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व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)

Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary

महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished96 पृष्ठ

२६ महाभाष्यम् होना चाहिए (वृद्धिरादैच्) । अपि च नामकरण के अधिकारी पिता के तीन पूर्व- पुरुषों का स्मरण कराने वाला तथा शत्रुकुल में अप्रसिद्ध नाम सबसे अधिक प्रतिष्ठित होता है । यह बहुत बड़ा न होकर दो अथवा चार अक्षरों का कृत्प्रत्ययांत होना चाहिए, तद्धितान्त नहीं । तद्धितान्त का निषेधमुखेन स्पष्ट उल्लेख यह बताता है कि तद्धितान्त नाम न केवल पुण्य-प्राप्ति में बाधक ही होता है प्रत्युत उससे अधर्म की प्राप्ति होती है । यह कृत् और तद्धित प्रत्ययों का ज्ञान व्याकरण के बिना नहीं हो सकता । मूलम्—सुदेवो असि— सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः । अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव ॥ सुदेवो असि वरुण सत्यदेवोऽसि । यस्य ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयः । अनुक्षरन्ति काकुदम् । काकुदं तालु । काकुर्जिह्वा, साऽस्मिन्नुद्यत इति काकुदम् । सूम्यं सुषिरामिव । तद्यथा—शोभनामूर्मिं सुषिरामग्निरन्तः प्रविश्य दहति, एवं ते सप्त सिन्धवः सप्त विभक्तयस्ताल्वनुक्षरन्ति । तेनासि सत्यदेवः । सत्यदेवाः स्यामेत्यध्येयं व्याकरणम् । सुदेवो असि । प्रदीपः—सुदेवो असीति । वरुणस्येयं स्तुतिः । यतो हेतोर्व्याकरणज्ञानाद्वरुण सत्यदेवोऽसि ततो हेतोरन्येऽपि सत्यदेवा भवन्तीत्यर्थः । सिन्धव इति । नद्य इव विभक्तय इत्यर्थः । अनुक्षरन्तीति । ताल्वनुप्राप्य प्रकाशन्त इत्यर्थः । सास्मिन्नुद्यत इति । अनेकार्थत्वाद‍्धातूनामुत्क्षिप्यत इत्यर्थः । सूर्म्यमिति । सूर्मीमिति प्राप्ते अमि पूर्व इत्यत्र वा छन्दसीत्यनुवृत्त्या यणादेशः । अनुवाद—'हे वरुण ! तुम सत्यदेव हो जिसकी सात नदियाँ (सात विभक्तियाँ) सच्छिद्रा लोहप्रतिमा में अग्नि की तरह तालु में बहती हैं ।' हे वरुण तुम सुदेव हो (अर्थात्) सत्यदेव हो, तुम्हारी सात नदियाँ सात विभक्तियाँ हैं। (वे) तालु में क्षरित होती हैं । काकुद तालु को कहते हैं (क्योंकि) काकु (नाम है) जिह्वा का (और) वह उसमें उठाकर लगाई जाती है इसलिए वह काकुद हैं । 'सूम्यं सुषिरामिव' (का तात्पर्य है) जैसे कि अग्नि सुन्दर सच्छिद्रा लोह प्रतिमा के अन्दर प्रविष्ट होकर जलाती है इसी प्रकार से तुम्हारी सात सिन्धु रूप सात विभक्तियाँ तालु में क्षरित होती हैं । इसी से तुम सत्यदेव हो । हम भी सत्य- देव हों, इसलिए व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए । सुदेवो असि । उषा—वरुण व्याकरणज्ञान से युक्त होने के कारण सत्यदेव है । अग्नि सुन्दर लौह प्रतिमा में जिस प्रकार प्रविष्ट होकर उसे प्रतिभासित करती है, उसी प्रकार से व्याकरण की सात विभक्तियाँ उसके तालु प्रदेश में प्रवाहित होती हुईं उसे सत्यदेव बनाती हैं । व्याकरणज्ञान से शब्दब्रह्म का प्रकाश प्राप्त कर साधक सांसारिक पापों से विमुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त करता है—"शब्दब्रह्मणि

२. शब्द-स्वरूप विचार (द्रव्य, क्रिया, गुण एवं जाति शब्दत्व निरूपण)

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) २७ निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ।" यही उसका सत्यदेवत्व है । हम भी वरुण के समान ही इस उच्च प्रतिष्ठित पद को प्राप्त हों, इसके लिए व्याकरण का अध्ययन अनिवार्य है । मूलम्—किं पुनरिदं व्याकरणमेवाधिजिगांसमानेभ्यः प्रयोजनमन्वाख्यायते, न पुनरन्यदपि किञ्चित् । ओमित्युक्त्वा वृत्तान्तशः शमित्यादीन् शब्दान्पठन्ति । पुराकल्प एतदासीत् — संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्माधीयते । तेभ्य- स्तत्तत्स्थानकरणानुप्रदानज्ञेभ्यो वैदिकाः शब्दा उपदिश्यन्ते । तदद्यत्वे न तथा । वेदमधीत्य त्वरिता वक्तारो भवन्ति — "वेदान्नो वैदिकाः शब्दाः सिद्धा लोकाच्च लौकिकाः । अनर्थकं व्याकरणमिति ।" तेभ्य एवं विप्रतिपन्नबुद्धिभ्योऽध्येतृभ्यः सुहृद्भूत्वा आचार्य इदं शास्त्रमन्वाचष्टे । इमानि प्रयोजनान्यध्येयं व्याकरणमिति । प्रदीपः—किं पुनरिति । ननु कानि पुनरस्येति येन पृष्टं स एव कथं पृच्छति — किं पुनरिति । एवं तर्हि भाष्यकारः प्रयोजनान्वाख्यानस्य विषयविभागं दर्शयति । पुरा वेदाध्ययनात्पूर्वं व्याकरणमधीयते ते बाल्यात्प्रष्टुमसमर्था इति न प्रयोजनमन्वाख्येयम् । अद्यत्वे तु स्वल्पायुष्ट्वात्पूर्वमेव वेदं प्रधानमधीयते ततः प्रष्टुं समर्थत्वाद् व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनं पृच्छन्तीत्यवश्यान्वाख्येयं प्रयोजनम् न पुनरन्यदिति । वेदमप्यधिजिगांसमानेभ्य इत्यर्थः । ओमित्युक्त्वेति । अभ्युपगम्येत्यर्थः । वृत्तान्तश इति । वृत्तान्तः प्रपाठक उच्यते । वृत्तान्तं वृत्तान्तं पठन्तीत्यर्थः । अद्यत्व इति । अद्यत्वेशब्दो निपातोऽस्मिन्काल इत्यत्रार्थे वर्तते । त्वरिता इति । विवाहादौ । अनुवाद — क्या फिर यह व्याकरण पढ़ना चाहने वालों के लिए प्रयोजन बताये जा रहे हैं या कुछ और भी ? (वेद पढ़ना चाहने वाले) 'ओम्' ऐसा कहकर प्रति प्रपाठक 'शम्' पर्यन्त शब्दों को पढ़ते हैं । पुराकाल में ऐसा था कि (उपनयन) संस्कार के अनन्तर ब्राह्मण व्याकरण का अध्ययन करते थे । तत्तत् वर्णोच्चारण- स्थान, करण और अनुप्रदान जान लेने पर उन्हें वैदिक शब्दों का उपदेश किया जाता था । आजकल वैसा नहीं है । (पहले) वेद का अध्ययन करके शीघ्र ही कहने लगते हैं, वेद से हमने वैदिक शब्द जान लिये हैं, लोक से लौकिक । इसलिए व्याकरण अनर्थक है । उन्हीं विप्रतिपन्न बुद्धि वाले अध्येताओं को सुहृद होकर आचार्य इस शास्त्र का आख्यान करते हैं — "ये प्रयोजन हैं, (इसलिए) व्याकरण का अध्ययन करना चाहिए ।" उषा — उपनयन संस्कार के अनन्तर बालक को वेद का अध्ययन करवाया जाता है, अतः ऐसी परिस्थिति में वेदाध्ययन के प्रयोजनों का अन्वाख्यान होना चाहिए था, व्याकरणाध्ययन के प्रयोजनों का नहीं । इसी आशंका के अनुरोध से भाष्यकार ने कहा है कि पुरा काल में ब्राह्मण बालक को उपनयन संस्कार के अनन्तर पहले व्याकरण का अध्ययन करवाया जाता था । उस समय में विभिन्न

