भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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२० महाभाष्यम् अन्य (व्यथित) कहता है— वाणी चार पदों में परिच्छिन्न है। उन्हें (चार पदों को) मनीषी ब्राह्मण जानते हैं। (उनके) तीन भाग गुहा में निहित हैं (जो) चेष्टा नहीं करते। मनुष्य (अवैयाकरण) (तो) उनका चतुर्थ भाग ही बोलते हैं। 'वाणी चार पदों में परिच्छिन्न है', (यह) वाणी के चार पदों नाम, आख्यात, उपसर्ग, निपात (का वाचक है)। जो मनीषी ब्राह्मण हैं, (वे) उन्हें जानते हैं। मन के वशीकर्त्ता मनीषी हैं। 'गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति' (का अर्थ है कि) (उनमें से) तीन गुहा में निहित चेष्टा नहीं करते, झपकते नहीं। यह वाणी का तुरीय अर्थात् चतुर्थ भाग है जो (साधारण) मनुष्यों में रहता है। चत्वारि। उषा—ऋग्वेद के इस मन्त्र की व्याख्या यास्क ने अपने निरुक्त में भी की है परन्तु उसका विवेचन देवयज्ञ को लक्ष्य बनाकर प्रवृत्त हुआ है। पतञ्जलि ने यहाँ शब्द का वृषभ के रूप में निरूपण किया है। शब्द रूप वह महान् देव मर्त्यधर्मा मनुष्यों में उनके आर्थिक व्यवहारों के सम्पादन के लिए आविर्भूत हुआ है— इदमन्धं तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम् । यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यति ॥ (काव्यादर्श १।४) उस महान् वृषभ रूप शब्द के नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चार सींग हैं। "नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्च" में अनुक्तसमुच्चयार्थक चकार के अर्थ को ग्रहण करके नागेश ने इनका विवेचन परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप में भी किया है। अभ्यासार्थक √म्ना से व्युत्पन्न नाम शब्द सुबन्तका तथा आख्यात शब्द तिङन्त का वाचक है। उपसर्ग और निपात का पृथगुपादान गोबलीवर्दन्‍याय से किया गया है। तीन पादों से इसके तीन काल भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् वाच्य हैं। वर्त्तमान काल लट् लकार का विषय है, भूतकाल लिट्, लङ् और लुङ् लकारों से वाच्य होता है, लुट् और लृट् लकार भविष्यत् के विषय हैं। "द्वे शीर्षे" पद का व्याख्यान शब्द की नित्य और कार्य रूप दो अवस्थाओं को आधार बनाकर किया गया है। नित्य शब्द स्फोट रूप तथा व्यंग्य है, कार्य शब्द ध्वनि रूप तथा स्फोट का व्यंजक है। भर्तृहरि ने शब्द के इन दो रूपों का व्याख्यान इस वारिका में किया है— द्वावुपादानशब्देषु शब्दौ शब्दविदो विदुः । एको निमित्तं शब्दानाम्अपरोऽर्थे प्रयुज्यते ॥ सात हाथ इसकी सात विभक्तियों के वाचक हैं। सम्बन्ध के कारकों में परिगणित न होने के कारण कारकों की सात विभक्तियों के रूप में उद्भावना नहीं की जा सकती, कारक छः ही होते हैं। वह उरस्, कण्ठ और शिर रूप तीन