व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ६ अध्ययन की बात कही थी। अन्यत्र एक स्थल पर पतञ्जलि ने शब्दज्ञान में धर्म- प्राप्ति की बात करते हुए कहा है कि शब्द साधुशब्द के ज्ञान में धर्म की बात करता है, अपशब्द के ज्ञान से अधर्म की बात श्रुति में नहीं कही गई और जिसका उल्लेख नहीं किया जाता उससे न तो कोई दोष ही लगता है और न ही वह अभ्युदय का कारण होती है, जैसे—हिक्कित, श्वसित, कण्डूयित इत्यादि क्रियायें । अतः व्याकरणाध्ययन काम्य कर्म भी है । नागेश के अनुसार यहाँ प्रयोजन शब्द प्रयोजक का भी वाचक है। क्या कोई श्रुति अथवा स्मृति वाक्य व्याकरणाध्ययन का प्रयोजक भी है या नहीं, यह प्रश्न का आशय है। "रक्षोहागम०" इत्यादि प्रयोजनों में 'आगम' पद का उपादान इस व्याख्यान को पुष्ट करता है । "रक्षोहागमलध्वसन्देहाः" में बहुवचनान्त द्वन्द्व होने पर भी "प्रयोजनम्" पद एकवचनान्त है । इसकी सिद्धि "नपुंसकमनपुंसकेनेकवच्चास्यान्तरस्याम्" इस शास्त्र से विकल्प से होती है । अभाव पक्ष में प्रयोजनानि पद सिद्ध होगा । वेद परम्परा से रक्षित होते हुए स्वरादिदोष से हीन नितान्त शुद्ध रूप में उपलब्ध होते रहे हैं । उनकी रक्षा के लिए लोप, आगम, वर्णविकारादि का ज्ञान अपरिहार्य है । क्योंकि ये सब वेद में उपलब्ध होते हैं और इनके स्वरूप से अपरिचित अवैयाकरण इन्हें देखकर भ्रान्त हो सकता है । "देवा अदुह्र" इत्यादि स्थलों में "लोपस्त आत्मनेपदेषु" सूत्र से 'त' का लोप हुआ है और "बहुलं छन्दसि" सूत्र से रुट् का आगम हुआ है । "उद्ग्राभं च निग्राभम्" इस स्थल में "हृग्रहोर्भश्छन्दसि हस्येति वक्तव्यम्" इस वार्त्तिक से ह् को भ् आदेश हुआ । यह वर्णविकार का उदाहरण है । जिस याग में उपदिष्ट इतिकर्त्तव्यता यागान्तर की उपजीव्य बनती है, वह प्रकृतियाग कहलाता है, अर्थात् प्रकृतियाग में उसकी इतिकर्त्तव्यता पूर्णरूप से निर्दिष्ट होती है । जिस याग में वह "प्रकृतिवद् विकृतिः कर्त्तव्या" इस नियम से प्रकृति याग से ली जाती है, उसे विकृतियाग कहते हैं। इस प्रकार प्रकृतियाग में विनियुक्त पदों का विकृतियाग के सन्दर्भ के अनुसार विपरिणाम 'ऊह' कहलाता है । आग्नेय मन्त्र "अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि" का "सौर्यं चरुं निर्वपेद् ब्रह्मवर्च- सकामः" इस अर्थवाद वाक्य से प्रेरणा लेकर सौर्य चरु का निर्वपन करने की इच्छा से "सूर्याय त्वा जुष्टं निर्वपामि" इस रूप में परिवर्त्तन किया जाता है। इस प्रकार का परिवर्त्तन प्रकृतिप्रत्ययविभागज्ञ ही कर सकता है । नागेश ने उद्योत में ऊह ज्ञान का फल बताते हुए कहा है कि "ऊहज्ञस्य हि आर्त्विज्यलाभेन द्रव्य- प्राप्तिद्वारा ऐहिकसुखसिद्धिः फलमिति बोध्यम् ।" आगम व्याकरणाध्ययन के नित्यकर्मत्व का प्रयोजक है । ब्राह्मण को इष्ट प्रयोजनों की अपेक्षा न करके धर्मस्वरूप षडङ्ग वेद का अध्ययन करना चाहिए ।