व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ५ स्फोटो नादाभिव्यङ्ग्यो वाचको विस्तरेण वाक्यपदीये व्यवस्थापितः । उच्चारितेन । प्रकाशितेनेत्यर्थः । अथवेति । अन्यत्र ध्वनिस्फोटयोर्भेदव्यवस्थापितत्त्वादिहाभेदेन व्यवहारेऽपि न दोषः, द्रव्यादयो न शब्दशब्दवाच्या इत्यत्र तात्पर्यात् । ध्वनिं कुर्वन्निति । विधि- निषेधयोरप्रवृत्तविषयत्वात्कथमस्य त्रिभिः सम्बन्धः । उच्यते—शब्दं कुर्वन्नपि शब्दं कुर्वित्युच्यते विरामाशङ्कायां तन्निवृत्तये । तथानभिमतशब्दश्रवणोद्वेजितेनोच्यते— मा शब्दं कार्षीरिति । अनुवाद—सम्प्रति "गौः" इसमें क्या शब्द है ? क्या वह, जो सास्ना (गलकम्बल), पूंछ, ककुद (कूब), खुर और सींग वाला पदार्थ है, वह शब्द है ? 'नहीं' यह (वैयाकरण) कहता है । वह तो द्रव्य है । तो क्या जो (उसके) शरीरव्यापार, कायपरिस्पन्द और अक्षिव्यापार हैं; वह शब्द है ? 'नहीं' ऐसा (वैयाकरण) कहता है । वह तो क्रिया है । तो जो वह (तद्गत) शुक्ल, नील, कपिल और कपोत (वर्ण) है, वह शब्द है ? वैयाकरण कहता है—"नहीं, वह तो गुण है ।" तो जो वह भिन्न (पदार्थों) में भी अभिन्न, (पदार्थों के) नष्ट हो जाने पर भी नित्य रहने वाला सामान्यभूत (जातितत्त्व) है, वह शब्द है । वैयाकरण कहता है, "नहीं, वह तो आकृति (जाति) है ।" तो शब्द क्या है ? (उत्तर) जिसके उच्चारण करने से (नादाभिव्यक्त होने से) सास्ना लाङ्गूल ककुद खुर और सींग वाले पदार्थ का बोध होता है, वह शब्द है । अथवा लोक में जिससे अर्थ का बोध होता है, वह ध्वनि 'शब्द' कही जाती है । जैसे ध्वनि करने वाले बालक को उद्देश्य करके 'शब्द करो', 'शब्द मत करो', यह बालक शब्दकारी (शोर करने वाला) है, ऐसा कहा जाता है । इसलिए (लोकव्यवहार में) ध्वनि शब्द है । उषा—"ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म" इत्यादि श्रुतिवाक्यों तथा "वृद्धिरादैच्" इत्यादि स्मृतिवाक्यों में शब्द और अर्थ का अभेद रूप में प्रतिपादन है । लौकिक व्यवहार में भी "अयं गौः" इत्यादि वाक्यों में गो शब्द और गो अर्थ का अभेदेन प्रयोग होने से द्रव्य में शब्दत्व की शङ्का उत्पन्न होती है । न केवल द्रव्य और शब्द का ही, बल्कि द्रव्याश्रित जाति, गुण, क्रिया का भी द्रव्य के साथ अभेद होने के कारण परम्परा से शब्द के साथ अभेद सिद्ध होता है । इसलिए शब्दानुशासन से पूर्व शब्द के स्वरूप पर विचार करते हुए भाष्यकार ने "अथ गौरित्यत्र कः शब्दः" इस प्रश्न को उठाया है और सास्नालाङ्गूलककुदखुरविषाण्यर्थरूप गुण तथा सामान्यभूत जाति को पूर्वपक्ष के रूप में उठाकर उनका शब्दत्वेन निषेध किया है ।