व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 96 में से
संदर्भ में पढ़ें२६ महाभाष्यम् होना चाहिए (वृद्धिरादैच्) । अपि च नामकरण के अधिकारी पिता के तीन पूर्व- पुरुषों का स्मरण कराने वाला तथा शत्रुकुल में अप्रसिद्ध नाम सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है । यह बहुत बड़ा न होकर दो अथवा चार अक्षरों का कृत्प्रत्ययांत होना चाहिए, तद्धितान्त नहीं । तद्धितान्त का निषेधमुखेन स्पष्ट उल्लेख यह बताता है कि तद्धितान्त नाम न केवल पुण्य-प्राप्ति में बाधक ही होता है प्रत्युत उससे अधर्म की प्राप्ति होती है । यह कृत् और तद्धित प्रत्ययों का ज्ञान व्याकरण के बिना नहीं हो सकता । मूलम्—सुदेवो असि— सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः । अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥ सुदेवो असि वरुण सत्यदेवोऽसि । यस्य ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयः । अनुक्षरन्ति काकुदम् । काकुदं तालु । काकुर्जिह्वा, साऽस्मिन्नुद्यत इति काकुदम् । सूम्यं सुषिरामिव । तद्यथा—शोभनामूर्मिं सुषिरामग्निरन्तः प्रविश्य दहति, एवं ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयस्ताल्वनुक्षरन्ति । तेनासि सत्यदेवः । सत्यदेवाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम् । सुदेवो असि । प्रदीपः—सुदेवो असीति । वरुणस्येयं स्तुतिः । यतो हेतोर्व्याकरणज्ञानाद्वरुण सत्यदेवोऽसि ततो हेतोरन्येऽपि सत्यदेवा भवन्तीत्यर्थः । सिन्धव इति । नद्य इव विभक्तय इत्यर्थः । अनुक्षरन्तीति । ताल्वनुप्राप्य प्रकाशन्त इत्यर्थः । सास्मिन्नुद्यत इति । अनेकार्थत्वाद्धातूनामुत्क्षिप्यत इत्यर्थः । सूर्म्यमिति । सूर्मीमिति प्राप्ते अमि पूर्व इत्यत्र वा छन्दसीत्यनुवृत्त्या यणादेशः । अनुवाद—'हे वरुण ! तुम सत्यदेव हो जिसकी सात नदियाँ (सात विभक्तियाँ) सच्छिद्रा लोहप्रतिमा में अग्नि की तरह तालु में बहती हैं ।' हे वरुण तुम सुदेव हो (अर्थात्) सत्यदेव हो, तुम्हारी सात नदियाँ सात विभक्तियाँ हैं। (वे) तालु में क्षरित होती हैं । काकुद तालु को कहते हैं (क्योंकि) काकु (नाम है) जिह्वा का (और) वह उसमें उठाकर लगाई जाती है इसलिए वह काकुद हैं । 'सूम्यं सुषिरामिव' (का तात्पर्य है) जैसे कि अग्नि सुन्दर सच्छिद्रा लोह प्रतिमा के अन्दर प्रविष्ट होकर जलाती है इसी प्रकार से तुम्हारी सात सिन्धु रूप सात विभक्तियाँ तालु में क्षरित होती हैं । इसी से तुम सत्यदेव हो । हम भी सत्य- देव हों, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सुदेवो असि । उषा—वरुण व्याकरणज्ञान से युक्त होने के कारण सत्यदेव है । अग्नि सुन्दर लौह प्रतिमा में जिस प्रकार प्रविष्ट होकर उसे प्रतिभासित करती है, उसी प्रकार से व्याकरण की सात विभक्तियाँ उसके तालु प्रदेश में प्रवाहित होती हुईं उसे सत्यदेव बनाती हैं । व्याकरणज्ञान से शब्दब्रह्म का प्रकाश प्राप्त कर साधक सांसारिक पापों से विमुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है—"शब्दब्रह्मणि