व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) १३ तस्मादनर्थकं माधिगीष्महीत्यध्येयं व्याकरणम् । यदधीतम् प्रदीपः—अविज्ञातमिति । अविदितस्वरादिसंस्कारत्वादर्थापरिज्ञानाद् वा । निगदेनेति । पाठमात्रेण । न तज्ज्वलतीति । निष्फलं भवति । अनर्थकमिति । निष्प्रयोजनम् अनुवाद—जो (मन्त्रादि) (पाठ मात्र से) अध्ययन तो किया (परन्तु उसे) जाना नहीं, केवल पाठमात्र से ही उच्चारण किया, अग्नि के अभाव में सूखे ईंधन के समान वह कभी भी जलता नहीं । (हम) अनर्थक अध्ययन न करें इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । यदधीतम् । उषा—यहाँ 'अधीत' पद का सम्बन्ध शब्दात्मक ज्ञान से है । "अविज्ञात" पद का सम्बन्ध प्रकृतिप्रत्ययादि संस्कार तथा अर्थात्मक विज्ञान की हीनता से है । शब्दात्मक ज्ञान प्राप्त करके भी यदि अर्थरूप से ज्ञान प्राप्त न किया जाये तो अग्निहीन सूखे ईंधन के समान वह प्रकाशित नहीं कर सकता । इसलिए अर्थज्ञान का ही प्राधान्य है । स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा ॥ यह श्रुतिवाक्य भी अर्थज्ञानपूर्वक शब्दाध्ययन का आदेश देता है । हमारा अध्ययन भी निषिद्ध अथवा अनर्थक न हो, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि व्याकरण ही शब्द के प्रकृतिप्रत्ययविभाग का अन्वाख्यान करके अर्थप्राप्ति में सहायक होता है । मूलम्—यस्तु प्रयुङ्क्ते— यस्तु प्रयुङ्क्ते कुशलो विशेषे शब्दान्यथावद् व्यवहारकाले । सोऽनन्तमाप्नोति जयं परत्र वाग्योगविद् दुष्यति चापशब्दैः ॥ कः ? वाग्योगविदेव । कुत एतत् ? यो हि शब्दान्जानात्यपशब्दानप्यसौ जानाति । यथैव हि शब्दज्ञाने धर्मः, एवमपशब्दज्ञानेऽप्यधर्मः । अथवा भूयानधर्मः प्राप्नोति । भूयांसोऽपशब्दाः, अल्पी- यांसः शब्दा इति । एकैकस्य हि शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशाः । अथ योऽवाग्योगवित् । अज्ञानं तस्य शरणम् । विषम उपन्यासः । नात्यन्तायाज्ञानं शरणं भवितुमर्हति । यो ह्यजानन्वै