२८ महाभाष्यम् उच्चारण स्थानों, विभिन्न ग्राभ्यन्तर तथा बाह्य प्रयत्नों का उपदेश किया जाता था । बाल्यावस्था होने के कारण वे इस प्रकार के (प्रयोजनादि विषयक) प्रश्न पूछने में असमर्थ होते थे, अतः प्रयोजनों का व्याख्यान भी नहीं किया जाता था। व्याकरणाध्ययन पूर्ण हो जाने के अनन्तर उन्हें वेदाध्ययन करवाया जाता था । परन्तु ग्राज स्थिति विपरीत है। अब उपनयन के अनन्तर ही छात्र वेदाध्ययन प्रारम्भ कर देता है। जब तक वेदाध्ययन समाप्त हो, छात्र में पर्याप्त प्रौढ़ता ग्रा जाती है। वेद का अध्ययन कर वह झट से कहने लगता है कि लौकिक व्यवहार से उसने लौकिक भाषा का ज्ञान प्राप्त कर लिया है तथा वेद से वैदिक शब्दों को सीख लिया है, व्याकरण का प्रयोजन भी तो यही है। अतः अब पृथक् रूप से व्याकरण सीखने का कोई लाभ नहीं । इस प्रकार के विप्रतिपन्न बुद्धि वाले अध्येताओं के लिए भाष्यकार ने इन प्रयोजनों का अन्वाख्यान किया है। यहाँ “त्वरिताः” के सम्बन्ध में कैयट की टिप्पणी “विवाहादौ (त्वरिताः)” भाष्यकाराभिमत है अथवा नहीं, यह सन्दिग्ध है । मूलम् — उक्तः शब्दः । स्वरूपमप्युक्तम् । प्रयोजनान्यप्युक्तानि । शब्दानु- शासनमिदानीं कर्त्तव्यम् । तत्कथं कर्त्तव्यम् । किं शब्दोपदेशः कर्तव्यः, आहोस्विद- पशब्दोपदेशः, आहोस्विदुभयोपदेश इति । अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात् । तद्यथा भक्ष्यनियमेनाभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते । ‘पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः’ इत्युक्ते गम्यत एतद् — अतोऽन्येऽभक्ष्या इति । अभक्ष्य- प्रतिषेधेन वा भक्ष्यनियमः । तद्यथा ‘अभक्ष्यो ग्राम्यकुक्कुटः अभक्ष्यो ग्राम्यसूकरः’ इत्युक्ते गम्यत एतद् — आरण्यो भक्ष्य इति । एवमिहापि तावच्छब्दोपदेशः क्रियते, गौरित्येतस्मिन्नुपदिष्टे गम्यत एतद् — गाव्यादयोऽपशब्दा इति । अथाप्यपशब्दो- पदेशः क्रियते, गाव्यादिषूपदिष्टेषु गम्यत एतद् — गौरित्येष शब्द इति । किं पुनरत्र ज्यायः ? लघुत्वाच्छब्दोपदेशः । लघीयाञ्छब्दोपदेशः । गरीयानपशब्दोपदेशः । एकैकस्य शब्दस्य बहवोऽपभ्रंशा । तद्यथा गौरित्यस्य शब्दस्य गावीगोणीगोता- गोपोतलिकेत्येवमादयोऽपभ्रंशाः । इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति । प्रदीपः — उभयोपदेश इति । हेयोपादेयोपदेशे स्पष्टा प्रतिपत्तिर्भवतीत्युभयो- पदेश उद्भावितः । यद्यपि प्रतिपत्तिः स्पष्टा, गौरवं तु भवतीत्याह अन्यतरेति । शब्दापशब्दयोरित्यर्थः । अन्यतरान्यतमशब्दावव्युत्पन्नौ स्वभावाद् द्विबहुविषये निर्धारणे वर्तेते । पञ्चेति । अर्थित्वादभक्षणं प्राप्तं पञ्चसु पञ्चनखेषु नियम्यमानं सामर्थ्यादन्येभ्यो निवर्तते । न त्वयं विधिः, अप्राप्तेरभावात् । किं पुनरिति । उभयोपदेशाद् गुरोर्द्वावपि प्रशस्यौ तयोः को ज्यायानित्यर्थः । इष्टेति । साधुशब्दप्रयोगाद्धर्मावाप्तेरित्यर्थः । अथवा उपादेयोपदेशात् साक्षात्प्रतिपत्ति- र्भवतीति भावः ।

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) २६ अनुवाद—(व्याकरण का विषयभूत) शब्द कह दिया गया है। (शब्द का) स्वरूप भी कहा गया है। (प्रसङ्गानुसार) प्रयोजन भी बताये गये हैं। अब शब्दा- नुशासन करना चाहिए। तो वह कैसे करना चाहिए। क्या (साधु) शब्दों का उपदेश करना चाहिए अथवा अपशब्दों का उपदेश अथवा दोनों का उपदेश (करना चाहिए)। किसी एक के उपदेश से काम हो सकता है। जैसे कि भक्ष्य (पदार्थों) का नियम करने से अभक्ष्य का प्रतिषेध समझा जाता है। 'पाँच पञ्चनख प्राणियों का भक्षण करना चाहिए, ऐसा कहने पर समझा जाता है कि इसके अतिरिक्त अभक्ष्य हैं। इसी प्रकार अभक्ष्य के प्रतिषेध से भक्ष्य पदार्थों का नियम (किया जाता है)। जैसे 'ग्राम्य-कुक्कुट अभक्ष्य है,' 'ग्राम्य शूकर अभक्ष्य है,' ऐसा कहने पर आरण्य (कुक्कुट अथवा सूकर) भक्ष्य है, ऐसा समझा जाता है। यही बात यहाँ भी है। यदि (साधु) शब्दों का उपदेश किया जाता है, (तो) 'गो:' ऐसा उपदेश करने से यह समझ लिया जाता है कि 'गावी' आदि अपशब्द हैं। और भी यदि अपशब्दोपदेश किया जाता है तो 'गावी' आदि का उपदेश होने पर यह (स्वयं) समझ लिया जाता है कि 'गो:' यह शब्द है। फिर यहाँ श्रेष्ठ कौन सा है ? लघु होने से (साधु) शब्दोपदेश। शब्दोपदेश लघु है, अपशब्दोपदेश में गौरव है। (क्योंकि) एक-एक शब्द के बहुत से अपभ्रंश है। जैसे कि 'गो:' इस (एक) शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अपभ्रंश हैं। और फिर इष्ट का अनुशासन भी होता है। उषा—शब्द स्वरूप प्रतिपादन व्याकरण शास्त्र का विषयभूत है। सर्वप्रथम उसका निरूपण किया गया है। तदनन्तर व्याकरणाध्ययन के मुख्य और गौण प्रयोजनों का विवेचन है। सम्बन्ध और अधिकारी का पृथक् निर्देश यद्यपि नहीं है तथापि विषय और प्रयोजनों के प्रसङ्ग में उनका भी उल्लेख हो ही गया है। कहा जा सकता है कि शब्दज्ञान रूप प्रमेय और शब्दानुशासन रूप साधन का परस्पर बोध्यबोधक भाव सम्बन्ध है तथा "तेभ्य एव विप्रतिपन्नबुद्धिभ्योऽध्येतव्यम्:" इत्यादि के द्वारा शास्त्र के अधिकारी का निरूपण है। अनुबन्धचतुष्टय का विवेचन करने के अनन्तर शास्त्र का प्रारम्भ होता है। साधु शब्दज्ञान तीन प्रकार से करवाया जा सकता है—(१)साधु शब्दों के उपदेश द्वारा, (२)अपशब्दों के उपदेश द्वारा, (३) साधु तथा असाधु उभयशब्दोपदेश द्वारा। इनमें से उभय शब्दोपदेश रूप तृतीय साधन यद्यपि विषय के स्पष्ट प्रतिपादन की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, परन्तु यह गौरव दोष से दूषित है। इसीलिए शब्दानुशासन की कथंकर्त्तव्यता पर विचार करते हुए इसका त्याग ही

३० महाभाष्यम् कर दिया गया है, तथा अन्यतर उपदेश की बात कही गई है, तरप् प्रत्यय दो वस्तुओं की अपेक्षा-बुद्धि में प्रयुक्त होता है । "पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः" इत्यादि रूप में भक्ष्य पदार्थों का नियमन अपने से अतिरिक्त पदार्थों में अभक्ष्यत्व की प्रतीति करवाता है अथवा कहा जा सकता है कि इसका अर्थबोध तदितर पदार्थों के भक्ष्यत्व प्रतिषेध में पर्यवसित होता है । इसी प्रकार से सास्नादिमत्पदार्थ में अनुशिष्ट 'गो' शब्द इस बात का बोधक है कि इस अर्थ में प्रयुक्त होने वाले अन्य 'गावी' इत्यादि शब्द असाधु हैं । मीमांसादर्शन में यह उदाहरण नियमविधि का नहीं प्रत्युत परिसंख्या विधि का माना गया है— विधिरत्यन्तमप्राप्तौ नियमः पाक्षिके सति । तत्र चान्यत्र च प्राप्तौ परिसंख्येति गीयते ॥ अर्थात् अत्यन्त अप्राप्त क्रिया की ज्ञापक विधि, अनेक विकल्पों के प्राप्त होने पर उनमें से एक का विधान नियम तथा अन्य वस्तुओं की निवृत्तफलकता परिसंख्या है । प्रस्तुत सन्दर्भ में नियम और परिसंख्या में अप्राप्तांशपूरणरूपफल- बोधन द्वारा अन्य अर्थों की निवृत्ति रूप समानता होने के कारण नियम शब्द का प्रयोग परिसंख्या के अर्थ में किया गया है, ऐसा उद्योतकार का मत है। यहाँ भक्ष्य नियम का अर्थ है—भक्ष्यानुमतिरूप उपदेश । इसी प्रकार से 'गावी' आदि अपशब्दों का अनुशासन करने से यह ज्ञात हो जाता है कि इनके अतिरिक्त 'गो' शब्द साधु है जिसका सास्नादिमत्पदार्थ के बोधन में प्रयोग किया जाना चाहिए । इन दोनों में से भी साधु शब्दों का उपदेश लघु है, अपशब्दों के उपदेश से पुनः गौरव दोष आ जाता है । क्योंकि साधु शब्द एक ही होता है परन्तु देश और कालादि के भेद से उसके प्राकृत रूप अनेक बन जाते हैं । यथा सास्नादिमत्पदार्थ के बोधक एक ही 'गो' शब्द के गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका इत्यादि अनेक अपभ्रष्ट रूप हैं । असाधु शब्दों के उपदेश में इन सभी का अनुशासन करना होगा, जो निश्चय ही साधु शब्दों के उपदेश की अपेक्षा गुरु है। अतः शब्दानुशासन में साधु शब्दों का प्रयोग ही ज्यायान् है । इसके अतिरिक्त साधु शब्द में अभ्युदय और निःश्रेयस् साधकत्व है और शास्त्र का उद्देश्य भी यही है । इसके विपरीत असाधु शब्द अधर्म का साधन है अतः उनका उपदेश करने से शास्त्र अनिष्टोपदेश के दूषण से दूषित हो जायेगा । यही बात वाक्यपदीयकार ने भी इन शब्दों में कही है— धर्मे ये प्रत्यये चाङ्ग सम्बन्धाः साध्वसाधुषु । १।२५. ते लिङ्गंश्च स्वशब्दैश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुपवर्णिताः । १।२६.

