भारतकोश
व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

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२४ महाभाष्यम् प्रकृष्ट ज्ञान से शब्दों का संस्कार करते हैं। शब्द-अपशब्द का विवेक होने के कारण वे केवल साधु शब्दों का प्रयोग करते हैं और अपशब्दों का परिहार करते हैं। इस प्रकार सुशब्द के ज्ञानपूर्वक प्रयोग करने से वे वाक्तत्त्व के साथ सायुज्य को प्राप्त करते हैं। इससे उनकी द्वैतबुद्धि मिट जाती है, अद्वैतभाव उत्पन्न हो जाने के कारण वे सम्पूर्ण जगत् को शब्दब्रह्ममय अनुभव करते हैं, अतश्च वे भी ब्रह्ममय ही हो जाते हैं, क्योंकि "तज्ज्ञात्वा तदेव भवति" ऐसा श्रुति में कहा गया है । कैयट ने यहाँ कहा है कि वेदब्रह्म में जिसे लक्ष्मी कहा गया है तथा वेदान्त दर्शन में जो परमार्थसंविल्लक्षणा सिद्धि के नाम से व्याख्यात हुई है, वही लक्ष्मी वैयाकरणों की वाणी में निहित है। नागेश ने इसका भाव स्पष्ट करते हुए इसका सम्बन्ध उस शब्दब्रह्म से स्थापित किया है जो अर्थतत्त्व के साथ अभिन्नता को प्राप्त कर अद्वैत रूप में स्थित है। ब्रह्मतत्त्व की प्राप्ति का उपाय निर्विकल्प समाधि है, इसके कठिनता से प्राप्त हो सकने के कारण ही इसे (वाणी के मार्ग को) "दुर्गो मार्ग एकगम्यो..." कहा गया है। "एकगम्यः" से अभिप्राय है कि इसकी (ब्रह्मतत्त्व की) प्राप्ति का और कोई उपाय भी सम्भव नहीं—"नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ।" भाष्यकार ने 'तितउ' शब्द का नपुंसकलिंग में प्रयोग किया है, जबकि अन्यत्र अमरकोश में यह पुंल्लिंग पढ़ा गया है— "चालनी तितउः पुमान् ।" मूलम्—सारस्वतीम्— याज्ञिकाः पठन्ति—"आहिताग्निरपशब्दं प्रयुज्य प्रायश्चित्तीयां सारस्वती- मिष्टिं निर्वपेद्" इति । प्रायश्चित्तीया मा भूमेत्यध्येयं व्याकरणम् । सारस्वतीम् । प्रदीपः — प्रायश्चित्तीयामिति । भवार्थे वृद्धाच्छः । प्रायश्चित्तीया इति । प्रायश्चित्ताय पापशोधनाय श्रुतिस्मृतिविहिताय कर्मणे हितास्तन्निमित्तोपादाना मा भूमेत्यर्थः । अनुवाद—मीमांसक पढ़ते हैं कि "अग्न्याधान करके अपशब्द का प्रयोग (करने पर) प्रायश्चित्त स्वरूप सारस्वती इष्टि का सम्पादन करे।" (हमें) प्रायश्चित्त न करना पड़े इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सारस्वतीम् । उषा—भाष्यस्थ "आहिताग्निः" शब्द के अनन्तर 'यज्ञमध्ये' शब्द का अध्याहार करना होगा। अर्थात् वह पुरुष जिसने अग्न्याधान किया है, यदि वह यज्ञ में अपशब्द का प्रयोग करता है तो उस पाप के प्रक्षालन के लिए सारस्वती इष्टि का निर्वाप करना पड़ता है। हमें आहिताग्नि होने पर अपशब्द के प्रयोग से पाप प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित्त ही न करना पड़े, इसलिए हमें व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए।