व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
DevanagariHindipublished96 पृष्ठ
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( xii ) अथवा दुर्जनतोषणन्याय से यदि इन दोषों का ग्रहण मान भी लिया जाये तो गर्गादि, विदादि पाठों से इन दोषों की निवृत्ति हो सकती है। गर्गादि गणपाठों के दो प्रयोजन हैं। ये समुदायों का साधुत्व तो बनाते ही हैं, कलादि की निवृत्ति भी करते हैं, परन्तु इन दोषों को अनुबन्धों के स्थान पर लिङ्ग स्वीकार करने से यद्यपि इत्संज्ञा, लोप आदि की दीर्घ शास्त्रीय प्रक्रिया से बचा अवश्य जा सकता है परन्तु यह व्यवस्था अपाणिनीय है, इसलिए स्वीकार्य नहीं हो सकती। अपि च ऐसा होने पर शास्त्र अशिष्टानुशासन के दोष से दूषित हो जायेगा, जो सर्वथा अभीष्ट नहीं है।