व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 7, कुल 96 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका पतञ्जलि, महाभाष्य और पस्पशाह्निक प्रक्रियात्मक और दार्शनिक इन दोनों ही पक्षों में समान गति होने के कारण व्याकरण समस्त ज्ञान शाखाओं में विशिष्ट है । सूक्ष्म रूप से यदि विचार किया जाये तो व्याकरणशास्त्र के इन दोनों ही पक्षों के मूल को एक ही वैदिक वाक्य “इष्ट्वा रूपे व्याकरोत् सत्यानृते प्रजापतिः”१ में ढूंढा जा सकता है । वाणी के चार भागों की कल्पना वैदिक ऋषि के चिन्तन की पराकाष्ठा है ।२ वेद का यही वाक्तत्त्व ब्राह्मण ग्रन्थों में व्याख्यात होकर पुनः औपनिषदिक विवेचन का आधार बना । गोपथब्राह्मण में ३ शब्द के प्रकृतिप्रत्यय विभाग के सम्बन्ध में “ओंकारं पृच्छामः । को धातुः, कि प्रातिपदिकं, कि नामाख्यातं, कि लिङ्गं, कि वचनं, का विभक्तिः, कः प्रत्ययः इति” इस प्रकार के अनेक प्रश्न उठाये गये हैं । इन समस्त प्रश्नों का समाधान भी किया गया । विषय के विशेषज्ञ वैयाकरण आचार्य इस समय तक प्रसिद्ध हो गये थे, इसका उल्लेख भी यहीं मिलता है ४—“आख्यातो- पसर्गानुदात्तस्वरितलिङ्गविभक्तिवचनानि च संस्थानाध्यायिन आचार्याः पूर्वे बभूवुः ।” पाणिनि ने अपने शब्दानुशासन में अनेक वैयाकरणाचार्यों का उल्लेख किया है । स्वयं महाभाष्य में भी ऐन्द्र व्याकरण की ओर संकेत है जिसमें प्रतिपदपाठ की पद्धति से शब्दानुशासन किया गया था ।५ इस पूर्ववर्ती व्याकरणपरम्परा को उपजीव्य बनाकर महावैयाकरण पाणिनि ने पदसाधुत्व के हेतु अष्टाध्यायी के रूप में सूत्र ग्रन्थ का निर्माण कर वैदिक भाषा को संस्कृत किया । अनेक वैयाकरणों ने इन सूत्रों पर वार्त्तिकों का निर्माण किया । वार्त्तिककारों में कात्यायन सर्वप्रमुख हैं । सुनाग का नाम भी वार्त्तिककार के रूप में उपलब्ध होता है । पतञ्जलि का महाभाष्य इन्हीं वार्त्तिकों १. यजुर्वेद १६.१७ २. (क) चत्वारि वाक् परिमिता पदानि । —ऋग्वेद १।१६४।४५ (ख) चत्वारि शृङ्गा० ऋग्वेद ४।५८।३ इस मन्त्र पर महाभाष्य का व्याख्यान । ३. गोपथब्राह्मण, प्रथम प्रपाठक १।२४ ४. वही १।२७ ५. बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां पारायणं प्रोवाच···। बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता···। —महाभाष्यम्, पस्पशाह्निकम् ।