व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २३ य एष दुर्गो मार्गः, एकगम्यो वाग्विषयः । के पुनस्ते ? वैयाकरणाः । कुत एतत् ? भद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधिवाचि । एषां वाचि भद्रा लक्ष्मीर्निहिता भवति । लक्ष्मीर्लक्षणाद्भासनात्परिवृढा भवति । सक्तुमिव । प्रदीपः—सचतेरिति । षच सेचन इत्यस्य । दुर्धाव इति । दुःशोधः । यथा तितउना सक्तोस्तुषाद्यपनीयते तथा व्याकरणेन वाचोऽपशब्दा इत्यर्थः । कसतेरिति । पृषोदरादित्वादवर्णव्यत्ययः । ततवदिति । विस्तारयुक्तमित्यर्थः । तुन्नवदिति । बहुच्छिद्रम् धीरा इति । वैयाकरणाः । वाचमक्रतेति । अपशब्दभ्यो विविक्तां कृतवन्तः । मन्त्रे घसेति च्लेर्लुकि सत्यक्रतेति रूपम् । अत्रा सखाय इति । ऋचि तुनुघेति दीर्घः । सखायः समानख्यातयो भेदग्रहस्य निवृत्तत्वात्सर्वमेकमिति मन्यन्ते । सख्यानीति । सायुज्यानीत्यर्थः । एकगम्य इति । ज्ञानेनैव प्राप्यः । वाचीति । वेदाख्ये ब्रह्मणि या लक्ष्मीर्वेदान्तेषु परमार्थसंविल्लक्षणोक्ता सैषां निहितेत्यर्थः । अनुवाद—"पवित्र से सत्तू के समान जहाँ धीर लोग मन से पुनकर वाणी का व्याकरण करते हैं वहाँ समान ख्याति वाले मनुष्य सायुज्य का अनुभव करते हैं । कल्याणमयी लक्ष्मी इनकी वाणी में निहित होती है ।" 'सक्तुः' सच धातु से बना है (क्योंकि) इसे धोना कठिन होता है । अथवा कस् धातु से आद्यन्तविपर्यय करके (क्योंकि) विकसित होता है । 'तितउ' पवित्र (छलनी) को कहते हैं (क्योंकि) यह विस्तार वाली होती है, अथवा छिद्रों वाली होती है । धीर (वे हैं जो) ध्यानवान् होते हैं । मनसा (का अर्थ है) प्रकृष्ट ज्ञान से । वाचमक्रत (अर्थात्) वाणी को व्याकृत किया । यहाँ समान ख्याति वाले होकर सायुज्य का अनुभव करते हैं । कहाँ ? यह जो दुर्गम, एकमात्रगम्य वाणी का मार्ग है । वे कौन हैं ? वैयाकरण । यह कैसे (कहा) ? (क्योंकि) इनकी वाणी में कल्याणमयी लक्ष्मी निहित होती है । लक्ष्मी (वह है जो) लक्षण करती है (अर्थात्) चमकती है (अपि च) विस्तार वाली होती है । सक्तुमिव । उषा—प्रस्तुत मन्त्र व्याकरण के मोक्षजनकत्व का ज्ञापक है । छलनी से जिस प्रकार सत्तूओं को शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार से वैयाकरण व्याकरण के