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३१ इसके अतिरिक्त यह, भी कहा जा सकता है कि अपशब्दों का अनुशासन करना दुष्कर भी है। एक शुद्ध शब्द के विभिन्न देशों तथा प्रत्येक काल में प्रचलित समस्त प्राकृत रूपों को ढूंढना अपेक्षाकृत दुष्कर है। अपि च, यह पद्धति विषय का स्पष्ट प्रतिपादन कर पाने में भी सक्षम नहीं होगी क्योंकि अध्येता को विभिन्न प्राकृत रूपों का संकलन देखकर उनके अतिरिक्त एक साधु शब्द की प्राप्ति में पुनः प्रयास करना ही पड़ेगा । मूलम्—अथैतस्मिञ्छब्दोपदेशे सति किं शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्त्तव्यः । गौरश्वः पुरुषो हस्ती शकुनिर्मृगो ब्राह्मण इत्येवमादयः शब्दाः पठितव्याः ? नेत्याह । अनभ्युपाय एष शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । एवं हि श्रूयते— बृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दानां शब्दपारायणं प्रोवाच । नान्तं जगाम ।" बृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रश्चाध्येता, दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो, न चान्तं जगाम, किं पुनरद्यत्वे । यः सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं जीवति । चतुर्भिश्ञ्च प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति—आगमकालेन, स्वाध्यायकालेन, प्रवचनकालेन, व्यवहारकालेनेति । तत्र चास्यागमकालेनैवायुः कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात् । तस्माद- नभ्युपायः शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः । कथं तर्हीमे शब्दाः प्रतिपत्तव्याः ? किञ्चित्त्सामान्यविशेषवल्लक्षणं प्रवर्त्यम् । येनाल्पेन यत्नेन महतो महतः शब्दौघान् प्रतिपद्येरन् । किं पुनस्तत् ? उत्सर्गापवादौ । कश्चिदुत्सर्गः कर्त्तव्यः, कश्चिदपवादः । कथंजातीयकः पुनरुत्सर्गः कर्त्तव्यः, कथंजातीयकोऽपवादः ? सामान्येनोत्सर्गः कर्तव्यः । तद्यथा—"कर्मण्यण्" । तस्य विशेषेणापवादः । तद्यथा—"आतोऽनुपसर्गे कः ।" प्रदीपः—बृहस्पतिरिन्द्रायेति । प्रतिपदपाठस्याशक्यत्वं प्रतिपादयितुमयं- मर्थवादः । शब्दानामिति । शब्दपारायणशब्दो योगरूढः शास्त्रविशेषस्य, तत्र प्रतिपदोक्तानामिति विशेषाभिधानाय गम्यमानार्थस्यापि शब्दाना मित्यस्य प्रयोगः । एकदेशोपयोगादपि लोके उपयुक्तमित्युच्यते यथौषधसंस्कृतघृतमात्रैकदेशोपयोगे उपयुक्तं घृतमिति व्यवहारः, तथेह नेति प्रतिपादयति—चतुर्भिरिति । आगमकालो ग्रहणकालः । स्वाध्यायकालोऽभ्यासकालः । प्रवचनकालोऽध्यापनकालः । व्यवहारो याज्ञे कर्मणि । किञ्चिदिति । सामान्यविशेषौ यस्मिंस्तत्सामान्यविशेषवत् । कर्मण्यण्, आतोऽनुपसर्गे क इत्यादि । अनुवाद—इस प्रकार इस शब्दोपदेश की व्यवस्था होने पर क्या शब्दों की

३२ महाभाष्यम् प्रतिपत्ति में (उनका) प्रतिपद पाठ करना चाहिए । गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण इत्यादि प्रकार के शब्दों का पृथक्-पृथक् पाठ होना चाहिए ? (पाणिनि ने) ऐसा नहीं कहा। शब्दप्रतिपादन के लिए प्रतिपदपाठ कोई उपाय नहीं है । ऐसा सुना जाता है कि—“बृहस्पति ने इन्द्र के लिए सहस्र दिव्य वर्षों तक प्रतिपद शब्दों का पारायण किया, (फिर भी) समाप्त नहीं हो पाया ।” बृहस्पति प्रवक्ता और इन्द्र अध्येता । सहस्र दिव्य वर्ष अध्ययन काल । फिर भी समाप्त नहीं हो पाया, फिर आजकल (तो बात ही) क्या । जो बहुत जीता है, सौ साल तक जी लेता है । चार प्रकार से विद्या का उपयोग होता है— अध्ययन काल, स्वाध्याय काल, अध्यापन काल और (अधीत विद्या का) यज्ञ आदि व्यवहार में विनियोग । वहाँ अध्ययन काल में ही सारी आयु समाप्त हो जायेगी । इसलिए शब्दों के प्रतिपादन में (उनका) प्रतिपद पाठ कोई उपाय नहीं है । तो फिर इन शब्दों का प्रतिपादन कैसे होना चाहिए ? कुछ सामान्य और विशेष (नियमों) वाला लक्षण शास्त्र बनाना चाहिए जिससे अल्प प्रयत्न से महान् शब्दराशि का प्रतिपादन हो सके । फिर वह क्या (हो) ? उत्सर्ग और अपवाद । कोई उत्सर्ग नियम किया जायेगा, कोई अपवाद नियम । किस प्रकार का उत्सर्ग और किस प्रकार का अपवाद करना चाहिए । सामान्य रूप से उत्सर्ग (का कथन) करना चाहिए, जैसे “कर्मण्यण्”। उसका विशेष नियम अपवाद, जैसे—“आतोऽनुपसर्गे कः ।” उषा—सप्तद्वीपा वसुमती, तीन लोक, षडङ्ग तथा रहस्य सहित चार वेद, उनकी विभिन्न शाखायें, स्मृति साहित्य, इतिहास, पुराण, वैद्यक इस महान् शब्द प्रयोग के विषयभूत लोक में अनन्त शब्दों का प्रयोग होता है । उन समस्त साधु शब्दों का भी प्रतिपद व्याख्यान सम्भव नहीं है । अतः शब्दानुशासन करने के लिए गौ, अश्व, पुरुष, हस्ती, शकुनि, मृग, ब्राह्मण इत्यादि रूप में प्रतिपद शब्दों का पाठ करके उनका व्याख्यान करना लघु, ऋत एव स्वीकार्य उपाय नहीं हो सकता । इस सन्दर्भ में महाभाष्यकार ने एक ऐतिहासिक आख्यान प्रस्तुत किया है कि सुरगुरु बृहस्पति सुरेश्वर इन्द्र को एक सहस्र दिव्य वर्षों तक इसी पद्धति से शब्दोपदेश करते रहे, परन्तु शब्दपारायण समाप्त नहीं हो पाया। आज के युग में तो सौ वर्ष से अधिक आयु की सम्भावना ही नहीं की जा सकती। इस पर भी आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहार रूप में चार प्रकार से विद्या का उपयोग इस पद्धति की प्रासङ्गिकता पर और भी प्रश्न चिह्न लगा देता है । “शब्दानां शब्दपारायणम्” के रूप में भासमान पुनरुक्ति का वारण करने के लिए यहाँ कैयट ने “शब्दपारायण” को योगरूढ अर्थ में ग्रन्थविशेष का वाचक

