व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ महाभाष्यम् ब्राह्मणस्य वृत्तिः । न चाशब्दज्ञं तमुपश्लिष्यन्ति शिष्या इति । असन्देहार्थमिति । सन्देहस्य प्राग्भावोऽत्र द्रष्टव्यो न तु प्रध्वंसाभावः । न हि वैयाकरणस्य संशय उत्पद्य विनश्यति, इतरस्यैव तदुत्पादात् । स्वरत इति । पूर्वपदप्रकृतिस्वराद्बहुव्रीह्यर्थावसाय इत्यर्थः । अनुवाद—शब्दानुशासन (व्याकरणाध्ययन) के क्या प्रयोजन हैं ? रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह—ये (मुख्य) प्रयोजन हैं । वेदों की रक्षा के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । क्योंकि लोप, आगम आदि वर्ण विकारों को जानने वाला ही वेदों की सम्यक् प्रकार से रक्षा कर सकेगा । ऊह भी (प्रयोजन है) । वेद में मन्त्र सब लिङ्गों और सब विभक्तियों के साथ नहीं पढ़े गये । यज्ञ में प्रवृत्त पुरुष के द्वारा यथायुक्त प्रकार से विपरिणमित होने चाहिएँ । अवैयाकरण उन्हें उचित रीति से परिवर्तित नहीं कर सकता । इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । आगम (शास्त्र) भी (व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक है) । ब्राह्मण के द्वारा प्रयोजन रहित होकर धर्मस्वरूप षडङ्ग वेद का अध्ययन और ज्ञान प्राप्त करना चाहिए । छह अङ्गों में व्याकरण प्रधान है और प्रधान में किया हुआ यत्न फलवान् भी होता है । लाघव के कारण व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । ब्राह्मण को शब्द का ज्ञान अवश्य करना चाहिए और शब्द ज्ञान के लिए व्याकरण के अतिरिक्त अन्य लघु उपाय नहीं है । सन्देह की निवृत्ति के लिए भी व्याकरणाध्ययन करना चाहिए । याज्ञिक (मीमांसक) कहते हैं कि “स्थूलपृषती गाय का अग्नि तथा वरुण देवताओं के लिए आलम्भन करे ।” इसमें सन्देह है । (इसका एक अर्थ हो सकता है) स्थूल और पृषती (धब्बों वाली) (दूसरा अर्थ) स्थूल (मोटे) हैं धब्बे जिसके । अवैयाकरण इस विषय में स्वर से निश्चय नहीं कर सकता । यदि पूर्वपद का अपना ही स्वर है तो यह बहुव्रीहि है, यदि समासान्तोदात्त है तो तत्पुरुष । उषा—शब्दानुशासन के प्रयोजन से यहाँ अभिप्राय व्याकरणाध्ययन के प्रयोजन से है । प्रदीपकार ने यहाँ इसका अर्थ यह किया है कि क्या व्याकरणा- ध्ययन संध्योपासनादि की तरह नित्य कर्म है अथवा ज्योतिष्टोम आदि की तरह काम्य कर्म ? इसी बात को प्रदीप के व्याख्याता उद्योत ने स्पष्ट करते हुए कहा है कि क्या शब्दज्ञान का प्रयोजन, उसके अज्ञान से प्राप्त होने वाले प्रत्यवाय का परिहार करना है अथवा इसका इससे अतिरिक्त कुछ अन्य भी फल है ? पतञ्जलि ने “ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽध्येयो ज्ञेयश्च” कहकर उसके नित्य