भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) १७ कर लेता है (मनु० २।२०) । अभिवादन प्रकार के विषय में मनु का कथन है कि युवा अभिवादन करने के पश्चात् “अमुकनामाऽहं भोः” ऐसा कहे । (अभिवादये शुभशर्माऽहं भोः) । प्रत्यभिवादन में ब्राह्मण अभिवादनकर्त्ता को पूर्वाक्षर प्लुत करके आशीर्वाद दे— आयुष्मान्भव सौम्येति वाच्यो विप्रोऽभिवादने । अकारश्चास्य नाम्नोऽन्ते वाच्यः पूर्वाक्षरः प्लुतः ॥ २।१२५ प्रत्यभिवादन में जो लोग नाम को प्लुत करना नहीं जानते उन्हें स्त्रियों के समान “अयमहर्माभिवादये” इस प्रकार ही कहकर अभिवादन करना चाहिए— नामधेयस्य ये केचिदभिवादं न जानते । तान्प्राज्ञोऽहमिति ब्रूयात्स्त्रियः सर्वास्तथैव च ॥ २।१२३ पाणिनि ने भी शूद्रविषयक प्रत्यभिवादन से अतिरिक्त वाक्य की 'टि' को प्लुत करने का विधान किया था — “प्रत्यभिवादेऽशूद्रे” (अष्टा० ८।२।८३) । 'टि', 'प्लुत' आदि का ज्ञान व्याकरण से ही होता है। हमारे साथ भी प्रत्यभिवादन विधि का ज्ञान न होने के कारण स्त्रियों की तरह व्यवहार न हो इसलिए हमें भी इस प्रकार के नियमों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । मूलम्—विभक्तिं कुर्वन्ति— याज्ञिकाः पठन्ति—"प्रयाजाः सविभक्तिकाः कार्याः" इति । न चान्तरेण व्याकरणं प्रयाजाः सविभक्तिकाः शक्याः कर्तुम् । विभक्तिं कुर्वन्ति । प्रदीपः—प्रयाजा इति । प्रयाजमन्त्रा ऊह्यमानाग्निशब्दप्रकृतिकविभक्तियुक्ता इत्यर्थः । यथा समिधः समिधोऽग्न आज्यस्य व्यन्तु अग्नेऽग्न इति । अनुवाद — मीमांसक कहते हैं—"प्रयाज मन्त्रों को विभक्तियुक्त करना चाहिए (करके पढ़ना चाहिए) । और व्याकरण (के ज्ञान) के बिना प्रयाजों को सविभक्तिक नहीं किया जा सकता । विभक्तिं कुर्वन्ति । उषा—यद्यपि प्रयाजमन्त्र विभक्तिसहित ही पढ़े गये हैं तथापि आधान के अनन्तर यदि कोई विघ्न उपस्थित हो जाये तो पुनराधेय इष्टि करनी पड़ती है । ऐसी परिस्थिति के लिये ही इस शास्त्र का आरम्भ किया गया है । "त्वमेव प्रयाजानुयाजानां पुरस्तात्तवं पश्चात्" इत्यादि वेदमन्त्र में प्रकृतिभूत अग्नि शब्द को श्रौत सम्प्रदाय के अनुसार प्रथमा, द्वितीया, तृतीया षष्ठी और सप्तमी विभक्ति से युक्त करके पढ़ा जाता है। आपस्तम्ब के अनुसार प्रथम चार को विभक्तियुक्त किया जाता है, अन्तिम को नहीं। व्याकरण ज्ञान के बिना इस प्रकार से प्रयाजों को विभक्तियुक्त कर पाना सम्भव नहीं है ।

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