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३३ माना है। वस्तुतः यह स्वतन्त्र ग्रन्थ का वाचक शब्द है अथवा वैदिक शैली का प्रभावमात्र, यह सन्देहास्पद है । विद्या की प्राप्ति का समय आगम-काल, अभ्यास स्वाध्याय-काल, अध्यापन प्रवचन-काल तथा उसका याज्ञिक क्रियाओं में उपयोग व्यवहार-काल है। नागेश के अनुसार 'आगमकालेन' इत्यादि शब्दों में विद्योपयोग के आधारभूत कालों में करणत्व की विवक्षा से तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है, अर्थात् चार कालों में विद्या का उपयोग होता है। आगम और स्वाध्याय काल में इसका उपयोग आदर पूर्वक अन्नवस्त्रादि लाभरूप है, प्रवचन-काल में इसका उपयोग प्रतिष्ठा, अर्थप्राप्ति आदि तथा याज्ञिक व्यवहार के समय इसका उपयोग दक्षिणादि-लाभ में पर्यवसित होता है। 'नैषधीयचरितम्' महाकाव्य के प्रणेता श्रीहर्ष ने भी विद्या की इन चार दशाओं का उल्लेख किया है, परन्तु वहाँ इसका क्रम महाभाष्य के क्रम से किञ्चित् परिवर्तित है। वहाँ अध्ययन तथा स्वाध्याय के अनन्तर पहले व्यवहार तथा उसके अनन्तर प्रवचन-काल का उल्लेख है— अधीतिबोधाचरणप्रचारणै- र्दशाश्चतस्रः प्रणयन्नुपाधिभिः । नैषध० १।४. परन्तु आज के युग में कहा जा सकता है कि सर्वप्रथम अध्ययन काल तथा उसके अनन्तर प्रवचन और व्यवहार काल को युगपत् लिया जा सकता है। स्वाध्याय-काल तो विद्याध्ययन के समय भी तथा उससे भी अधिक अध्यापनकाल में भी आवश्यक है। प्रतिपद पाठ रूप उपाय के शब्दानुशासन में अनभ्युपायभूत सिद्ध हो जाने पर 'सामान्यवत् लक्षण' को इसके उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो अल्प यत्न से ही महान् शब्द राशि का प्रतिपादक होने के कारण लघु उपाय है। उत्सर्ग और अपवाद रूप सूत्रों का निर्माण करके विस्तृत शब्दराशि को अनुशिष्ट किया जा सकता है। सामान्य नियम उत्सर्ग कहलाता है, विशेष नियम अपवाद । यथा 'कर्मण्यण्' सूत्र कर्म कारक उपपद होने पर धातु मात्र से अण् प्रत्यय का विधान करता है, किन्तु उसका विशेष अपवाद सूत्र "आतोऽनुपसर्गे कः" कर्मकारक के उपपद होने पर उपसर्ग रहित आकारान्त धातुओं से 'क' प्रत्यय का उपदेश करता है। मूलम्—किं पुनराकृतिः पदार्थः आहो स्विद् द्रव्यम् ? उभयमित्याह । कथं ज्ञायते ?

उभयथा ह्याचार्येण सूत्राणि पठितानि । आकृतिं पदार्थं मत्वा—"जात्या- ख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम्" इत्युच्यते । द्रव्यं पदार्थं मत्वा "सरूपाणाम्"— इत्येकशेष आरभ्यते । प्रदीप.—सकलशास्त्रव्यवस्थैकतरपक्षाश्रयणे न सिध्यतीति पक्षद्वयाश्रयणं प्रश्नपूर्वकं करोति—किं पुनरिति । आकृतिपक्षे केवल आश्रीयमाणे सकृद्गतौ विप्रतिषेध इत्यादि नोपपद्यते, केवलेपि व्यक्तिपक्षे पुनः प्रसङ्गविज्ञानादित्यादि न घटते । तस्माल्लक्ष्यसिद्धये क्वचित्प्रदेशे कश्चित्पक्षः परिगृह्यते । तत्र जातिवादिन आहुः—जातिरेव शब्देन प्रतिपाद्यते, व्यक्तीनामानन्त्यात्सम्बन्धग्रहणासम्भवात् । सा च जातिः सर्वव्यक्तिष्वेकाकारप्रत्ययदर्शनादस्तीत्यवसीयते । तत्र गवादयः शब्दा भिन्नद्रव्यसमवेतां जातिमभिदधति । तस्यां प्रतीतायां तदावेशात्तदवच्छिन्नं द्रव्यं प्रतीयते । शुक्लादयः शब्दा गुणसमवेतां जातिमाचक्षते । गुणे तु तत्सम्बन्धात्प्रत्ययः, द्रव्ये सम्बन्धिसम्बन्धात् । संज्ञाशब्दानामप्युत्पत्तिप्रभृत्या विनाशात्पिण्डस्य कौमार- यौवनाद्यवस्थाभेदेऽपि स एवायमित्यभिन्नप्रत्ययनिमित्ता डित्थत्वादिका जातिर्वाच्या । क्रियास्वपि जातिर्विद्यते सैव धातुवाच्या । पठति पठतः पठन्तीत्यादेरभिन्नस्य प्रत्ययस्य सद्भावात्तन्निमित्तजात्यभ्युपगमः । व्यक्तिवादिनस्त्वाहुः—शब्दस्य व्यक्तिरेव वाच्या, जातेस्तूपलक्षणभावेनाश्रयणादानन्त्यादिदोषानवकाशः । अनुवाद—क्या आकृति पद का अर्थ है, अथवा द्रव्य । "दोनों ही," ऐसा (सूत्रकार) कहता है । कैसे जाना जाता है ? दोनों ही प्रकार के आचार्य ने सूत्र पढ़े हैं । आकृति को पदार्थ मानकर "जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम्" ऐसा कहा जाता है । द्रव्य को पदार्थ मानकर "सरूपाणाम्०"—इत्यादि एकशेष शास्त्र का आरम्भ किया गया है । उषा—पतञ्जलि से पूर्व वाजप्यायन और व्याडि पद के अर्थ के सम्बन्ध में क्रमशः जाति और व्यक्ति अथवा आकृति और द्रव्य का विस्तृत विवेचन कर चुके थे । महाभाष्यकार ने इन दोनों वादों में समन्वय स्थापित किया । "चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः" कहकर एक स्थल पर जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा के रूप में चार प्रकार की शब्द प्रवृत्ति की बात स्वीकार की है । शब्दानुशासन के प्रणेता आचार्य पाणिनि भी जाति और व्यक्ति दोनों में ही पदों का वाचकत्व स्वीकार करते हैं । इसलिए दोनों ही प्रकार के सूत्र अष्टा- ध्यायी में प्राप्य हैं । व्यक्तिपक्ष के ही सर्वत्र पदार्थत्वेन इष्ट होने पर "सम्पन्ना व्रीहयः" इत्यादि स्थलों में, जहाँ अनेकत्व सिद्ध ही है, "जात्याख्यायामेकस्मिन्बहु- वचनमन्यतरस्याम्" सूत्र के निर्माण की आवश्यकता ही नहीं रहती । इसी प्रकार से जाति ही यदि पदार्थत्वेन इष्ट हो तो उसके सर्वत्र एकवचनान्त होने के कारण एकत्व

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३५ का विधान करने के लिए "सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ" आदि सूत्र अनर्थक हो जायेंगे । अतः व्याकरण मत में व्यक्ति और जाति दोनों में ही पदार्थत्व वर्त्तमान है। बल्कि सच तो यह है कि जाति और व्यक्ति अभिन्न हैं, उन्हें पृथक् नहीं किया जा सकता । यह बात अलग है कि किसी स्थल पर वाच्यत्व जाति में होता है, अन्यत्र व्यक्ति में। मुख्य वाच्य यदि जाति हो तो व्यक्ति गौण होता है और व्यक्ति यदि मुख्य रूप से वाच्य हो तो जाति में गौणता होती है। यही बात भर्तृहरि ने भी कही है— "पदार्थानामपोद्धारे जातिर्वा द्रव्यमेव वा" । मूलम्—किं पुनर्नित्यः शब्दः, आहो स्वित्कार्यः ? संग्रह एतत्प्राधान्येन परीक्षितम्—नित्यो वा स्यात् कार्यों वेति । तत्रोक्ता दोषाः, प्रयोजनान्यप्युक्तानि । तत्र त्वेष निर्णयः—यद्येव नित्यः, अथापि कार्यः, उभयथापि लक्षणं प्रवर्त्यमिति । प्रदीपः—किं पुनरिति । विप्रतिपत्त्या संशयः । केचिद्ध्वनिव्यङ्ग्यं वर्णात्मकं नित्यं शब्दमाहुः । अन्ये वर्णव्यतिरिक्तं पदस्फोटमिच्छन्ति । वाक्यस्फोटमपरे संगिरन्ते । अन्ये तु ध्वनिरेव शब्दः स च कार्यस्तद्व्यतिरेकेणान्यस्यानुपलम्भादि- त्याचक्षते । संग्रह इति । ग्रन्थविशेषे । अनुवाद—क्या शब्द नित्य है, अथवा कार्य (अनित्य) ? संग्रह (नामक ग्रन्थ) में मुख्य रूप से इसकी परीक्षा की गई है कि (शब्द) नित्य है अथवा कार्य । वहाँ (उभय पक्षों में प्रसक्त) दोष कहे गये हैं, (शास्त्रारम्भ के) प्रयोजन भी बताये गये हैं। वहाँ यह निर्णय किया गया है कि यद्यपि (शब्द) नित्य है, अथवा कार्य, दोनों ही परिस्थितियों में लक्षणशास्त्र (व्याकरण) का उपदेश होना चाहिए । उषा—विभिन्न दर्शनों में तत्तद्दर्शनतन्त्र की सीमाओं के अनुरूप शब्द के स्वरूप पर विचार किया गया है । उनकी मान्यतायें न केवल भिन्न-भिन्न प्रत्युत परस्पर विरोधी भी हैं। मीमांसा ध्वनि रूप वर्णात्मक शब्द को नित्य स्वीकार करता है, न्यायदर्शन को इसकी नित्यता स्वीकार्य नहीं क्योंकि उनके मत में श्रूयमाण ध्वनिरूप ही शब्द है। कुछ वैयाकरण वर्णों के अतिरिक्त पदस्फोट की सत्ता को स्वीकार करते हैं परन्तु पदों में वर्णों की स्थिति जिस प्रकार से कल्पित है, उसी प्रकार से वाक्य में पदों की स्थिति भी काल्पनिक है, अतः अन्य वैयाकरणों की दृष्टि में वाक्यस्फोट ही प्रधान रूप से शब्दत्वेन स्थित है । एवं च, शब्दानुशासन करने से पूर्व इन परस्पर विसंवादी मान्यताओं के मध्य शब्दनित्यत्व और कार्यत्व के प्रश्न का समाधान कर लेने की अनिवार्यता

