भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 96 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

१६ महाभाष्यम् प्रक्रिया में अपशब्द का ज्ञान भी होता ही है और शब्दज्ञान जिस प्रकार से धर्म का हेतु है उसी प्रकार अपशब्दज्ञान अधर्म का कारण होगा और क्योंकि अपशब्द अधिक है अतः वह अधिक दोष से युक्त होगा । इसके विपरीत जो शब्दों का प्रयोग नहीं जानता उसके प्रयोग अज्ञानावस्था में किये जाने के कारण क्षम्य होंगे । अतः वाग्योगवित् ही दूषित होता है । परन्तु पूर्वपक्षी के ये दोनों ही तर्क सिद्धान्ती को स्वीकार्य नहीं हुए । शब्द- ज्ञान तो धर्म का हेतु होता है परन्तु अपशब्दज्ञान से अधर्म प्राप्ति में कोई भी श्रुति प्रमाणरूप में उपस्थापित नहीं की जा सकती । यही बात आगे “कि पुनः शब्दस्य ज्ञाने धर्मः ग्राहोस्वित्प्रयोगे" इस वार्त्तिक के व्याख्यान में विस्तार से प्रतिपादित है । जहाँ तक अवाग्योगवित् के अज्ञानशरण होने की बात है, वह भी इसलिए स्वीकार्य नहीं हो सकती क्योंकि अज्ञानावस्था में किये गये ब्रह्महत्या आदि पाप भी दोष के कारण होते ही हैं । इसलिए वाग्योगवित् के साथ 'दुष्यति' का अन्वय नहीं किया जा सकता । वाग्योगवित् साधु शब्दों के ज्ञानपूर्वक प्रयोग से विजय को प्राप्त करता है, अवाग्योगवित् असाधु शब्दों के प्रयोग से दूषित होता है । यही बात कात्यायन प्रणीत भ्राज नामक श्लोकों में भी कही गई है । सौत्रामणि याग में किञ्चित् सुरापान के विधान को लेकर कहे गये— यदुदुम्बरवर्णानां घटीनां मण्डलं महत् । पीतं न गमयेत्स्वर्गं किं तत्क्रतुगतं नयेत् ॥ इस श्लोक की तरह कात्यायन प्रणीत श्लोक प्रमत्तगीत नहीं हैं । मूलम्— अविद्वांसः— अविद्वांसः प्रत्यभिवादे नाम्नो ये न प्लुतिं विदुः । कामं तेषु तु विप्रोष्य स्त्रीष्विवायमहं वदेत् ॥ अभिवादे स्त्रीवन्मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । अविद्वांसः । प्रदीपः—स्त्रीष्विवेति । प्रत्यभिवादे हि गुरुणा प्लुतः कार्यः । यस्तु प्लुतं कर्तुं न जानाति स स्त्रीवद्वक्तव्योऽयमह्मिति; न "अभिवादये देवदत्तोऽहम्" इत्यादिना संस्कृतवाक्येनेत्यर्थः । अनुवाद—जो अविद्वान् प्रत्यभिवादन में नाम को प्लुत करना नहीं जानता, बाहर से आने पर भले ही उनके प्रति स्त्रियों की तरह "अयमहम्" इस प्रकार से कहे (अभिवादन करे) । अभिवादन में हम स्त्रियों की तरह न हो जायें, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । अविद्वांसः । उषा—मनुस्मृति में कहा गया है कि वृद्ध पुरुष के प्रवेश करने पर युवक के प्राण ऊपर की ओर उत्क्रमित होते हैं । वृद्ध को प्रणाम करके वह उन्हें पुनः प्राप्त