भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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( x ) सहस्र वस्तुओं पर विचार किया था। द्रव्याभिधानवाद,८ वाक्यार्थवाद,६ शब्दप्रकृति- अपभ्रंशवाद और नित्यशब्दत्ववाद व्याडि के मुख्य सिद्धान्त हैं। शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध की नित्यता का ज्ञान लोकव्यवहार से होता है। इसके समर्थन में पतञ्जलि ने एक सुन्दर आख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा है कि घट प्रयोग की इच्छा करने वाला व्यक्ति जिस प्रकार से कुम्भकार के पास जाकर घट का क्रय कर लेता है, उसी प्रकार से कोई शब्द प्रयोग के लिए वैयाकरण के पास शब्द का क्रय करने नहीं जाता। लोकव्यवहार से ही शब्दार्थसम्बन्धों की नित्यता सिद्ध होने पर भी शास्त्र के द्वारा उनका धर्मनियमन किया जाता है। शब्दों का साधुत्व व्यवहार के आश्रित है अतः अन्वय-व्यतिरेक से जो शब्द लोक में व्यवहृत नहीं होते, उनमें स्वतः ही असाधुत्व आ जाता है, परन्तु शास्त्र में अनेक ऐसे शब्दों का भी अनुशासन होता है जो लोक व्यवहार में प्रचलित नहीं हैं, अतः असाधु (लोक में अप्रचलित) शब्द का अनुशासन करने से शास्त्र अनिष्टानुशासन से दूषित हो जायेगा परन्तु दीर्घकालीन शतवार्षिक और सहस्रवार्षिक यज्ञों के समान इन शब्दों का अनुशासन भी धर्म मानकर अवश्यंकर्त्तव्य है। जिस प्रकार से आज इन दीर्घकालीन यज्ञों को कोई नहीं कर सकता किन्तु फिर भी शास्त्र से उनका विधान होता ही है, उसी प्रकार से अप्रयुक्त होने पर भी इनका अनुशासन दोषयुक्त नहीं है, प्रत्युत आवश्यक है। और फिर शब्द प्रयोग के महान् विषयक्षेत्र को अनदेखा करके किसी शब्द जो अप्रयुक्त नहीं कहा जा सकता। अतः शास्त्र में इस दोष की प्रसक्ति की सम्भावना नहीं की जा सकती। साधु शब्द अभ्युदय का हेतु है। असुर “हेलयो हेलयः” इस प्रकार कहते हुए पराभव को प्राप्त हुए, यह इस बात का प्रतीक है कि केवल ज्ञानमात्र से नहीं प्रत्युत साधु शब्द के प्रयोग से ही धर्म की प्राप्ति होती है किन्तु व्यवहार में यह धर्मनियमन केवल याज्ञिक क्रियाओं में ही लागू होता है। यर्वाणः, तर्वाणः नामक ऋषियों का प्रसङ्ग इस बात को पुष्ट करता है, जो ‘यद्वानः,’ ‘तद्वानः’ इन शब्दों के स्थान पर असाधु यर्वाणः, तर्वाणः शब्दों का प्रयोग किया करते थे और इसीलिए उनका नाम भी यर्वाणः, तर्वाणः पड़ गया था परन्तु याज्ञिक क्रियाओं में शुद्ध उच्चारण करने के कारण वे दूषित नहीं हुए। तथापि सिद्धान्त रूप में श्रुति का अनुसरण करते हुए ८. (क) द्रव्याभिधानं व्याडिः । —महाभाष्य १।२।६४ (ख) वाजप्यायनस्याकृतिः । व्याडेस्तु द्रव्यम् । महाभाष्यदीपिका, पृ० ११ ६. न हि किञ्चित्पदं नामरूपेण नियतं क्वचित् । पदानां रूपमर्थो वा वाक्यार्थादेव जायते ॥ —वाक्य० १।२४ की हरिवृत्ति में उद्धृत । १०. शब्दप्रकृतिरपभ्रंश इति संग्रहकारः । —वाक्य १।१४८ की हरिवृत्ति में ।