भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २१ स्थानों में बद्ध है। इस प्रकार के महान् शब्दब्रह्म रूप देव के साथ सायुज्य प्राप्ति की बात भर्तृहरि ने इस प्रकार की थी— अपि प्रयोक्तुरात्मानं शब्दमन्तरवस्थितम् । प्राहुर्महान्तमृषभं येन सायुज्यमिष्यते ॥ एक अन्य मन्त्र में भी वाणी का पदविभाजन चार रूपों में किया गया है । मनीषी लोग नाम, आख्यात, उपसर्ग और निपात रूप चारों विभागों में विभक्त पदों की परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप चारों स्थितियों को जानते हैं । परा वाङ्मूलचक्रस्था पश्यन्ती नाभिसंस्थिता । हृदिस्था मध्यमा ज्ञेया वैखरी कण्ठदेशगा ॥ इनमें से परा, पश्यन्ती और मध्यमा रूप प्रथम तीन ज्ञान-सामान्य का विषय नहीं हो सकतीं । केवल वैयाकरण ही उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं । साधारण मनुष्य केवल वैखरी रूप चतुर्थ भाग को ही जानते हैं क्योंकि यही सामान्य व्यक्ति के ज्ञान का विषय है । अन्यत्र भर्तृहरि ने वाणी के तीन रूपों की ही चर्चा की है— वैखर्या मध्यमायाश्च पश्यन्त्याश्चैतदद्भुतम् । अनेकतीर्थभेदायास्त्रय्या वाचः परं पदम् ॥ उनके अनुसार परा रूप वाणी व्याकरण के विवेचन का विषय नहीं बनती । मूलम्—उत त्वः— “उत त्वः पश्यन्न ददर्श वाच- मुत त्वः शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे जायेव पत्य उशती सुवासाः ॥” उत त्वः अपि खल्वेकः पश्यन्नपि न पश्यति । अपि खल्वेकः शृण्वन्नपि न शृणोत्येनामिति । अविद्वांसमाहार्धम् । उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे तनुं विवृणुते । जायेव पत्य उशती सुवासाः । तद्यथा जाया पत्ये कामयमाना सुवासाः स्वमात्मानं विवृणुते, एवं वाग्योगविदे स्वात्मानं विवृणुते । वाङ्नो विवृणुयादात्मानमित्यध्येयं व्याकरणम् । उत त्वः । प्रदीपः—उत त्व इति । त्वशब्दोऽन्यवाची । उतशब्दोऽपि शब्दस्यार्थे । स च भिन्नक्रमः । प्रत्यक्षेण शब्दस्वरूपमुपलभमानोऽप्यर्थापरिज्ञानान्न पश्यतीत्यर्थः । उतो इति । उत उ इति निपातसमाहारः अविद्वांसमाहार्धमिति । अविद्वल्लक्षण- मर्थमर्धचं आहेत्यर्थः । अनुवाद—“कोई एक देखता हुआ भी वाणी को नहीं देखता, कोई एक सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता । किसी अन्य एक के लिए (वाणी) पति के सम्मुख शुभ्र वस्त्र धारण किये हुए कामयमाना पत्नी के समान अपने शरीर को अनावृत कर देती है ।”