भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पश्पशा) ३ शब्दों से है क्योंकि साधु शब्द के प्रयोग से ही धर्म की प्राप्ति होती है और अधर्म- कारक असाधु शब्दों का व्याख्यान करके शास्त्र अनिष्टानुशासन के दोष से दूषित हो जायेगा और फिर साधु शब्दों के व्याख्यान में लाघव भी है । मेदिनीकोश में ‘अथ’ शब्द के संशय, अधिकार, मंगल, विकल्प, आनन्तर्य, प्रश्न, कार्त्स्न्य, आरम्भ और समुच्चय रूप ६ अर्थ बताये गये हैं—(अथायो संशये स्यातामधिकारे च मङ्गले । विकल्पानन्तरप्रश्नकात्स्न्र्यारम्भसमुच्चये ।।) यहाँ यह निपात 'आरम्भ' अर्थ का द्योतक है । इति शब्द का प्रयोग ‘अथ’ शब्द के स्वरूपा- वस्थान के लिये है । "शब्दानुशासनम्" में “कर्तृकर्मणोः कृति" इस सूत्र से षष्ठी प्राप्त है । 'कर्मणि च" सूत्र से समास का निषेध न होकर “इध्मप्रव्रश्चनः” आदि की तरह समास का रूप निष्पन्न होगा । शास्त्र का लक्षण है—“प्रवृत्तिर्वा निवृत्तिर्वा नित्येन कृतकेन वा । पुंसां येनोपदिश्येत तच्छास्त्रमभिधीयते" ।। व्याकरण में भी साधुशब्दप्रयोग में प्रवृत्ति तथा असाधु शब्दप्रयोग में निवृत्ति का उपदेश किया जाता है, अतः व्याकरण भी शास्त्र है । 'शब्दानुशासनम्' समस्त पद है, अतः "पदार्थः पदार्थानन्वेति न तु तदेकदे- शेन" इस नियम से समस्त पद के एकभाग 'शब्द' शब्द से सम्बद्ध प्रश्न “केषां शब्दानाम्" भी उपपन्न नहीं हो सकता । तथापि भाष्यकार के ही इसी प्रकार के अन्य प्रयोगों—“राजपुरुषोऽयम् । कस्य राज्ञः ?" इत्यादि को देखकर इसका भी सामञ्जस्य किया जा सकता है । यद्यपि सिद्धान्तरूप में शब्द एक ही है और उसके समस्त जागतिक आकार अनित्य हैं, तथापि लोक में क्योंकि उन्हीं से अर्थबोध होता है और व्याकरण में भी उन्हीं के साधुत्व का अनुशासन किया जाता है, अतः लौकिक प्रयोग को दृष्टि में रखकर यहाँ बहुवचन का निर्देश किया गया है । इसीलिए व्याकरण को आञ्जस (तामस, अन्धकारपूर्ण) मार्ग भी कहा गया है । वैदिक शब्द भी यद्यपि लोक में ही हैं तथापि प्रधान होने के कारण ब्राह्मण- वशिष्ठ न्याय से उनका पृथगुपादान किया गया है । अथवा लोकभाषा में प्रयुक्त शब्दों को लौकिक और वेद में प्रयुक्त शब्दों को वैदिक कहकर भी इस कथन का सामञ्जस्य किया जा सकता है । वेदवाक्यों में पदानुपूर्वी नियत है । मीमांसा का स्पष्ट अभिमत है कि विशिष्ट क्रम में मन्त्रों का पाठ करने से अभ्युदय की प्राप्ति होती है । इसीलिए वैदिक शब्दों को मन्त्रस्थ क्रम में ही पढ़ा गया है, लौकिक शब्दों को स्वतन्त्र रूप से पृथक् पृथक् करके पढ़ दिया गया । मूलम् — अथ गौरित्यत्र कः शब्दः । कि यत्तत्सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषा- ण्यथंरूपं स शब्दः । नेत्याह । द्रव्यं नाम तत् ।