व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( xi ) ज्ञानपूर्वक साधु शब्द के प्रयोग का पक्ष भाष्यकार को अभिमत है । "योऽग्निष्टोमेन यजते य उ चैनमेवं वेद" तथा "योऽग्निं नाचिकेतं चिनुते य उ चैनमेवं वेद" इत्यादि श्रुतियाँ भी शास्त्र ज्ञानपूर्वक साधु शब्द के प्रयोग में धर्म का नियमन करती हैं । अथवा ज्ञानमात्र से भी धर्मप्राप्ति की बात इसलिए स्वीकार्य हो सकती है कि अप- शब्दज्ञान भी वस्तुतः शब्दज्ञान का एक उपाय ही है यद्यपि पाणिनीय तन्त्र में इस पद्धति को नहीं अपनाया गया । अथवा यह भी कहा जा सकता है कि कूपखनन में जिस प्रकार से व्यक्ति पहले मृत्तिका से लिप्त होकर पश्चात् स्वच्छ जल में स्नान कर पवित्र हो जाता है, उसी प्रकार अपशब्दज्ञान के अधर्म से दूषित हुआ व्यक्ति साधु शब्दज्ञान के पुण्य को प्राप्त कर पुनः उस दोष से मुक्त होकर अभ्युदय को प्राप्त कर सकता है । और फिर व्याकरणदर्शन तो शब्दप्रमाणवादी दर्शन है । आगम साधु शब्द के ज्ञान से धर्मप्राप्ति का निर्देश तो अवश्य करता है, अपशब्द से अधर्म प्राप्ति की बात वहाँ नहीं कही गई—शब्दश्च शब्दज्ञाने धर्ममाह नापशब्द- ज्ञानेऽधर्मम् । इसके अनन्तर व्याकरण शब्द के पदार्थ पर विचार किया गया है । सिद्धान्ती के अनुसार लक्ष्य अर्थ और लक्षण सूत्र दोनों की युगपत् व्याकरण-संज्ञा है—लक्ष्य लक्षणे व्याकरणम् । समुदाय में प्रवृत्त होने वाले शब्द उसके अवयवों में प्रयुक्त होते हुए लोक में देखे जाते हैं, अत एव केवल सूत्रों का अध्ययन करने वाले व्यक्ति को भी 'वैयाकरण' कहते हैं । अथवा केवल सूत्र में भी व्याकरणत्व उत्पन्न हो सकता है और इस पक्ष में व्याकरणस्य सूत्रम् इत्यादि प्रयोग राहोः शिरः आदि प्रयोगों के समान व्यपदिष्ट माने जा सकते हैं । परन्तु केवल शब्द में व्याकरणत्व सिद्ध नहीं किया जा सकता क्योंकि ऐसा मानने पर भव और प्रोक्तादि अर्थों में तद्धित प्रत्यय निष्पन्न नहीं हो पायेंगे । इस सूत्ररूप व्याकरणशास्त्र में लाघव से प्रवृत्ति के लिए प्रारम्भ में वर्णों का उपदेश किया गया है यद्यपि साक्षात् किसी साधु शब्द का अनुशासन इससे नहीं होता । इसके अतिरिक्त अनुबन्धों का बोधन तथा इष्ट वर्णों का उपदेश भी वर्णो- पदेश के प्रयोजन हैं । इष्ट वर्णों के विशेष बोध में एक वर्ण का उपदेश करने से ही उसके अन्य आकृतिरूपों का ग्रहण स्वयं हो जाता है । यथा उपदिश्यमान अकार अपने अन्य दीर्घ, प्लुत, उदात्तादि सभी रूपों का ग्रहण करवाता है परन्तु इस आकृतिग्रहण में संवृत, ध्मात आदि स्वर और व्यंजन दोषों का ग्रहण इष्ट नहीं है क्योंकि आचार्य ने आगम, विकार, धातु प्रत्यय आदि सभी को शुद्ध रूप में पढ़ा है— आगमाश्च विकाराश्च प्रत्ययाः सह धातुभिः । उच्चार्यन्ते ततस्तेषु नेमे प्राप्ताः कलादयः ॥