भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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१२ महाभाष्यम् शत्रुर्भवेत्यत्रार्थे प्रतिपाद्येऽन्तोदात्ते प्रयोक्तव्य आद्युदात्त ऋत्विजा प्रयुक्त इत्यर्थान्तरा- भिधानादिन्द्र एव वृत्रस्य शातयिता सम्पन्नः । इन्द्रशत्रुत्वस्य च विधेयत्वात्सम्बोधन- विभक्तेरनुवाद्यविषयत्वाददिहाभावः । यथा—राजा भव युध्यस्वेति । ऊह्यमानस्य चामन्त्रत्वादयज्ञकर्मणीति जपादिपर्युदासेन मन्त्राणामेकश्रुतिर्विधीयमानेह न भवति । अनुवाद -- स्वर अथवा वर्ण से मिथ्या प्रयुक्त, दूषित शब्द (अपशब्द) उस (विवक्षित) अर्थ को नहीं कहता । वह वाणी रूप वज्र यजमान को मार देता है जैसे इन्द्रशत्रु (वृत्र) स्वर के अपराध से मारा गया । (हम) दूषित शब्दों का प्रयोग न करें इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । दुष्टः शब्दः । उषा—वक्ता जिस अर्थभावना का श्रोता में संचार करने के लिए शब्दों का प्रयोग करता है, स्वर अथवा वर्ण से दूषित शब्द उस अर्थभावना को व्यक्त नहीं कर पाते । आत्मीय जन को सम्बोधन करने के लिए 'स्वजन' शब्द का प्रयोग करता हुआ शकार 'श्वजन' कह बैठता है । कभी-कभी तो यह स्वर अथवा वर्णदोष विल्कुल विपरीत अर्थभावना को लेकर उपस्थित होता है । वह वाणी रूपी वज्र यजमान का नाश कर डालता है । कथा प्रसिद्ध है कि त्वष्टा के पुत्र का इन्द्र ने वध कर दिया । त्वष्टा ने प्रतिशोध की भावना से इन्द्र को मारने के लिये अभिचार- याग किया । इस याग में "इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व" इस मन्त्र का ऊह किया गया । इसका अभिप्राय है कि "इन्द्र का शातयिता वृद्धि को प्राप्त हो" विवक्षित अर्थ की सिद्धि तभी हो सकती है जबकि "इन्द्रशत्रु' शब्द को तत्पुरुष समास बनाकर अन्तोदात्त पढ़ा जाये । परन्तु पुरोहित ने प्रमाद से उसे पूर्वपद के प्रकृतिस्वर से युक्त पढ़ दिया । परिणामतः बहुव्रीहि समास होकर "इन्द्र है शातयिता जिसका, वह वृद्धि को प्राप्त हो," इस अर्थ का वाचक हो गया । फलस्वरूप वृत्र उत्पन्न होते ही इन्द्र के द्वारा मार डाला गया । इस मन्त्र का वास्तविक पाठ "मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा..." इस प्रकार है । भाष्य में प्रसिद्ध पाठ को बदलकर "दुष्टः शब्दः स्वरतो०" इस प्रकार पढ़ा गया है । इसका प्रयोजन उद्योतकार के अनुसार मन्त्रस्थ 'मन्त्र' शब्द की शब्दमात्रपरता सूचित करना है । हम इस प्रकार के दूषित शब्दों का प्रयोग न करें, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए— यद्यपि बहु नाधीषे पठ पुत्र तथापि व्याकरणम् । स्वजनः श्वजनो मा भूत्सकलः शकलः सकृच्छकृत् ॥ मूलम् —यदधीतम्— यदधीतमविज्ञातं निगदेनैव शब्द्यते । अनग्नाविव शुष्कँधो न तज्ज्वलति कर्हिचित् ॥