्रह प्रतिकञ्चुक कहा है जो इस बात का प्रतीक है कि यह संग्रह के समान व्याकरण का दार्शनिक ग्रन्थ है। भाषा की दृष्टि से सरल होने पर भी यह भावगाम्भीर्य के कारण दुर्बोध है। अपने प्रौढ पाण्डित्य, गम्भीर अर्थविवेचना और व्यापक दृष्टि के कारण यह भाष्य ही नहीं, महाभाष्य कहा जाता है। इस प्रसङ्ग में भर्तृहरि के— कृतेऽथ पतञ्जलिना गुरुणा तीर्थदर्शिना । सर्वेषां न्यायबीजानां महाभाष्ये निबन्धने ।। वाक्य २।४८५. इस कथन पर पुण्यराज की यह टिप्पणी विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है— “तच्च भाष्यं न केवलं व्याकरणस्य निबन्धनं यावत्सर्वेषां न्यायबीजानां बोद्धव्य- मित्यत एव सर्व न्यायबीजहेतुत्वादेव महच्छब्देन विशिष्य महाभाष्यमित्युच्यते लोके ।” कैय्यट की भी इस विषय में स्पष्ट उक्ति है— पाणिनीयव्याख्यानभूतत्वेऽपि इष्ट्यादिकथनेन अन्वाख्यातृत्वादस्य इतर- भाष्यवैलक्षण्येन महत्त्वम् ।। खण्डनमण्डनात्मक शैली में वार्त्तिककारों के मतों का सूक्ष्म परीक्षण करते हुए व्याख्यानमुखेन व्याकरण के दार्शनिक सिद्धान्तों के प्रतिपादन के साथ-साथ विभिन्न शास्त्रों के सिद्धान्तों का भी यथास्थान निवेश हो गया है। यह भी इस भाष्य के महत् विशेषण का हेतु है। इसी ग्रन्थ में बीज रूप से निर्दिष्ट विशेषण के आधार पर आगे चलकर भर्तृहरि ने व्याकरण को दर्शनत्व की उच्च भूमि पर आरूढ़ किया तथा नागेश और उसके टीकाकारों ने आगे चलकर इसे नव्यन्याय की शैली पर प्रतिष्ठापित करने का गौरव प्राप्त किया किन्तु पतञ्जलि का वैशिष्ट्य फिर भी बना रहा क्योंकि सरल से सरल भाषा में अत्यन्त दुरूह विषय को भी संवादमयी सहज शैली में प्रस्तुत कर पाना पतञ्जलि के द्वारा ही सम्भव है। स्थान स्थान पर प्रयुक्त होने वाली सूक्तियां और कहावतें भाषा और भावों को भी जीवन्तता प्रदान करती हैं। “यथोत्तरं मुनीनां प्रामाण्यम्” की कल्पना ने इनके महत्त्व को और भी बढ़ा दिया जहाँ सूत्रकार और वार्त्तिककार की भी अपेक्षा से भाष्यकार का मत अधिक प्रशस्त माना जाता है। लोकव्यवहार में प्रचलित प्रयोगों को शास्त्र की सीमाओं में बाँधने के लिए पतञ्जलि ने इष्टियों का निर्माण किया। प्रकारान्तर से यह इस बात का भी प्रतीक है कि पतञ्जलि शास्त्र की अपेक्षा लोक को ही अधिक महत्त्व देते थे। वैयाकरण तथा सूत के संवाद में जहाँ प्राप्ति और इष्टि की बात को उठाकर