व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६ महाभाष्यम् व्याकरणमत में न तो प्रत्येक वर्ण को ही वाचक माना जाता है, न वर्णों के समूह को। घट आदि शब्दों में यदि घटादि प्रत्येक वर्ण को ही वाचक मान लिया जाये तो अन्य वर्णों में, जिनके समूह से पद बना है—टकारादि में वैयर्थ्य प्रसङ्ग उपस्थित हो जायेगा। वर्ण समुदाय भी उच्चरित प्रध्वंसी स्वभाव वाला होने के कारण अर्थ का वाचक नहीं हो सकता क्योंकि पूर्वापरता परस्पर सापेक्ष होती है और एक वर्ण के नष्ट हो जाने पर दूसरे वर्ण से सापेक्षता की कल्पना नहीं की जा सकती। नैयायिक तो क्योंकि शब्द को ही अनित्य मानता है, अतः वर्णों की सत्ता ही जब नष्ट हो जाती है तो उनमें व्यवधानरहित उत्तरकालीनता के सम्बन्ध की कल्पना सम्भव नहीं। पूर्व पूर्व वर्ण के संस्कार की कल्पना इसलिए उचित नहीं कि संस्कार के विशिष्ट क्रम को निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता। नदी और दीन तथा सर और रस आदि के समान इस प्रकार का क्रम विपर्यय लोकव्यवहार में निश्चय ही अनभीष्ट है। इसलिए वैयाकरणों के अनुसार द्रव्य, गुण, क्रिया, जाति आदि से भिन्न एक स्वतन्त्र सत्ता है, जिसके उच्चारण से सास्नादिमत्पदार्थ का बोध होता है। कैयट और नागेश यहाँ स्फोट तत्त्व का विवेचन करते हैं जो नित्य है और ध्वनि के द्वारा अभिव्यक्त होता है। शब्द का उपकारक होने के कारण ध्वनि में शब्दत्व का आरोप होता अवश्य है, वस्तुतः वह शब्द नहीं। स्फोट ही वास्तविक शब्द है। वर्णरूप मध्यमानाद से अभिव्यक्त होकर वह वर्णस्फोट पदरूप मध्यमानाद से अभिव्यक्त होकर पदस्फोट और वाक्यरूप मध्यमानाद से अभिव्यक्त होकर वाक्य- स्फोट कहलाता है। वस्तुतः ये सब भेद भी घटाकाश और मठाकाश की तरह औपाधिक हैं, वास्तविक नहीं। वर्ण और पद एक स्वतन्त्र और पूर्ण ध्वनि तो हो सकते हैं, स्वतन्त्र अर्थ नहीं हो सकते। अतः कौण्डभट्ट के अनुसार आठ प्रकार के स्फोटों में से वाक्य स्फोट ही मुख्य है, क्योंकि उसी से लोक में अर्थबोध देखा जाता है। लोक में प्रचलित ध्वनि को भी पतञ्जलि ने शब्द के रूप में स्वीकार किया है। लोक में 'शब्द' शब्द से ध्वनि अर्थ ही समझा जाता है, इसीलिए “शब्दं कुरु", “मा शब्दं कार्षीः" इत्यादि प्रयोग उपपन्न होते हैं। भर्तृहरि ने भी आगे चलकर प्रत्येक वाचक शब्द में दो शब्दों (स्फोट और ध्वनि) की सत्ता को स्वीकार किया था तथापि भर्तृहरि के ही शब्दों में ध्वनि शब्द का प्रयोजन स्फोट शब्द को अभि- व्यक्त मात्र करना ही है। पतञ्जलि ने भी अन्यत्र महाभाष्य में ही ध्वनि को शब्द का गुण कहा है—"एवं तर्हि स्फोटः शब्दः, ध्वनिः शब्दगुणः"। परापश्यन्ती- मध्यमावैखरीरूप वाणी के चार विभागों में से यहाँ ध्वनिपद से वैखरी तथा स्फोट पद से मध्यमावस्थास्थ आन्तर शब्द का ग्रहण होता है। मूलम् — कानि पुनः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि ? रक्षोहागमलध्वसन्देहाः प्रयोजनम् ।