भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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कोई एक (मनुष्य) देखता हुआ भी वाणी को नहीं देखता है, कोई एक सुनता हुआ भी इसे नहीं सुनता है । यह आधा भाग अविद्वान् के विषय में कहा है । 'उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे' (का अभिप्राय है कि) अन्य एक के लिए वह अपने शरीर को अनावृत कर देती है, जैसे सुन्दर वस्त्र धारण करने वाली कामयमाना पत्नी पति के सम्मुख अपने शरीर को अनावृत कर देती है । वाणी हमारे सम्मुख भी (इसी प्रकार) अपने को अनावृत कर दे, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । उत त्वः । उषा :—प्रस्तुत वैदिक ऋचा वाक्तत्त्व की एवं अर्थतत्त्व की अवश्यं- प्रापणीयता की ओर संकेत करती है । वाणी का फल अर्थपरिज्ञान है और अर्थ की प्राप्ति यदि नहीं होती तो शब्दज्ञान भी महत्त्वहीन होकर रह जाता है । अर्थात्मक विज्ञान से हीन होने पर अध्ययन में अभ्यस्त तथा तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्ति भी वाक्तत्त्व का दर्शन नहीं कर पाता । दूसरा व्यक्ति वाणी को सुनता हुआ भी यथार्थ में नहीं सुन पाता क्योंकि अर्थज्ञान की हीनता की स्थिति में वह श्रवण भी अर्थहीन होकर रह जाता है । क्योंकि अर्थतत्त्व वस्तुतः वाक्तत्त्व का शरीर है और वाक्तत्त्व और अर्थ- तत्त्व की आत्मा, अतः एक अन्य व्यक्ति जिसने वाक्तत्त्व का सम्यक् अध्ययन तथा अर्थतत्त्व का अनुशीलन किया है, उसके सम्मुख वाणी अपने शरीर को उसी प्रकार से अनावृत कर देती है जैसे ऋतुकाल के उपरान्त सद्यः स्नाता स्त्री अपने स्वरूप को पति के सम्मुख प्रकट कर देती है । प्रकृति प्रत्ययादि के ज्ञान से युक्त वह वैयाकरण वाणी के अर्थ को सम्यक् ग्रहण करके उसका दर्शन और श्रवण करता है । यह वाणी हमारे सम्मुख भी उसी प्रकार से अनावृत और प्रकाशित हो जाये, इसलिए व्याकरण का अध्ययन अपरिहार्य है । विसस्रे—वि + √सृ + लिट् प्र०पु० एक व० । उशती—√वश् + शतृ + ङीष् । मूलम्—सक्तुमिव— “सक्तुमिव तितउना पुनन्तो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत । अत्रा सखायः सख्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि ॥” सक्तु—सचतेर्दुर्भावो भवति । कसतेर्वा विपरीताद् विकसितो भवति । तितउ परिपवनं भवति—ततवद्वा तुन्नवद्वा । धीरा ध्यानवन्तः । मनसा प्रज्ञानेन । वाचमक्रत वाचमकृषत । अत्र सखायः सख्यानि जानते । अत्र सखायः सन्तः सख्यानि जानते । क्व ?