३६ महाभाष्यम् का अनुभव करते हुए यह प्रश्न उठाया गया है । परन्तु भाष्यकार ने यहाँ इसकी अप्रासङ्गिकता को बताते हुए कहा है कि इस प्रकार का विस्तृत विवेचन पहले ही आचार्य व्याडि के संग्रह (नामक ग्रन्थ) में हो चुका है । यहाँ उन सब उक्तियों का दोहराना पिष्टपेषण ही होगा । इन दोनों ही पक्षों के सूक्ष्म पर्यालोचन के अनन्तर वहाँ यह निर्णय दिया गया है कि शब्द को चाहे नित्य माना जाये अथवा कार्य, दोनों ही परिस्थितियों में उसके साधुत्व का अनुशासन आरम्भणीय है । व्याडि पाणिनि के मातुल अथवा बलदेव उपाध्याय के शब्दों में मातुलपुत्र थे । उनके द्वारा विरचित संग्रहग्रन्थ के विषय में सर्वप्रथम सूचना महाभाष्य से प्राप्त होती है, जहाँ शब्दनित्यत्व और कार्यत्व जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों को भी व्याडिप्रमाण कहकर छोड़ दिया गया है, जो व्याडि की प्रामाणिकता सिद्ध करता है । भर्तृहरि ने महाभाष्य के उक्त प्रसङ्ग की टीका करते हुए इस ग्रन्थ के विषय में कहा है कि इसमें १४ सहस्र दार्शनिक वस्तुओं की परीक्षा की गई है । पुण्यराज ने वाक्यपदीय की टीका में इसे लक्षग्रन्थपरिमाण वाला कहा है । इसकी पुष्टि प्रदीपोद्द्योत से भी होती है । युधिष्ठिर मीमांसक ने अनेक स्थानों पर उद्धृत संग्रह ग्रन्थ के उद्धरणों का संकलन करके उसे प्रकाशित किया है । मूलम् — कथं पुनरिदं भगवतः पाणिनेराचार्यस्य लक्षणं प्रवृत्तम् ? “सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे” (वा०) । सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । अथ सिद्धशब्दस्य कः पदार्थः ? नित्यपर्यायवाची सिद्धशब्दः । कथं ज्ञायते । यत्कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते । तद्यथा सिद्धा द्यौः सिद्धा पृथिवी, सिद्धमाकाशमिति । प्रदीपः— कथं पुनरिति । किमाचार्य एव स्रष्टा शब्दार्थसम्बन्धानाम्, अथ स्मर्तेति प्रश्नः । सिद्ध इति । तत्र नित्यः शब्दो जातिस्फोटलक्षणो व्यक्तिस्फोटलक्षणो वा । कार्यशाब्दिकानामपि मते प्रवाहनित्यता । अर्थस्यापि जातिलक्षणस्य नित्यत्वम् । द्रव्यपक्षेऽपि सर्वशब्दानामसत्योपाध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्त्वं वाच्यमिति नित्यता प्रवाह- नित्यता वा । सम्बन्धस्यापि व्यवहारपरम्परयाऽनादित्वात्नित्यता । सिद्ध शब्दस्य नित्यानित्ययोर्दर्शनात्पृच्छति— अथेति । नित्येति । नित्यलक्षणस्यार्थस्य पर्यायेण वाचकस्तमेवार्थं कदाचिन्नित्यशब्द आह कदाचित्सिद्धशब्द इत्यर्थः । कूटस्थेष्विति । देशान्तरप्राप्तिरहितेषु । अनुवाद — फिर कैसे (किस अभिप्राय से भगवान् आचार्य पाणिनि का लक्षण (शास्त्र) प्रवृत्त हुआ है ?

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ३७ "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" अर्थात् शब्द, अर्थ और उसके सम्बन्ध के नित्य होने पर । अब सिद्ध शब्द का क्या अर्थ है ? सिद्ध शब्द नित्य (शब्द) का पर्यायवाची है । (यह) कैसे जाना जाता है ? क्योंकि यह कूटस्थ (स्वरूप में स्थित) और अविचालित (नित्य सुस्थित) भावों में आता है । जैसे कि—द्युलोकं सिद्ध है, पृथिवी सिद्ध है, आकाश सिद्ध है (इत्यादि) । उषा—शब्द और अर्थ का सम्बन्ध यदि नित्य और लोकसिद्ध है तो शास्त्र का आरम्भ व्यर्थ ही है और यदि यह सम्बन्ध सिद्ध नहीं है तो शास्त्र का अनुशासन हो ही नहीं सकता है । अत एव यह प्रश्न उठाया गया है कि पाणिनि का शब्दानु- शासन किस अभिप्राय को लेकर प्रवृत्त हुआ है, अर्थात् पाणिनि के शासनतन्त्र की सीमाओं में शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध नित्य है अथवा अनित्य । इस प्रश्न के उत्तर में भाष्यकार ने एक वार्त्तिक उद्धृत किया है— "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" अर्थात् शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को नित्य मानते हुए । यहाँ सिद्ध शब्द नित्य शब्द का पर्यायवाची है, क्योंकि यह प्रायः अविनाशी तथा नित्य अवस्थित भावों को अभिव्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है । जाति स्फोट अथवा व्यक्ति स्फोट रूप शब्द नित्य है । जो शब्द को अनित्य मानते हैं उनके मत में भी शब्द में प्रवाहनित्यता तो है ही । जाति रूप में अर्थ नित्य है, द्रव्यपक्ष में असत्योपाध्यवच्छिन्न ब्रह्मतत्त्व ही समस्त शब्दों के द्वारा वाच्य है, अतः नित्य है । व्यवहार परम्परा के अनादि होने के कारण शब्द और अर्थ का सम्बन्ध भी नित्य है । मूलम्—ननु च भोः कार्येष्वपि वर्तते, तद्यथा सिद्ध ओदनः, सिद्धः सूपः, सिद्धा यवागूरिति । यावता कार्येष्वपि वर्तते, तत्र कुत एतन्नित्यपर्यायवाचिनो ग्रहणं न पुनः कार्ये यः सिद्ध शब्द इति । संग्रहे तावत्कार्यप्रतिद्वन्द्विभावान्मन्यामहे नित्यपर्यायवाचिनो ग्रहणमिति । इहापि तदेव । अथवा सन्त्येकपदान्यप्यवधारणानि । तद्यथा अब्भक्षो, वायुभक्ष इति— अप एव भक्षयति, वायुमेव भक्षयतीति गम्यते । एवमिहापि । सिद्ध एव न साध्य इति । अथवा पूर्वपदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः । अत्यन्तसिद्धः सिद्ध इति । तद्यथा देवदत्तो दत्तः, सत्यभामा भामेति ।

