व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथममाह्निकम् (पस्पशा) ४१ तो (फिर) कहाँ (होता है) ? 'आवृत्ति' अर्थ में भी आता है । जैसे कि नित्य हँसता (बहुत अधिक हँसता) है, नित्य बोलता है (बहुत बोलता है) इत्यादि । जब (नित्य शब्द) आभीक्ष्ण्य में प्रयुक्त होता, तब भी "व्याख्यान से विशेष प्रतिपत्ति होती है, सन्देह से (लक्षण) अलक्षण नहीं हो जाता," इस नियम से ही अर्थ (सिद्ध हो सकता) है । आचार्य ने देखा (विचार किया) कि मङ्गलार्थक शब्द आदि में प्रयुक्त हो जायेगा और (मैं) इसे नित्य का पर्यायवाची भी वर्णित कर सकूँगा । इसीलिए सिद्ध शब्द का प्रयोग किया है, नित्य शब्द का नहीं । उषा :—"सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" इस वार्त्तिक में 'सिद्ध' शब्द को यद्यपि यथाकथमपि नित्य का पर्यायवाची सिद्ध किया जा सकता है तथापि यह प्रयत्न- व्याख्यातव्य अवश्य है तथा सन्देह को उत्पन्न करता है । इसके स्थान पर नित्य शब्द इस सन्देह की निवृत्ति कर सकता है, अतः सिद्ध के स्थान पर स्फुट रूप से नित्य शब्द का ही प्रयोग किया जाना चाहिए था । सिद्धान्तों के अनुसार 'सिद्ध' शब्द का प्रयोग यहाँ मङ्गलाचरण के लिए किया गया है, क्योंकि भारतीय मान्यता के अनुसार आदि में मङ्गलाचरण से युक्त शास्त्र प्रसिद्धि को प्राप्त होते हैं । श्रोता अथवा पाठक अपराजय को प्राप्त करते हैं, शास्त्रानुष्ठान से धर्मलाभ करके दीर्घायु होते हैं तथा अध्ययन परिसमाप्ति रूप अर्थ (प्रयोजन) को सिद्ध करते हैं । मङ्गलाचरण के अनुष्ठान से विघ्नों का नाश होता है, अत एव ग्रन्थ की निर्विघ्न परिसमाप्ति भी हो पाती है । यद्यपि कोई श्रुति मङ्गलाचरण का विधान नहीं करती तथापि शिष्टाचार परम्परा से यह मान्यता अविच्छिन्न चली आ रही है । अपि च, जिन ग्रन्थों के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण किया गया है, वे निर्विघ्न परिसमाप्त हो गये हैं, उन्हें देखकर इस विषय में अनुमान किया जा सकता है । इसके अपवाद के रूप में, जहाँ मङ्गलाचरण होने पर भी ग्रन्थ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ, वहाँ इसका कारण यह हो सकता है कि ग्रन्थ में विघ्न मङ्गलाचरण के अनुपात से अधिक थे और इसके विपरीत जहाँ मङ्गलाचरण के बिना ही ग्रन्थ निर्विघ्न समाप्त हो गया है, वहाँ सम्भवतः ग्रन्थकार ने बाहर ही मङ्गलाचरण कर लिया था । अपि च, नित्य शब्द भी केवल मात्र अविनाशी पदार्थों को नहीं कहता, प्रत्युत सिद्ध शब्द जिस प्रकार से नित्य के अतिरिक्त अन्य (अनित्य) अर्थ को भी अभिव्यक्त करता था, नित्य शब्द भी इसके अतिरिक्त आभीक्ष्ण्य अर्थ में प्रयुक्त हुआ देखा जाता है । यद्यपि इस स्थिति में भी व्याख्यान से विशिष्ट अर्थ का प्रतिपादन किया जा सकता था तथापि सिद्ध शब्द का प्रयोग ही यहाँ अधिक उपयुक्त है । क्योंकि इस शब्द का प्रयोग एक ओर मङ्गलाचरण तथा दूसरी ओर नित्य की पर्यायवाचकता दोनों का युगपत् आख्यान कर पाने में समर्थ है ।