व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २५ "दुष्टः शब्दः", 'यस्तु प्रयुङ्क्ते" इत्यादि अन्य प्रयोजनों में यद्यपि अपशब्द के प्रयोग से होने वाले दोष की ओर संकेत किया गया है तथापि यहाँ यज्ञ में अपशब्द के प्रयोग से होने वाले दोष का पृथक् आख्यान किया गया है क्योंकि यज्ञ में अपशब्द का प्रयोग करने से यज्ञ और पुरुष दोनों को ही दोष लगता है, जबकि अन्यत्र दोषभाक् केवल पुरुष ही होता है । "आहिताग्नि" पद का उपादान प्रस्तुत निषेधवाक्य के यज्ञगत होने का संकेत देता है । प्रायश्चित्तीय शब्द में 'वृद्धाच्छः' सूत्र से 'छ' प्रत्यय हुआ है । मूलम् - दशम्यां पुत्रस्य- याज्ञिकाः पठन्ति-दशम्युत्तरकालं पुत्रस्य जातस्य नाम विदध्याद् घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थमवृद्धं त्रिपुरुषानूकमनरिप्रतिष्ठितम् । तद्धि प्रतिष्ठिततमं भवति । द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा नाम कृतं कुर्यान्न तद्धितम् इति । न चान्तरेण व्याकरणं कृतास्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम् । दशम्यां पुत्रस्य । प्रदीपः-दशम्युत्तरकालमिति । दशम्या उत्तर इति । पञ्चमीति योग- विभागात्समासः । ततः कालशब्देन बहुव्रीहिः । क्रियाविशेषणं चैतत् । दश दिनान्य- शौचं भवतीति दशम्युत्तरकालमित्युक्तम् । येऽपि गृह्यकाराः पठन्ति दशम्यां पुत्रस्येति, तैरपि दशम्यामिति सामीपिकमधिकरणं व्याख्येयम् । घोषवदादीति । घोषवन्तो ये वर्णाः शिक्षायां प्रदर्शितास्तदादि । अन्तरन्तःस्थमिति । मध्ये यरलवा यस्य तदित्यर्थः । त्रिपुरुषानूकमिति । नामकरणे योऽधिकारी पिता तस्या ये त्रयः पुरुषास्ताननुकायत्यभिधत्त इति त्रिपुरुषानूकम् । अन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः । अनुवाद - मीमांसक कहते हैं-"दशमी (रात्रि) के अनन्तर उत्पन्न पुत्र का नामकरण करना चाहिए जो आदि में घोष वर्णं वाला हो, बीच में अन्तःस्थ वर्णं वाला हो, वृद्ध स्वरों (आदैच्) से युक्त न हो, जो (पिता के) तीन पूर्वपुरुषों के नाम का स्मरण कराता हो (तथा) जो शत्रु में प्रसिद्ध न हो । वह प्रतिष्ठिततम होता है । दो अक्षरों वाला अथवा चार अक्षरों वाला कृदन्त नाम करना चाहिए, तद्धित नहीं । व्याकरणाध्ययन के बिना कृदन्त अथवा तद्धित प्रत्ययों का विशिष्ट ज्ञान नहीं हो सकता । दशम्यां पुत्रस्य । उषा-नामकरण में भी व्याकरणाध्ययन का प्रयोजन है । वैदिक लोग जातकर्म संस्कार के अनन्तर बालक के नामकरण संस्कार का उल्लेख करते हैं । उत्पन्न पुत्र का दस दिन के उपरान्त नामकरण संस्कार किया जाना चाहिए । इससे पूर्व अशौच के कारण यह संस्कार नहीं किया जाता । मनुस्मृतिकार ने भी दसवें अथवा बारहवें दिन नामकरण का निर्देश किया है- नामधेयं दशम्यां तु द्वादश्यां वाऽस्य कारयेत् । मनु० २।३०. नाम के आदि में घोष वर्णं होना चाहिए (हशः संवारा नादा घोषाश्च) । नाम के मध्य में अन्तस्थ वर्णं होना चाहिए (यणोऽन्तस्थाः) । वृद्ध स्वरों से युक्त नाम नहीं