३८ महाभाष्यम् अथवा व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्न हि सन्देहादलक्षणमिति नित्यपर्याय- वाचिनो ग्रहणमिति व्याख्यास्यामः । प्रदीपः—ननु चेति । सिद्धशब्दात्क्रियानिष्पन्नोऽप्यर्थोऽवगम्यत इत्यर्थः । संग्रहे तावदिति । तत्र हि “किं कार्यः शब्दोऽथ सिद्ध” इति पक्षद्वयविचारः कृतः । तत्र कार्यप्रतिपक्षार्थाभिधायी सामर्थ्यात्सिद्धशब्द इति स्थितम् । तत्समान- तन्त्रत्वाद्विहापि तथैव युक्तमित्यर्थः । अथवेति । एवशब्दप्रयोगे द्विपदमवधारणं, द्योतकत्वेनैव शब्दस्यापेक्षणात् । यदा तु द्योतकमन्तरेण सामर्थ्यादवधारणं गम्यते तदा तदेकपदमित्युच्यते । तत्र सर्व एवापो भक्षयन्तीत्यब्भक्षश्रुतिः सामर्थ्यान्नियममवगमयति—अप एव भक्षयन्तीति । इहापि नित्यानित्यव्यतिरेकेण राश्यन्तराभावात्सिद्धशब्दोपादानान्नियमोऽवगम्यते सिद्ध एवेति । कार्याणां तु पदार्थानां प्रागभावप्रध्वंसाभावयोरपि सत्त्वात्सिद्धता नास्तीति न ते सिद्धा एव । अथवेति । कथं पुनर्देवदत्तशब्दे संज्ञात्वेन विनियुक्ते एकदेशः प्रयुज्यते । न ह्यसौ संज्ञात्वेन विनियुक्तः । न चैकदेशात्स्मर्यमाणस्य समुदायस्य वाचकत्वमुपपद्यते । प्रतीयमानस्य प्रत्यायकत्वासम्भवादुच्चार्यमाणस्यैव वाचकत्वात् । एवं तर्ह्यनु- निष्पादिन्योऽवयवरूपाः संज्ञा विनियोगकाले विनियुक्ता एव । लोपस्तु वर्णानां साधुत्वं मा भूदित्यन्वाख्यायते । इहापि नित्यानित्ययोर्निष्पन्नतवाविशेषात्सिद्ध- श्रुतिरुपात्ता प्रकर्षं गमयति— अत्यन्तसिद्ध इति । न्यायाद्वा नित्यत्वं शब्दादीनां स्थितमित्याह—अथवेति । न हि सन्देहमात्रा- दलक्षणता भवति, पुनः प्रमाणान्तरेण निश्चयोत्पादात् । अनुवाद—अरे ! इस प्रकार से तो (सिद्ध शब्द) कार्य (पदार्थों) में भी (प्रयुक्त होता) है। जैसे कि—ओदन सिद्ध हैं (बन गये हैं), दाल सिद्ध है, यवागु (खिचड़ी) सिद्ध है इत्यादि । जब यह कार्य (पदार्थों) में भी (प्रयुक्त होता है), फिर कैसे वहाँ नित्य पर्यायवाची (सिद्ध शब्द का) ही ग्रहण है, कार्य के पर्याय सिद्ध शब्द का नहीं । संग्रह (नामक ग्रन्थ) में कार्य (पदार्थों) के विरोधी भाव में प्रयुक्त होने के कारण (हम) समझते हैं (कि वहाँ भी) नित्य के पर्याय रूप में (सिद्ध शब्द का) ग्रहण है । (इसलिए यहाँ भी वैसा ही हो । अथवा एक ही पद से अवधारण (नियम) देखे जाते हैं, जैसे कि अब्भक्षः, वायुभक्षः आदि से पानी ही पीता है, वायु ही खाता है, ऐसा समझा जाता है । इसलिए यहाँ भी सिद्ध ही है, साध्य नहीं, (ऐसा समझा जाना चाहिए) अथवा यहाँ पूर्व पद का लोप समझना चाहिए, अत्यन्तसिद्ध (को) सिद्ध (कहते हैं) । जैसे कि देवदत्त को दत्त (और) सत्यभामा को भामा (इत्यादि)

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ३६ अथवा व्याख्यान से विशेष बोध होता है, सन्देह भर से (लक्षण) अलक्षण नहीं हो जाता, इसलिए (यहाँ) नित्य के पर्यायवाची सिद्ध शब्द का ग्रहण है (ऐसा) व्याख्यान करेंगे । उषा—सिद्धान्ती ने "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" वार्त्तिक में सिद्ध शब्द को नित्य का पर्यायवाची स्वीकार करके अपना विवेचन प्रस्तुत किया था । पूर्वपक्षी इस पर आशंका करता हुआ कहता है कि सिद्ध शब्द जिस प्रकार से नित्य भावों के व्याख्यान में प्रयुक्त होता है, उसी प्रकार से क्रियानिष्पन्न पदार्थों को कहने में भी इस शब्द का प्रयोग लोक में देखा जाता है, यथा ओदन सिद्ध है, यवागू सिद्ध है, इत्यादि । इसलिए बिना आधार के इसे केवल मात्र अविनाशी तथा नित्य अवस्थित पदार्थों का वाचक नहीं माना जा सकता । सिद्धान्ती ने पूर्वपक्षी की इस आशंका का चार प्रकार से समाधान किया है— (१) भाष्यकार का प्रथम तर्क संग्रहग्रन्थ को प्रमाण रूप मानकर प्रस्तुत किया गया है । संग्रह ग्रन्थ में सिद्ध शब्द को कार्य के प्रतिपक्षी अर्थ का अभिधान करने में प्रयुक्त किया गया है। समान शास्त्रीय विषय होने के कारण सम्भवतः यह प्रस्तुत वार्त्तिक में उसी अर्थ का अभिधान करता है । परन्तु यह आवश्यक नहीं कि जो सिद्धान्त संग्रह ग्रन्थ में व्याडि द्वारा स्वीकृत किये गये हों, वही वार्त्तिक कार कात्यायन को भी अभिमत हों । ऐसी स्थिति में तो व्याडि सम्मत द्रव्य पदार्थ- वाद का सिद्धान्त भी वार्त्तिककार को स्वीकृत होना चाहिए था । अतः कुछ अन्य तर्कों का भी उपस्थापन किया गया है । (२) लोक में "अब्भक्षः", "वायुभक्षः" आदि प्रयोग जल का ही भक्षण करता है, अथवा, वायु का ही भक्षण करता है, इन अर्थों में पर्यवसित होते हैं । यहाँ अर्थात्मक अवधारणा में 'एव' शब्द का प्रयोग निश्चयात्मकता को बताता है । जब शब्द, अर्थ और उनके सम्बन्ध को सिद्ध कहा जाता है तो यहाँ वह सिद्ध ही है, इस रूप में ग्रहण किया जायेगा । अन्य कार्य पदार्थ प्रागभाव और प्रध्वंसाभाव की स्थिति में सिद्ध नहीं होते । (३) संज्ञा के रूप में प्रसिद्ध 'देवदत्त' इत्यादि शब्द अपने संक्षिप्त रूप 'दत्त' आदि से ही सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति करवा देते हैं क्योंकि सम्पूर्ण के लिए प्रयुज्यमान संज्ञा अपने अवयवों में भी सम्पृक्त हो जाती है । अपि च, एक सम्बन्धि ज्ञान अपने से सम्बद्ध अन्य वस्तु का भी स्मारक होता ही है । इसी प्रकार से 'दत्त' शब्द अपने से सम्बन्धित 'देव' शब्द का भी स्मरण करवाता है और 'देवदत्त' उस सम्पूर्ण अर्थ की प्रतीति होती है । और यह व्यवहार केवल संज्ञाओं में ही नहीं, अन्यत्रापि दृष्टिगत होता है । यहाँ भी 'सिद्ध' शब्द वस्तुतः सम्पूर्ण शब्द 'अत्यन्त सिद्ध' का लघु रूप है । ऐसी स्थिति में सिद्ध शब्द नित्य वस्तु का ही पर्याय हो सकता है, कार्य पदार्थ का नहीं ।

४० महाभाष्यम् (४) अपि च, इस प्रकार के सन्दिग्ध पदों का व्याख्यान करके उनके विशिष्ट और प्रासङ्गिक अर्थ को ग्रहण करना चाहिए । सन्देहमात्र के ही उत्पन्न होने पर कोई लक्षण अलक्षण नहीं बन जाता । प्रमाणान्तर से उसके विशिष्ट अर्थ का विनिश्चय करना चाहिए । एवमेव 'सिद्ध' शब्द यहाँ नित्य का पर्यायवाची है, इसकी प्रतीति व्याख्यान से की जा सकती है, सिद्ध शब्द के प्रयोग को ही अनुचित कह देना उचित नहीं । मूलम् — किं पुनरनेन वर्ण्येन । किं न महता कण्ठेन नित्यशब्द एवोपात्तः यस्मिन्नुपादीयमानेऽसंदेहः स्यात् ? माङ्गलिक आचार्यो महतः शास्त्रौघस्य मङ्गलार्थं सिद्धशब्दमादितः प्रयुङ्क्ते । मङ्गलादीनि हि शास्त्राणि प्रथन्ते वीरपुरुषाणि च भवन्ति, आयुष्यत्पुरुषाणि चाध्येतारश्च सिद्धार्था यथा स्युरिति । अयं खलु नित्यशब्दो नावश्यं कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते । किं तर्हि ? आभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते । तद्यथा नित्यप्रहसितो, नित्यप्रजल्पित इति । यावता- ऽभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते तत्राप्यनेनैवार्थः स्यात् — "व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तिर्नहि सन्देहा- दलक्षणम्" इति । पश्यति त्वाचार्यो मङ्गलार्थश्चैव सिद्धशब्द आदितः प्रयुक्तो भविष्यति, शक्ष्यामि चनं नित्यपर्यायवाचिनं वर्णयितुमिति । अतः सिद्धशब्द एवोपात्तो न नित्यशब्द इति । प्रदीपः — वर्ण्येनेति । प्रयत्नव्याख्यातव्येनेत्यर्थः । माङ्गलिक इति । अगर्हिता- भीष्टार्थसिद्धिर्मङ्गलं तत्प्रयोजन आचार्यो माङ्गलिकः । प्रथन्त इति । अध्ययनस्या- विच्छेदात् । वीरपुरुषाणीति । श्रोतॄणां परैरपराजयात् । आयुष्यत्पुरुषाणीति । शास्त्रानुष्ठाने धर्मोपचयादायुर्वर्धनात् । सिद्धार्था इति । अध्ययननिवृत्तिरेव तेषां सिद्धिः । नावश्यमिति । ततश्चाभीक्ष्ण्येन ये शब्दाः प्रयुज्यन्ते आगोपालाङ्गनं तेषामेवा- न्वाख्यानं स्याद् न विरलप्रयोगाणाम् । विनापि च क्रियापदप्रयोगेणाभीक्ष्ण्य- वृत्तिर्नित्यशब्दः प्रयुज्यते । यथा आश्चर्यमनित्ये नित्यवीप्सयोरिति । अनुवाद — फिर इस प्रयत्नव्याख्यातव्य (सिद्ध शब्द से) क्या प्रयोजन ? क्यों नहीं खुले गले से नित्य शब्द का ही पाठ किया गया जिसके उपादान से सन्देह ही नहीं होता ? माङ्गलिक आचार्य महान् शास्त्रसमुदाय के मङ्गल के लिए सिद्ध शब्द का आदि में प्रयोग करता है । (क्योंकि) आदि मङ्गल (लक्षणों से युक्त) शास्त्र प्रसिद्ध होते हैं, (इनके ज्ञाता) वीर पुरुष होते हैं और दीर्घायु होते हैं, अथ च (उनके) पढ़ने वाले सिद्धार्थ होते हैं । यह नित्य शब्द भी आवश्यक रूप से कूटस्थ और अविचालि भावों में प्रयुक्त नहीं होता ।

