व्याकरण महाभाष्य: पस्पशाह्निक (महर्षि पतञ्जलि - शब्द-साधुत्व एवं व्याकरण प्रयोजन सटीक)
Vyakarana Mahabhashya Paspashahnika of Maharshi Patanjali with Commentary
महर्षि पतञ्जलि (टीकाकार: डॉ. रमण कुमार शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ महाभाष्यम् मूलम्—अथ कं पुनः पदार्थं मत्वैष विग्रहः क्रियते—सिद्धे शब्देऽर्थे सम्बन्धे चेति ? आकृतिमित्याह । कुत एतत् ? आकृतिर्हि नित्या द्रव्यमनित्यम् । अथ द्रव्ये पदार्थे कथं विग्रहः कर्त्तव्यः ? सिद्धे शब्देऽर्थसम्बन्धे चेति । नित्यो ह्यर्थवतामर्थैरभिसम्बन्धः । प्रदीपः—अर्थ सम्बन्धे चेति । द्रव्यपक्षे द्रव्यस्यानित्यत्वादर्थग्रहणं सम्बन्ध- विशेषणार्थमुपात्तम् । अनित्येऽर्थे कथं सम्बन्धस्य नित्यतेति चेद्, योग्यतालक्षणत्वा- त्सम्बन्धस्य । तस्याश्च शब्दाश्रयत्वाच्छब्दस्य नित्यत्वाददोषः । अनुवाद—फिर किसे पदार्थ मानकर (द्रव्य अथवा आकृति को) यह विग्रह किया जाता है—शब्द, अर्थ और सम्बन्ध के सिद्ध (नित्य) होने पर ? आकृति को, ऐसा (वैयाकरण) कहता है । यह कैसे (कहा जाता है) ? क्योंकि आकृति नित्य है, द्रव्य अनित्य । फिर द्रव्य को पदार्थ मानकर कैसे विग्रह करना चाहिए ? शब्द और अर्थ सम्बन्ध के सिद्ध होने पर । शब्दों का अर्थों के साथ सम्बन्ध नित्य है । उषा—वैयाकरण आकृति (जाति) और द्रव्य दोनों को ही पद के अर्थ के रूप में स्वीकार करते हैं । अतः "सिद्धे शब्दार्थसम्बन्धे" इस वार्त्तिक में 'सिद्ध' शब्द का अर्थ 'नित्य' स्वीकार कर लेने पर यह प्रश्न उठता है कि द्रव्य रूप अर्थ को नित्य माना जाता है या जाति रूप अर्थ को, अर्थात् अर्थ नित्यता की स्थिति में गो द्रव्य नित्य हैं, अथवा गोत्व जाति । जाति को पदार्थ मानने की स्थिति में कोई आपत्ति नहीं हो सकती । जाति नित्य है, द्रव्य अनित्य । एक गो के नष्ट हो जाने पर भी गोत्व धर्म नष्ट नहीं होता । अत एव द्रव्य को पदार्थ मानने की स्थिति में विवेच्य वार्त्तिक का विग्रह "सिद्धे शब्दे, अर्थसम्बन्धे च" इस प्रकार करना होगा । अर्थात् शब्द और उसका अर्थ के साथ सम्बन्ध नित्य है । इसे ही दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि नित्य शब्द का अनित्य अर्थ के साथ नित्य सम्बन्ध है । यदि अर्थ अनित्य है तो शब्द के साथ उसका सम्बन्ध नित्य कैसे हो सकता है, इस प्रश्न का समाधान करते हुए नागेश ने कहा है कि नष्ट और भावी अर्थों का