व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० महाभाष्यम् वेद के ये छः अङ्ग शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष् हैं । व्याकरण इनमें मुख्य होने के कारण मुखस्थानीय है—“मुखं व्याकरणं स्मृतम् ।” अध्ययन-अध्यापन और यजन-याजन ब्राह्मण की वृत्ति है । शब्दज्ञान किये बिना अध्यापन नहीं किया जा सकता । इसलिए ब्राह्मण को शब्दज्ञान अवश्य करना चाहिए । केवल साधु शब्द का उत्सर्गापवाद रीति से अन्वाख्यान करने के कारण व्याकरण शब्दज्ञान का लघु उपाय है । स्वर विषयक ज्ञान के अभाव में 'स्थूलपृषती' इत्यादि पदों में अवैयाकरण को सन्देह उत्पन्न हो जाता है क्योंकि पूर्व स्वर पर उदात्त होने पर इस प्रकार के सन्देह का अपाकरण व्याकरण ज्ञान से ही हो सकता है । 'असन्देह' पद से यहां सन्देह का प्रागभाव ही कैयट को अभीप्सित है । कैयट के इस कथन पर और व्याख्यान करते हुए नागेश का कथन है कि अत्यन्ताभाव नित्य है, अतः वह यहाँ अभीप्सित नहीं हो सकता । ध्वंसाभाव भी इसलिए नहीं हो सकता कि तत्तद्विषयक व्याकरण ज्ञान से युक्त व्यक्ति में सन्देह की सम्भावना ही नहीं होती । मूलम् — इमानि च भूयः शब्दानुशासनस्य प्रयोजनानि — तेऽसुराः । दुष्टः शब्दः । यदधीतम् । यस्तु प्रयुङ्क्ते । अविद्वांसः । विभक्ति कुर्वन्ति । यो वा इमाम् । चत्वारि । उत त्वः । सक्तुमिव । सारस्वतीम् । दशम्यां पुत्रस्य । सुदेवो असि वरुणेति । प्रदीपः—मुख्यानि प्रयोजनानि प्रदर्श्यानुषङ्गिकाणि प्रदर्शयति—इमानि चेति । भूय इति । पुनरित्यर्थः । आनुषङ्गिकत्वाच्चैषां वर्गद्वयोपादानम् । अनुवाद—पुनः ये भी शब्दानुशासन के प्रयोजन हैं— तेऽसुराः । दुष्टः शब्दः । यदधीतम् । यस्तु प्रयुङ्क्ते । अविद्वांसः । विभक्ति कुर्वन्ति । यो वा इमाम् । चत्वारि । उत त्वः । सक्तुमिव । सारस्वतीम् । दशम्यां पुत्रस्य । सुदेवो असि वरुण । उषा—रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असन्देह व्याकरणाध्ययन के मुख्य प्रयोजन हैं । इनकी मुख्यता पद और पदार्थ के ज्ञान के अधीन होने के कारण है, अर्थात् इन पाँचों का सम्बन्ध व्याकरण की प्रायोगिक उपयोगिता से है । इसलिए इनका अभिधान पहले किया गया है । इसके पश्चात् व्याकरण के आनुषङ्गिक प्रयोजनों का विवेचन है । आनुषङ्गिक अथवा गौण प्रयोजनों के रूप में “तेऽसुराः” इत्यादि तेरह प्रयोजनों का परिगणन किया गया है । बाह्य साक्ष्यों के आधार पर साधु शब्द प्रयोग के विधान तथा असाधु शब्द प्रयोग के निषेध के कारण ही इनकी आनुषङ्गिकता है । मुख्य और गौण का भेद होने के कारण ही इन्हें दो वर्गों में विभाजित करके प्रस्तुत किया गया है । मूलम् — तेऽसुराः— तेऽसुरा हेलयो हेलय इति कुर्वन्तः पराबभूवुः । तस्माद् ब्राह्मणेन न