प्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४१ तो (फिर) कहाँ (होता है) ? 'आवृत्ति' अर्थ में भी आता है । जैसे कि नित्य हँसता (बहुत अधिक हँसता) है, नित्य बोलता है (बहुत बोलता है) इत्यादि । जब (नित्य शब्द) आभीक्ष्ण्य में प्रयुक्त होता, तब भी "व्याख्यान से विशेष प्रतिपत्ति होती है, सन्देह से (लक्षण) अलक्षण नहीं हो जाता," इस नियम से ही अर्थ (सिद्ध हो सकता) है । आचार्य ने देखा (विचार किया) कि मङ्गलार्थक शब्द आदि में प्रयुक्त हो जायेगा और (मैं) इसे नित्य का पर्यायवाची भी वर्णित कर सकूँगा । इसीलिए सिद्ध शब्द का प्रयोग किया है, नित्य शब्द का नहीं । उषा :—"सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" इस वार्त्तिक में 'सिद्ध' शब्द को यद्यपि यथाकथमपि नित्य का पर्यायवाची सिद्ध किया जा सकता है तथापि यह प्रयत्न- व्याख्यातव्य अवश्य है तथा सन्देह को उत्पन्न करता है । इसके स्थान पर नित्य शब्द इस सन्देह की निवृत्ति कर सकता है, अतः सिद्ध के स्थान पर स्फुट रूप से नित्य शब्द का ही प्रयोग किया जाना चाहिए था । सिद्धान्तों के अनुसार 'सिद्ध' शब्द का प्रयोग यहाँ मङ्गलाचरण के लिए किया गया है, क्योंकि भारतीय मान्यता के अनुसार आदि में मङ्गलाचरण से युक्त शास्त्र प्रसिद्धि को प्राप्त होते हैं । श्रोता अथवा पाठक अपराजय को प्राप्त करते हैं, शास्त्रानुष्ठान से धर्मलाभ करके दीर्घायु होते हैं तथा अध्ययन परिसमाप्ति रूप अर्थ (प्रयोजन) को सिद्ध करते हैं । मङ्गलाचरण के अनुष्ठान से विघ्नों का नाश होता है, अत एव ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति भी हो पाती है । यद्यपि कोई श्रुति मङ्गलाचरण का विधान नहीं करती तथापि शिष्टाचार परम्परा से यह मान्यता अविच्छिन्न चली आ रही है । अपि च, जिन ग्रन्थों के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण किया गया है, वे निर्विघ्न परिसमाप्त हो गये हैं, उन्हें देखकर इस विषय में अनुमान किया जा सकता है । इसके अपवाद के रूप में, जहाँ मङ्गलाचरण होने पर भी ग्रन्थ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ, वहाँ इसका कारण यह हो सकता है कि ग्रन्थ में विघ्न मङ्गलाचरण के अनुपात से अधिक थे और इसके विपरीत जहाँ मङ्गलाचरण के बिना ही ग्रन्थ निर्विघ्न समाप्त हो गया है, वहाँ सम्भवतः ग्रन्थकार ने बाहर ही मङ्गलाचरण कर लिया था । अपि च, नित्य शब्द भी केवल मात्र अविनाशी पदार्थों को नहीं कहता, प्रत्युत सिद्ध शब्द जिस प्रकार से नित्य के अतिरिक्त अन्य (अनित्य) अर्थ को भी अभिव्यक्त करता था, नित्य शब्द भी इसके अतिरिक्त आभीक्ष्ण्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । यद्यपि इस स्थिति में भी व्याख्यान से विशिष्ट अर्थ का प्रतिपादन किया जा सकता था तथापि सिद्ध शब्द का प्रयोग ही यहाँ अधिक उपयुक्त है । क्योंकि इस शब्द का प्रयोग एक ओर मङ्गलाचरण तथा दूसरी ओर नित्य की पर्यायवाचकता दोनों का युगपत् आख्यान कर पाने में समर्थ है ।

४२ महाभाष्यम् मूलम्—अथ कं पुनः पदार्थं मत्वैष विग्रहः क्रियते—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति ? आकृतिमित्याह । कुत एतत् ? आकृतिर्हि नित्या द्रव्यमनित्यम् । अथ द्रव्ये पदार्थे कथं विग्रहः कर्त्तव्यः ? सिद्धे शब्देऽर्थसम्बन्धे चेति । नित्यो ह्यर्थवतामर्थैरभिसम्बन्धः । प्रदीपः—अर्थ सम्बन्धे चेति । द्रव्यपक्षे द्रव्यस्यानित्यत्वादर्थग्रहणं सम्बन्ध- विशेषणार्थमुपात्तम् । अनित्येऽर्थे कथं सम्बन्धस्य नित्यतेति चेद्, योग्यतालक्षणत्वा- त्सम्बन्धस्य । तस्याश्च शब्दाश्रयत्वाच्छब्दस्य नित्यत्वाददोषः । अनुवाद—फिर किसे पदार्थ मानकर (द्रव्य अथवा आकृति को) यह विग्रह किया जाता है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध (नित्य) होने पर ? आकृति को, ऐसा (वैयाकरण) कहता है । यह कैसे (कहा जाता है) ? क्योंकि आकृति नित्य है, द्रव्य अनित्य । फिर द्रव्य को पदार्थ मानकर कैसे विग्रह करना चाहिए ? शब्द और अर्थ सम्बन्ध के सिद्ध होने पर । शब्दों का अर्थों के साथ सम्बन्ध नित्य है । उषा—वैयाकरण आकृति (जाति) और द्रव्य दोनों को ही पद के अर्थ के रूप में स्वीकार करते हैं । अतः "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" इस वार्त्तिक में 'सिद्ध' शब्द का अर्थ 'नित्य' स्वीकार कर लेने पर यह प्रश्न उठता है कि द्रव्य रूप अर्थ को नित्य माना जाता है या जाति रूप अर्थ को, अर्थात् अर्थ नित्यता की स्थिति में गो द्रव्य नित्य हैं, अथवा गोत्व जाति । जाति को पदार्थ मानने की स्थिति में कोई आपत्ति नहीं हो सकती । जाति नित्य है, द्रव्य अनित्य । एक गो के नष्ट हो जाने पर भी गोत्व धर्म नष्ट नहीं होता । अत एव द्रव्य को पदार्थ मानने की स्थिति में विवेच्य वार्त्तिक का विग्रह "सिद्धे शब्दे, अर्थसम्बन्धे च" इस प्रकार करना होगा । अर्थात् शब्द और उसका अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । इसे ही दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि नित्य शब्द का अनित्य अर्थ के साथ नित्य सम्बन्ध है । यदि अर्थ अनित्य है तो शब्द के साथ उसका सम्बन्ध नित्य कैसे हो सकता है, इस प्रश्न का समाधान करते हुए नागेश ने कहा है कि नष्ट और भावी अर्थों का

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ४३ भी शब्द के द्वारा बोध लोकव्यवहार में देखा जाता है, अतः बौद्ध शब्द का बौद्ध अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । मूलम्—अथवा द्रव्य एव पदार्थ एष विग्रहो न्याय्यः—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । द्रव्यं हि नित्यमाकृतिरनित्या । कथं ज्ञायते ? एवं हि दृश्यते लोके मृत्कयाचिदाकृत्या युक्ता पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमुप- मृद्य घटिकाः क्रियन्ते, घटिकाकृतिमपमृद्य कुण्डिकाः क्रियन्ते । तथा सुवर्णं कयाचिदा- कृत्या युक्तं पिण्डो भवति, पिण्डाकृतिमपमृद्य रुचकाः क्रियन्ते, रुचकाकृतिमपमृद्य कटकाः क्रियन्ते । कटकाकृतिमपमृद्य स्वस्तिकाः क्रियन्ते । पुनरावृत्तः सुवर्णपिण्डः पुनरपरयाकृत्या युक्तः खदिराङ्गारसवर्णे कुण्डले भवतः । आकृतिरन्या चान्या च भवति, द्रव्यं पुनस्तदेव । आकृत्युपमर्देन द्रव्यमेवावशिष्यते । प्रदीपः — द्रव्यं हि नित्यमिति । असत्योपाध्यवच्छिन्नं ब्रह्मतत्त्वं द्रव्यशब्द- वाच्यमित्यर्थः । आकृतिरिति । संस्थानम् । ब्रह्मदर्शने च गोत्वादिजातेरप्यसत्यत्वाद- नित्यत्वम्, “आत्मैवेदं सर्वम्” इति श्रुतिवचनात् । अनुवाद — अथवा द्रव्य को ही पदार्थ मानकर यह विग्रह (करना) न्याय्य है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के नित्य होने पर । क्योंकि द्रव्य नित्य है, आकृति अनित्य । (यह) कैसे जाना जाता है ? क्योंकि ऐसा लोक में देखा जाता है कि मिट्टी किसी आकृति से युक्त पिण्ड होती है, पिण्ड की आकृति को मिटाकर घड़ियां बनाई जाती हैं, घड़ियों की आकृति को मिटाकर कुण्डिकायें बनाई जाती हैं । उसी प्रकार सुवर्ण किसी आकृति से युक्त पिण्ड होता है, पिण्ड की आकृति को मिटाकर रुचक (आभूषण विशेष) बनाये जाते हैं, रुचक की आकृति को मिटाकर कटक (कड़े) बनाये जाते हैं । कड़ों की आकृति को मिटाकर स्वस्तिक बनाये जाते हैं । फिर लौटकर सुवर्णपिण्ड बना हुआ सोना फिर दूसरी आकृति से युक्त हुआ खदिराङ्गार के समान दो कुण्डल हो जाते हैं । आकृति और-और होती जाती है । (बदलती रहती है), द्रव्य फिर भी वही है । आकृति के नाश होने पर द्रव्य ही शेष रह जाता है । उषा—शब्द के द्वारा यदि द्रव्यरूप अर्थ को भी वाच्य माना जाये तो भी शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध तीनों की नित्यता सिद्ध की जा सकती है, अर्थात् द्रव्य रूप में भी अर्थ नित्य हो सकता है । द्रव्य की नित्यता और आकृति की अनित्यता को सिद्ध करने के लिए पतञ्जलि ने एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया है कि मिट्टी किसी एक आकृति से युक्त होकर पिण्ड बन जाती है, उसे ही तोड़कर फिर घटिका, कुण्डिका आदि विभिन्न आकृति रूपों में परिणत किया जा सकता है । सुवर्णपिण्ड को भी पुनः पुनः तोड़कर रुचक, कटक, कुण्डल आदि विभिन्न आकृति

४४ महाभाष्यम् रूप प्रदान किये जा सकते हैं । इस प्रक्रिया में आकृति रूप निरन्तर परिवर्तनशील और अनित्य रहते हैं। इन विभिन्न असत्य उपाधियों से अवच्छिन्न ब्रह्म रूप द्रव्य- तत्त्व नित्य रहता है। उस तत्त्व के दर्शन को जानने पर गोत्व आदि विभिन्न जातिरूप असत्य और अनित्य होकर रह जाते हैं। "आत्मैवेदं सर्वम्" इत्यादि श्रुति- वाक्य इसमें प्रमाण हैं । मूलम् —आकृतावपि पदार्थ एष विग्रहो न्याय्यः—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । ननु चोक्तम्—आकृतिरनित्येति । नैतदस्ति । नित्याऽऽकृतिः । कथम् ? न क्वचिदुपरतेति कृत्वा सर्वत्रोपरता भवति । द्रव्यान्तरस्था तूपलभ्यते । अथवा नेदमेव नित्यलक्षणम्—ध्रुवं कूटस्थमविचाल्यनपायोपजनविकार्य- नुत्पत्त्यवृद्ध्यव्यययोगि यत्तन्नित्यम् इति । तदपि नित्यं यस्मिंस्तत्त्वं न विहन्यते । किं पुनस्तत्त्वम् ? तद्भावस्तत्त्वम् । आकृतावपि तत्त्वं न विहन्यते । अथवा किं न एतेन—इदं नित्यमिदमनित्यमिति यन्नित्यं तं पदार्थं मत्वैष विग्रहः क्रियते—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति । प्रदीपः—न क्वचिदुपरतेति । अनभिव्यक्तेत्यर्थः । अद्वैतेन लोके व्यवहारा- भावाद् व्यवहारे चाकृतेरेकाकारपरामर्शहेतुत्वान्नित्यत्वम् । अथवेति । असत्यत्वेपि तत्त्वतो लोकव्यवहाराश्रयेण जातेर्नित्यत्वं साध्यते । त्रिविधा चानित्यता, संसर्गा- नित्यता यथा—स्फटिकस्य लाक्षाद्युपधाने स्वरूपतिरोधानेन पररूपभासः । परिणा- मानित्यता यथा बदरीफलस्य श्यामतातिरोभावे लौहित्याविर्भावः । प्रध्वंसानित्यता सर्वात्मना विनाशः । एतत्त्रिविधानित्यताप्रतिषेधेन नित्यतां प्रतिपादयितुमुक्तं ध्रुवमित्यादि । तत्र ध्रुवम् कूटस्थमिति संसर्गानित्यता परिहृता, अविचालीति परि- णामानित्यता, अनपायेत्यादिना प्रध्वंसानित्यता । यन्नित्यमिति । बुद्धिप्रतिभासः शब्दार्थो यदा यदा शब्द उच्चारितस्तदा तदाऽर्थाकारा बुद्धिरुपजायते इति प्रवाह- नित्यत्वादर्थस्य नित्यत्वमित्यर्थः । अनुवाद—आकृति को भी पदार्थ मानने पर यह विग्रह न्याय्य है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध रहने पर । और (अभी) जो कहा था (कि) आकृति अनित्य है । ऐसा नहीं है । आकृति नित्य है । कैसे (कहा) ? कहीं (एक स्थान पर) विलय होकर सर्वत्र विलय नहीं हो जाती । अन्य

प्रथमाह्निकम् (पस्पशा) ४५ द्रव्य में तो उपलब्ध होती ही है । अथवा यह नित्य होने का लक्षण नहीं है (कि) जो ध्रुव, स्वरूप में अवस्थित नित्य सुस्थित, परिणाम, विपरिणाम, विकाररहित, उत्पत्तिरहित, वृद्धिरहित और क्षयरहित हो, वही नित्य है । वह भी नित्य है, जिसमें तत्त्व नष्ट नहीं होता । फिर तत्त्व क्या है ? उस वस्तु का (स्व) भाव तत्त्व है । आकृति में भी तत्त्व नष्ट नहीं होता । अथवा इससे क्या कि यह नित्य है, अथवा यह अनित्य है । जो भी नित्य है, उसे पदार्थ मानकर यह विग्रह किया जाता है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध होने पर । उषा—पद का अर्थ आकृतिरूप मानकर भी शब्द, अर्थ और सम्बन्ध इन तीनों की नित्यता को सिद्ध किया जा सकता है। यहाँ 'आकृति' पद का अर्थ 'जाति' है । 'अपि' शब्द के प्रयोग से द्रव्य का ग्रहण किया गया है अर्थात् द्रव्य रूप में तो अर्थ नित्य है ही, जाति रूप में भी नित्य है । किसी एक द्रव्य में अनभिव्यक्त होती हुई भी जाति सर्वत्र अप्रत्यक्ष नहीं हो जाती । एक स्थान पर घटिका की आकृति नष्ट होकर भी सर्वत्र नष्ट नहीं होती । अन्य पदार्थों में उसका सत्त्व उसकी नित्यता बताता है । जाति की व्यञ्जिका आकृति व्यवहार काल में उत्पन्न और नष्ट होते हुए भी प्रकारान्तर से नित्य है । संसर्गानित्यता, परिणामानित्यता और प्रध्वंसानित्यता के रूप में अनित्यता तीन प्रकार की मानी गई है । लाक्षा आदि पदार्थों के संसर्ग से स्फटिक के स्वरूप का तिरोधान हो जाता है, यह संसर्गानित्यता है । बदरी आदि फलों में श्यामता का तिरोभाव होकर लौहित्य का आविर्भाव परिणामानित्यता है तथा वस्तु का सर्वात्मना विनाश प्रध्वंसानित्यता है । केवल मात्र इस तीन प्रकार की अनित्यता से रहित होना ही नित्यता का लक्षण नहीं है । इस प्रकार की नित्यता ब्रह्म से सम्बद्ध है, इसे कूटस्थ नित्यता कहते हैं । पदार्थ एक स्थान पर नष्ट होकर भी भावरूप में अन्यत्र वर्तमान रहता है, अतः उसमें प्रवाहनित्यता है । क्योंकि उसका नाश हो जाने पर भी उसका धर्म नष्ट नहीं होता । शब्द का उच्चारण तत्तदाकारा अर्थभावना को बुद्धि में व्यक्त कर देता है अतः पदार्थ को केवल बाह्य रूप में न मानकर बौद्ध रूप में स्वीकार करने से उसकी नित्यता स्वयमेव सिद्ध हो जाती है । शशशृङ्ग इत्यादि पदार्थ भी इसीलिए स्वरूपतः सिद्ध न होने पर बुद्धि में प्रतिभासित होने के कारण बोध के विषय बनते हैं । अतएव चाहे द्रव्य को पदार्थ मानकर “सिद्धे शब्दार्थ सम्बन्धे” का विग्रह